गैया डॉ. कैलाश वाजपेयी
तुम्हारी हरियाली हथिया ली हमने छोड़ दिया तुमको सड़कों पर कूड़ा अखबार प्लास्टिक चबाने को।
चूस लिया गोरस तुम्हारा, वत्स काम आ गया क्रोम का जूता बनाने में।
जीभ के गुलाम हम स्वाद के वास्ते या मारे लोभ के वारा न्यारा कर आए तुम्हारा, किसी कत्लगाह में आधी रात को।
हमको अफ़सोस है आज तक कोई उपयोग न कर पाए हम तुम्हारी चीख़ का।
हमें माफ़ करना माँ बाज़ार में आह का कोई मूल्य नहीं।