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03.09.2014


पण्यसुंदरी

मैँ पण्यसुंदरी,

नरोद्विग्न मन की।

यह सुश्रोणि, समुन्नत उरोज, मधुमत्त कटि
विभासित उन स्पर्शों से।

मैँ एक वस्तु !
यौनिकान्न, तप्त-तप्त रुधिर का।

अवगुंठित योषिताभिव्यक्ति मुखरित सर्वत्र यह लोकोक्ति

"कर अर्पित यौवनोपहार
क्षम्य नहीँ कौमार्य"।


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