कटे पेड़ के पास डॉ. कैलाश वाजपेयी
तुम्हारा तना ले गए लोग छोड़ गए मिट्टी से जुड़ा ठूँठ पानी की, धरती में बन्द बहती है चादर ओढ़ कर जड़ गाना गाएगी जल्दी ही घाव पर कोंपल आ जाएगी कई काफ़िले नर्म रुइए गुज़रेंगे आसमान से वर्ष पर वर्ष पर तुम फिर पूरे संपन्न झूमोगे शाखों के सरगम पर पक्षी आसावरी गाएँगे
सिर कटे धड़ के साथ यह नहीं होता काश आदमी पेड़ होता