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09.09.2007
 
पुत्र मोह ......एक छलावा
कैलाश भटनागर

विभिन्न युगों में
अनेक प्रतापी राजा.....पुत्रों के जन्मदाता
दूसरे शब्दों में विधाता
पुत्र मोह से वंचित नहीं हैं
चाहे ये गलत है...या सही...या झमेला
पुत्र मोह न होने का फल
हिरण्यकश्यिप ने झेला
दुखी दशरथ भी अंतिम समय में
रहा अकेला ।

पुत्रियाँ ...प्रिय होती हैं
कभी कभी भाई ना होने पर
माता पिता का बोझ भी ढोहती हैं
पढ़ कर गर्व करते हैं
पुत्री ने पिता का अंतिम संस्कार किया...
समाज में...किसी ने दुत्कारा
किसी ने स्वीकार किया
पर , प्रेरित हुए सब
कुण्ठा ने रोका ..टोका..
काश
एक पुत्र तो...अवश्य होता।

सहस्त्रों वर्ष पुरानी झूठी मानसिकता
रक्त में विद्यमान है
वैसे तो...समान हैं
मनुष्य की बस यही तो भूल है ।
प्रारब्ध में ही
अंत की सोचने को मजबूर है
पुत्र की चाहत में
राह भटक गये हैं...कहीं अटक गये हैं
सब जानते हैं ...
राष्ट्रकुल की पुत्रियों के चमत्कार
जिस पर गर्वित हैं सभी ... और
कुपुत्रों की... कभी भी नहीं रही है...कमी...।

कांच के नीच...मेज पर रखे चित्र
हटाना आसन है ...
पर
हृदय ...पटल पर अंकित
संवेदना...अलक्षित सांत्वना
से सुसज्जित
पुत्र मोह के आकर्षक चित्र को हटा पाना
युगों तक
भविष्य में भी कठिन ही नहीं...बiल्क
असंभव है।

धरती का पुत्र...देवता नहीं है
मानव है
और...मानव होना...
उस की मजबूरी नहीं है
......कमजोरी है।


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