|
मैं सब में विराजमान हूँ
नाश रहित, सम्पूर्ण जगत में व्याप्त
अविनाशी, विनाश करने में कोई समर्थ नहीं
आत्मा का अस्तित्व
शाश्वत पुरातन नित्य
सर्वव्यापक अशोष्य
अचल स्थिर सनातन
सब के शरीर में सदा विराजमान
भर्ता भोगता महेश्वर परमात्मा हूँ,
आत्मा के द्वारा आत्मा में देखता हूँ
नाम के सहारे, सब में समान स्थिर
सर्वत्र, व्याप्त, पर सूक्ष्मता के कारण
कारण कार्य में लिप्त नहीं
योगी जैसे समस्त इन्द्रियों को वश में कर
बुद्धि स्थिर करता
आसक्तिहीन कामना से परे
क्रोध नहीं करता
राग द्वेSh से रहित
अन्तकरण की प्रसन्नता को प्राप्त करता।
आत्मज्ञान के साक्षात्कार से
स्थिर इन्द्रयों वश में करता
उसे ही मिट्टी पत्थर स्वर्ण
एक समान सब लगता
सागर में नदियों के जैसे मिलता
हृदय में समस्त कामनाओं को
नष्ट करता
कर्म तपस्या और ज्ञान ध्यान
सब सहज ही वो प्राप्त कर लेता।
अग्नि में तपने पर सोना
भक्ति प्रेम में तपी आत्मा
स्वयं और प्रेम में अन्तर कर
परिमार्जित कर ध्यान रत
अपने सम्पूर्ण कर्म ईश्वर अर्पित कर देता
हर्ष, शोक, भय उद्वेगों से
प्रभु भक्ति में लीन रहता
वो अनिकेत स्थिरमति और भक्तिमान
व्यक्ति सदा मुझे प्रिय लगता।
|