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02.06.2009
 
तीन मुक्तक
के.पी. सक्सेना ’दूसरे’

1.
ईद मंगल को पड़ रही होगी
होली जुम्मे को जल रही होगी,
कुछ न कुछ बात तो है बस्ती में
चील दावत पे क्यूँ गई होगी
2.
ऐ ख़ुदा तेरी ख़ुदाई की घटी कुछ साख है,
नीम के पातों में कीड़ों ने किया सुराख़ है
आस्थाओं के शिविर भी डगमगाने लग गए
होम की वेदियों में बस बची कुछ राख है
3.
आपका लोबान हो या हो हमारी अगरबत्ती
हर धुँआ जाता है ऊपर ख़ुशबू हर ज़र्रे में बसती
हो अँधेरे में अगर ये मस्जिदें मन्दिर शिवालय
रोशनी देगी बराबर चर्च की भी मोमबत्ती

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