अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली

मुख पृष्ठ
03.09.2014


आलोकवर्द्धन

हूँ विशिष्टतम!
गुण निज आकुंचन,
सतत परिवर्तित एकाग्र-चिंतन।

प्रार्थी प्रेम की
वृक्ष मनोहारी, आकर्षी
रूप-विजन छाँह सघन।

बैठ तू इस ठाँव
आ क्षणिक विश्राम कर
कि मैँ उर-स्वन, शीतल-भुवन।

दे झकझोर
कुसुमित पल्लवित यह देह
मिटा ताप
सुन सुगम संकीर्तन।

तू पाताल, मैँ आकाश
तू क्षर-अक्षर, मैँ दिशाकाश
रच कविता, गाय मन उन्मन।

भू से आकाश तक मिलती रहूँ
रहे न पंथ अपरिचित, गान उन्मन
तन एकल, तान उन्मन।

मेरे ही स्वर साकार
सिंचित विश्व-उपवन
मैँ प्रेमोद्वेल्लित विशुद्ध- मन।

तू नील-कुसुम, मैँ मग
तू सुमों का सुम, मैँ खग
मिल एक बन

हो 'आलोकवर्द्धन।'


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें