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| 11.06.2007 |
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किस मुँह से ! के.पी. सक्सेना ’दूसरे’ |
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गाँव से बड़े भइया का संदेश आया कि बाबजी का स्वास्थ्य निरंतर गिरता जा रहा
है,
हम लोग चाहें तो समय रहते उनसे आखिरी बार मिल लें।
बाबू जी दो वर्ष पहले पक्षाघात के शिकार हुए और तब से बिस्तर पर ही थे।
उनकी सेवा सुश्रूशा बड़े भइया और भाभी गाँव की खेती बाड़ी देखने के
साथ-साथ जैसे-तैसे निभा रहे थे। छोटा भाई हालांकि रहता गाँव में ही
था लेकिन पढ़े-लिखे बरोजगारों की ऐसी मर्दुमशुमारी में आ गया था जिनका घर से
वास्ता सिर्फ खाने और सोने का ही रह जाता है। भइया पिछली बार बता रहे थे कि
अब तो वह रोज आता भी नहीं और जब आता है तो सीधे बाबूजी के पास बैठकर उनके
हाथ-पैर दबाता है और वहीं सो जाता है। अब तो सुना है कि अपने जैसों की एक
टोली बनाकर कभी-कभी रंगदारी भी वसूलने लगा है।
मैं गाँव से ५०० किमी दूर अपने परिवार के साथ,
शहर में नौकरी कर रहा था और धीरे-धीरे गाँव से वास्ता घटता जा रहा था। बड़े
भइया ने एक दो बार मुझे इस बात का आभास अवश्य कराया था कि कमाऊ पूत होने के
नाते कुछ दिन मैं बाबू जी को अपने पास शहर में रख कर अच्छे से इलाज कराऊँ,
किंतु मैं ही हर बार किसी न किसी बहाने से बात टाल देता।
लेकिन इस बार के समाचार से तो पत्नी भी हिल गयी। उसने मुझे रात की ही गाड़ी
से जाने का सुझाव दिया साथ ही चलते वक्त ५००० रूपये देते हुए कहा,
“बड़े
भइया का हाथ तंग होगा। खर्च के लिए दे देना और यदि आ सकने की स्थिति में
हों तो उन्हें लेते आना,
कुछ दिन हम लोग भी देखभाल कर सकेंगे।“
मैंने पत्नी से कुछ नहीं कहा। औरतों का स्वभाव,
जरा सी बात हुई नहीं कि लगीं जाने क्या-क्या सोचने। अरे भौजी ने भइया को भर
दिया होगा कि हमीं लोग दिन-रात खटते रहते हैं। लल्ला को खबर करो,
कुछ उनका भी फर्ज बनता है कि नहीं। ये भौजी को ही दरअसल हमारा सुख से रहना
कभी नहीं सुहाया। खैर,
जाना तो पड़ेगा ही कहीं कुछ ऊँच-नीच हो गई तो जिंदगी भर कहने को हो जाएगा कि
खबर देने पर भी देखने नहीं आए।
गाँव पहुँचा तो लगा कि वास्तव में हालत नाजुक है। जब मेरे पैर छूने पर भी
उन्होंने कोई हरकत नहीं की तो भौजी ने उनके कान के पास जाकर जोर से कहा,
“मझले
आए हैं।“
भौजी के दो बार पूरी ताकत से बोलने के फलस्वरूप उनकी आँखों की कोर से दो
बूंद आँसू लुढ़कते दिखे। बस इसीसे ऐसा लगा कि सूचना उन्होंने पा ली।
दोपहर को खेत से बड़े भइया आ गए,
छोटा भी समाचार पाकर आ गया था। खा पीकर जब सब बैठे तो भइया ने बात निकाली,
“देख
मझले,
हमसे जेतना होइ सकत रहा हम करेन अब हियां गाँव म डाक्टरौ ढंग के नहीं आँय।
उहै दवाई अदलत-बदलत रहत हें। सरपंच कहत रहें कि तहसील म जाँयके कुछ जच और
होइ जाय तो शायद दवाई बदलै,
अउर फैदा होय। लेकिन येमा चार-पांच हजार लग जई उआ हमरे पास अबे नहीं आय।“
“रूपिया
दो तो हम कलई बाबूजी को ले जाके सब जांच करा लें और प्रायवेट डाक्टर को
दिखाके अच्छी दवा के लिए बात करें।“
मझला मुझे देखकर कुछ उत्साहित हो गया था।
मैं जानता था कि इससे कुछ फायदा होने से रहा। अन्य रोग,
सब बिस्तर में पड़े रहने के कारण बढ़े होंगे,
जो इस उम्र में अब जाने से रहे। ये लोग
मुझे देखकर कुछ पैसे हथियाने के चक्कर में हैं। मैं फालतू पैसा
बरबाद करने के पक्ष में नहीं था अतः बोला,
“मुझे
तो खबर शाम को मिली और मैंने तुरंत ट्रेन पकड़ ली। रूपयों का बंदोबस्त करने
का समय ही नहीं था इसलिए अभी तो कुछ नहीं हो पायेगा। हाँ,
मैं वहाँ पहुँच कर कुछ व्यवस्था जरूर करूँगा।“
मेरी बात सुनकर उन तीनों के चेहरे बुझ गए। छोटा,
आता हूँ कहकर बाहर निकल गया,
भौजी उपले पाथने चली गयी और भइया वहीं तखत में ऊँघने लगे। मैं कपड़े बदल कर
भइया के बगल में लेट गया।
शाम को घर का वातावरण बडा दम-घोटूँ लगा। बाबूजी के कमरे में ऐसी गंध समा
गयी थी कि ज्यादा देर बैठा नहीं जा रहा था,
अतः टहलने निकल पड़ा। गाँव में तो लगभग सभी परिचित ही होते हैं। सबका
रटा-रटा वाक्य कि, “अब
आ गए हो तो कुछ दिन थोड़ा बाप की सेवा कर लो”,
सुनकर चिढ़ होने लगी। सी.एल. तो कई दिन की शेष थी लेकिन लगा कि इस वातावरण
में अधिक नहीं रह पाऊँगा।
घर लौटा तो भौजी ने खाना लगा दिया पर बोलीं कुछ नहीं। मैंने भइया को खाने
के लिए बुलाया तो वे बोले, “तुम
खा लो,
मेरा पेट कुछ गड़बड़ है।“
छोटू तो मुझे देखते ही बाबू जी की कोठरी में घुस गया था।
मैं समझ गया कि सब रूपए न देने से नाराज हैं। मुझे लगा कि इस महौल में और
रुकने का कोई मतलब नहीं है अतः बोला
– “भइया,
मैं आया तो था यह सोचकर कि कुछ दिन बाबू जी के पास रुकूँगा लेकिन अब पैसों
का इंतजाम करना भी जरूरी है अतः मैं कल दिन की ट्रेन से निकल जाता हूँ।“
भइया, “जैसी
तुम्हारी इच्छा”
कहकर चुप हो गए।
गर्मी के दिन थे। हम तीनों भाई आँगन में लेटे थे। कोई किसी से कुछ बोल नहीं
पा रहा था पर ऐसा लग रहा था कि सब एक दूसरे के मन की बात समझ रहे हैं। भौजी,
जो पहले घर आने पर मुझे इतना
छेड़ती थीं,
लगता था इसबार मुँह में दही जमा कर बैठ गयी हैं।
सुबह,
अभी उसकी आँख ठीक से खुली भी नहीं थी कि छोटे की आवाज सुनाई पड़ी, “भइया,
मैं बाबूजी को तहसील ले जा रहा हूँ जाँच के लिए।“
“अरे
अकेले कैसे ले जाएगा?”
भइया एकदम चौंक गए। “अकेले
नहीं भइया,
वो रमेसवा है ना! अपना ट्रक्टर ले जा रहा है। नब्बन,
और बबलू भी हैं।“ “और
पइसा,
उसका का इंतजाम है?”
भइया बोले। मैं अभी भी आँखें बन्द किए पड़ा रहा।
“कुछ
होइ गा है कुछ करब। अब ट्रैक्टर के जुगाड़ होइगा है तो हम
सोचित है कि देर न कीन जाय।“
मैं समझ गया कि शाम को कोई ग्राहक हाथ लग गया होगा। घर में हलचल होने लगी
थी अतः मुझे लगा कि शायद भइया ने हाँ कर दी। मैं उठ बैठा। हम तीनों ने
बाबूजी को ट्राली में
लेटाया। वहाँ छोटू के दो तीन दोस्त पहले से मौजूद थे। मैंने छोटू से
पूछा, “मैं
साथ चलूँ?” “तुम
फालतू परेशान होगे। करना तो सब डाक्टर को है और मदद के लिए ये सब घर के ही
तो हैं।“
भइया ने छोटू के दोस्तों की ओर इशारा करते हुए मुझे धर्मसंकट से उबारा।
“छोटू
तू खर्च के लिए थोड़ा बहुत रख ले,
मैं लाता हूँ।“
मैं अंदर जाने लगा तो उसने रोक लिया,
बोला – “कुछ
इंतजाम हो गया है। फिर आपने कल बताया भी तो था कि कैसे अचानक आना पड़ा।
हमारी चिंता छोड़कर आप ड्यूटी
पर जाएँ,
मैं आपको खबर करूँगा।“
ट्रैक्टर चल पड़ा था।
मेरी ट्रेन ११ बजे थी। गाँव
से स्टेशन दूर था।
पैदल रास्ता। मैं बाबूजी के कमरे में पैर छूने के लिए घुसा तो
बिस्तर खाली देखकर चौंक गया। फिर सुबह की बात याद आते ही एक हूक सी उठी।
कमरे से बाहर निकलने को हुआ तो सामने ही उदास आँखें लिए भइया और उनके पीछे
भाभी खड़ी थीं।
मुझे,
मरा मन कुछ कचोटने लगा। मैंने धीरे से अंदर वाली जेब टटोली जिसमें पत्नी के
दिये हुए पाँच हजार रुपये रखे थे। लेकिन यह क्या! रुपये नदारद थे। मैं समझ
गया - निश्चय ही यह छोटू की करामात थी। अब पूछता भी तो ससे और किस मुँह
से?
रास्ते भर सोंचता रहा कि पत्नी का सामना कैसे करूँगा? |
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