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| 01.20.2008 |
| नव वर्ष पर मुक्तक और शे’र के.पी. सक्सेना ’दूसरे’ |
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मुक्तक
वो हादसा था कत्ल, यही बूझते रहे, जाने के बाद, हम लकीर पीटते रहे। हर बार वो शैतान, हमें मात दे गया, गीता, कुरान कनखियों से घूरते रहे॥ शे’र- इस बार फिर दुकान पड़ोसी की जल गई, है शुक्र अपना साल ख़ुशी से गुज़र गया। हर हादसे के बाद यही सोचते रहे, ये आख़िरी था और चलो ये गुज़र गया। निकलेगा कल भी सूरज, सरजू के खेत से, काग़ज पे भले नाम कोई और चढ़ गया। है हादसे का हमको अफ़सोस तो मगर, वो भी तो कल जलूस में, पत्थर लिये गया। जो सच कह दूँ तो दाग़ी हो गया इंसाफ़ तेरा भी, गए मंदिर, तो दोनों थे, लुटा वो भी, लुटेरा भी। भला किस काम का होना, नमाज़ी पाँच वक्तों का, अगर सोने नहीं पाता, पड़ोसी चैन से मेरा। करें उससे शिकायत क्या, नमाज़ हमने अदा कि कब, मगर वो भी तो डूबे हैं, जो मंदिर रोज़ जाते थे। |
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