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ISSN 2292-9754

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02.04.2017


बुद्धचरितम् में प्रस्तुत स्वभाववाद

बुद्धचरितम् एक महाकाव्य है, जिसमें भगवान् बुद्ध के जीवन वृत्तांत एवं उनके अभिमत सिद्धान्तों का सर्वाङ्गिण चित्र उपस्थित किया गया है। इसमें काव्य तत्त्व के साथ-साथ धार्मिक एवं दार्शनिक तत्त्वों का समावेश है। जो जगत् व जीवन के महत्त्वपूर्ण तत्त्वों को व्याख्यायित करता है। अश्वघोष ने बुद्धचरितम् में अनेक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक समस्याओं पर विचार व्यक्त किये हैं। ये विचार कहीं संक्षिप्त हैं तो कहीं विस्तृत। यद्यपि अश्वघोष की काव्य रचनाओं का प्रमुख उद्देश्य बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार ही था किन्तु उन्होंने अन्य समकालीन एवं पूर्ववर्ती दार्शनिक विचारों की पूर्वपक्ष के रूप में कुछ झलक प्रस्तुत की है। इस प्रकार के उल्लेखों से जहाँ एक ओर अज्ञात चिंतकों के दार्शनिक विचार संग्रह करने और जानने का अवसर मिला है, उनकी ऐतिहासिकता से परिचय का अवसर मिला है वहीं दूसरी ओर उन विचारों से बौद्ध विचारों की भिन्नता और श्रेष्ठतरता के भी सयुक्तिक विवरण उपलब्ध होते हैं। अश्वघोष के समय में समाज का दार्शनिक चिंतन किस प्रकार का था यह ज्ञान इस विवरण से सहज ही हो जाता है। अश्वघोष ने जिन दार्शनिकों, सम्प्रदायों आदि का बुद्धचरितम् में उल्लेख किया है, उनका विवरण इस प्रकार है-

जगत् की उत्पत्ति कैसे हुई, उसका स्वरूप व स्वभाव क्या है, प्रयोजन क्या है, उसका विकास किस नियम से हो रहा है (कार्यकारणवाद) तथा इसका अन्त क्या है? इसके प्रत्येक चेतन-अचेतन पदार्थ में एक-दूसरे से सम्बन्ध क्या है? इत्यादि प्रश्न दर्शनशास्त्र की जगत् विषयक समस्या के ही प्रश्न हैं।

अश्वघोष ने मुख्य रूप से जगत् के प्रादुर्भाव, विकास तथा विविधता और इसकी क्षणिकता पर विचार किया है। इस विचार प्रक्रिया की शैली पूर्णत: दार्शनिक या दर्शनोचित नहीं है, न होना ही स्वाभाविक है। फिर भी उसकी यह प्रस्तुतिकरण इतिहास व दर्शन दोनों दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है।

स्वभाववाद- बुद्धचरितम् के नवम सर्ग में सृष्टि की उत्पत्ति के प्रसङ्ग में स्वभाववाद का संक्षिप्त पक्ष प्रस्तुत करते हुए उसके खण्डन में युक्तियाँ दी गयी हैं।

(१) बुद्धचरितम् के पूर्व-पक्ष के रूप में प्रस्तुत स्वभाववाद के अनुसार इस जगत् का कारण कोई एक तत्त्व नहीं है। इसका निर्माण स्वभाववाद के अनुसार हुआ है-

न कारणं स्वभावस्तु मतमेतन्न सन्मतम्।
दृश्यते कारणादीजात्कार्यमत्रा कुरात्मकम्।।

(२) स्वभाववाद के समर्थन की महत्त्वपूर्ण युक्ति यह है कि यदि यह जगत् किसी एक तत्त्व के प्रयत्न से निर्मित होता तो उसका वैसा ज्ञान भी सम्भव होता किन्तु ऐसे किसी तत्त्व का ज्ञान नहीं होता-

क: कण्टकस्य प्रकरोति तैक्ष्ण्यं विचित्रभावं मृगपक्षिणां वा।
स्वभावत: सर्वमिदं प्रवृत्तं न कामकारोऽस्ति कुत: प्रयत्न:।।

(३) जगत् निर्माण की प्रक्रिया में शरीर का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि जिस प्रकार पाँच महाभूत अपने आप में स्वतन्त्र और भिन्न होते हुए भी एक होकर शरीर का निर्माण करते हैं उसी प्रकार पञ्चमहाभूतों से यह जगत् बना है-

अद्भिर्हुताश: शममभ्युपैति तेजांसि चापोगमयन्ति शोषम्।
भिन्नानि भूतानि शरीरसंस्थान्यैक्यं च गत्वा जगदुदहन्ति।।

(४) स्वभाववाद में स्वभाव शब्द का तात्पर्य क्या है इसे स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि यह व्यापक, निर्गुण, विषयों में प्रवृत्ति का कारण, नित्य, अपरिवर्तनशील और अचेतन है।

व्यापित्वाप्तस्य सर्वत्र समानं कारणं भवेत्।
दृश्यते न्यूनमाधिक्यं तस्मात्सोऽत्र न कारणम्।।
कारणानुविधायित्वात्कार्यस्येह च लक्ष्यते।
निर्गुणस्य स्वभावस्य कथं सगुपहेतुता।।
विषयेषु च भूतानां प्रवृत्तिस्तु स्वभावत:।
स च नित्यस्त्वानावर्ती ततो मुक्तिरसंभवा।।
अचेतन: स्वभावश्च चेतानानां कथं त्वयम्।
कारणं संभवेत्तेषां गवादीनां च देहिनाम्।।

(४) स्वभाव को अन्य उदाहरणों से स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि जिस प्रकार जल के प्रभाव से शान्त हो जाना अग्नि का स्वभाव है उसी प्रकार गर्भस्थ शिशु के अङ्गों की उत्पत्ति एवं विकास तथा बाद में उस अचेतन शरीर का आत्मा से संयोग स्वाभाविक है।

यत्पाण्पिादोदरपृष्ठमूध्र्ना निवर्तते गर्भगतस्य भाव:।
यदात्मनस्तस्य च तेन योग: स्वाभाविवंâ तत्कथयन्ति तज्ज्ञा:।।

(५) जगत् की विचित्रता का कारण स्वभाव को बताते हुए कहा है कि जिस प्रकार काँटों की तीक्ष्णता तथा नाना पशु-पक्षियों के भावों के भेद में किसी का प्रयास दिखायी नहीं देता है अपितु यह स्वभाव से ही आता है, उसी प्रकार जगत् की उत्पत्ति और विचित्रता का कारण कोई एक भिन्न तत्त्व नहीं अपितु तत्त्वों का स्वभाव है।

क: कण्टकस्य प्रकरीति तैक्ष्ण्यं विचित्रभावं मृगपक्षिणां वा।
स्वभावत: सर्वमिदं प्रवृत्तं न कामकारोऽस्ति कुत: प्रयत्न:।।१०

स्वभाववाद का खण्डन-

बुद्धचरितम् के नवम सर्ग में स्वभाववाद को पूर्व-पक्ष के रूप में प्रस्तुत करने के बाद अट्ठारहवें सर्ग में उसके खण्डन की कुछ युक्तियाँ प्रस्तुत की गयी हैं। जगत् अथवा सांसारिक पदार्थ का कारण स्वभाव नहीं है।

स्वभावोऽयं विभु: प्रोवत्तो विभुर्न परिणामक:।
न चाप्युत्पादकस्तस्मान्न स्वभावो हि कारणम्।।११

इस मत को समुचित मत नहीं माना जा सकता, क्योंकि अधोलिखित तर्वâ और उदाहरण इसकी दुर्बलता को सिद्ध करते हैं।

(१) बीजस्य कारण से अंकुर रूप कार्य की उत्पत्ति देखी जाती है। बु./१८/३१ अर्थात् कार्य की उत्पत्ति का कोई सुनिश्चित कारण होता है। केवल स्वभाव मात्र किसी कार्य विशेष का कारण नहीं माना जा सकता।

(२) स्वभाव एक ही हो सकता है और एक ही स्वभाव को कर्त्ता मानने पर वह अनेक वस्तुओं का कारण नहीं बन सकता। उदाहरण के लिए छत अनेक उपादान और निमित्त कारणों से बनता है तथा एक ही मृत पिण्ड से मूर्ति, दीपक, घट आदि बनते हुए देखे जाते हैं किन्तु मिट्टी का स्वभाव तो एक ही है। अत: अनेक स्वभावों वाले पदार्थों का निर्माण एक स्वभाव से कैसे सम्भव है। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि कार्य एक सुनिश्चित संकल्प होता है, जबकि प्रत्येक वस्तु (कारण) का स्वभाव भिन्न-भिन्न होने के कारण किसी एक संघात स्वरूप विश्व का निर्माण कैसे कर सकता है।

एक: कर्ता न वस्तूनां बहूनां कारणं भवेत्।
एकात्मक: स्वभावोऽयं कथं विश्वस्य कारणम्।।१२

तात्पर्य यह है कि कार्य रूप यह विश्व अनेक स्वभाव वस्तुओं का संघात है। अत: इस नाना रूपात्मकता का कारण किसी एक स्वभाव को नहीं माना जा सकता।

(३) व्यापक और विभु स्वभाव को जगत् की किसी भी संकुचित पदार्थ का परिणाम अथवा उत्पाद नहीं माना जा सकता। बु./१८/३३.

(४) स्वभाव को अचेतन मानने पर इससे चेतन-अचेतन रूप जगत् का निर्माण संभव नहीं है बु. १८/४१। यह संसार चेतन रूप और अचेतन रूप दोनों का संगम है। अचेतन स्वभाव से अचेतन पदार्थों का उत्पत्ति को एक बार मान भी लिया जाय तब भी उससे चेतन गौ, मनुष्य आदि शरीरधारियों की उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती।

(५) संसार का दर्शन सगुण रूप में होता है अत: इसका कारण की सगुण ही होना चाहिए- बु. १८/३५ क्योंकि निर्गुण विकार रहित होता है और सगुण तब तक कार्योत्पत्ति नहीं कर सकता जब तक वह स्वयं को विकृत न कर दे। संघात रूप जगत् निर्विकार कारण से उत्पन्न होकर कैसे सविकारी बन गया।

अविकारी स्वभावश्चेत्कारणं संभवेत्तत:।
कार्यजातमिदं सर्वं सविकारं कथं भवेत्।।१३

स्वभाव को नित्य मानते हुए यदि उत्पादक बताया जाता है तो यह संभव नहीं है, क्योंकि तब कार्य रूप संघात का कर्त्ता भी नाश नहीं हो सकेगा अर्थात् यह विश्व सदा बना रहेगा और न प्रत्य की तथा न ही निर्वाण की भावना शेष रहेगी।

(६) स्वभाव को नित्य और अपरिवर्तनशील मानने में एक दोष यह है कि प्राणियों की विषयों के प्रति आसक्ति और प्रकृति सदा बनी रहेगी तथा वे कभी भी निर्वाण नहीं प्राप्त कर सकेंगे।१५

(६) स्वभाव यदि उत्पादक है तो कर्म को भी उत्पादक मानना होगा किन्तु संसार में ऐसा नहीं देखा जाता-

उत्पादक: स्वभावश्चेत्कार्य चापि तथा भवेत्।
प्रवृत्ति: कार्यमात्रस्य न च सर्वत्र दृश्यते।।१६

(७) स्वभाव की प्रवृत्ति का ज्ञान मन से प्राप्त नहीं होता, किन्तु केवल (फल) कार्य के माध्यम से ही स्वभाव का ज्ञान होता है। जबकि किसी को कर्त्ता मानने पर उसकी प्रवृत्ति का ज्ञान मन अथवा आकार से भी सम्भव है-

स्वभावस्य प्रवृत्तिस्तु न चित्तेन विभाव्यते।
फलन्तु दृश्यते तस्मात् स्वभावो नात्र कारणम्।।१७

(८) स्वभाव के साथ एक कठिनाई यह है कि उसका प्रत्यक्ष नहीं होता है। प्रत्यक्ष कारण के दिखायी देने पर अप्रत्यक्ष को कारण मानना न केवल अप्रमाण है बल्कि लोक व्यवहार के विपरित भी है। स्वर्ण से निर्मित आभूषणों का कारण स्वर्ण है, स्वर्ण का स्वभाव नहीं। इसके साथ ही स्वर्ण प्रत्यक्ष योग्य भी है जबकि स्वभाव का प्रत्यक्ष प्रमाण से ज्ञान प्राप्त नहीं होता है।

कारणं कंकणादीनां सुवर्णों दृश्यते सदा।
जगत: कारणं तद्त्स्वभावो नाऽत्र दृश्यते।।१८

प्रत्यक्ष ही सभी प्रमाणों के प्रमुख हैं तथा अनुमान आदि से इसका बाध सम्भव नहीं है।

स्वभाववाद क्या चार्वाक मत है? यह सिद्धान्त किस सम्प्रदाय का है। स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया है। तथापि प्राप्त विवरण से प्रतीत होता है कि यह मत चार्वाक दर्शन का है।

बुद्धचरितम् में प्रस्तुत स्वभाववाद वस्तुत: चार्वाक का ही है। यह मान्यता सन्दिग्ध है, क्योंकि चार्वाक चार भूतों को मानता है जबकि बुद्धचरितम् में उल्लिखित स्वभाववाद पाँच भूतों की मान्यता को प्रस्तुत करता है।

संदर्भ ग्रन्थ-

१. बु. १८/३१.
२. बु. ९/६२.
३. बु. ९/६०.
४. बु. १८/३४.
५. बु. १८/३५.
६. बु. १८/३८
७. बु. १८/४१.
८. बु. ९/६०.
९. बु. ९/६१.
१०. बु. ९/६२.
११. बु. १८/३३.
१२. बु. १८/३२.
१३. बु. १८/३६.
१४. बु. १८/३६.
१५. बु. १८/३८.
१६. बु. १८/३९.
१७. बु. १८/४०.
१८. बु. १८/४२.

काजल ओझा, शोध छात्रा, संस्कृत विभाग, कला संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय,
email- kajalojha05@gmail.com


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