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03.09.2014


मैँ शूर

मैँ शूर
इस वैषम्य-जगत का
अस्त्र-शस्त्र संवेदना।

जब कभी भी संहार होता
अपलक जूझता
कविताएँ रचता हूँ।

आवश्यक नहीँ उग्रता
स समय कोमल-कराल होना
समाधान पाना बुद्धिमत्ता है।

न्याय को स्थान
अन्याय पर संघात
ये हस्त अमिय-विष धार हैँ।


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