अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
09.09.2007
 
कनफ़्यूजड
के.पी. सक्सेना ’दूसरे’

 कल रात जब मैंने पड़ोसी वर्माजी की बेटी को एक नौजवान लड़के के साथ होटल में घुसते देखा तो थोड़ा चौंका। मैं यही सोचता रहा कि यह बात वर्मा जी से बताई या नहीं! कहीं ऐसा न हो कि वर्माजी इसे अपने पारिवारिक मामलों में दखल समझें या यह सोचें कि मैं उन्हें शर्मिंदा करने के लिये यह कह रहा हूँ। फिर यह भी तो हो सकता है कि वह घर से इजाजत लेकर किसी पार्टी में शामिल होने आई हो और वर्मा जी हमें टका-सा जवाब दे दें।

एक विचार यह भी आया कि हो सकता है दोनों में सच्ची मोहब्बत हो और प्लान कर रहे हों कि किस तरह घर वालों को शादी के लिए मनाया जाय! तब तो मैं और भी अपराधी हो जाऊँगा।

अंतत: मैंने चुप रहने का परम व्यावहारिक निर्णय लिया और दूसरे दिन सुबह जब वर्माजी मिले तो जवान को फिसलने से रोकते हुए कुछ औपचारिक बातें करके विदा ले ली। वर्माजी भी कुछ उखड़े 2 से लग रहे थे।

शाम को कालेज से आकर बैठा ही था कि वर्माजी आ गए। मैंने श्रीमती जी से चाय को कहकर उनकी तरफ प्रश्नावाचक निगाह दौड़ाई।

ऐसा लगा कि वे किसी पशोपेश में हैं। फिर थोड़ी देर तक पसरे मौन को तोड़ते हुए वे धीरे से फुसफुसाए, "ज्योति कल शाम सहेली के घर जाने का कहकर निकली थी लेकिन अभी तक लौटी नहीं और सहेली के घर तो गई भी नहीं थी - क्या किया जाय?" उनका गला रुंध गया था।

मैं फिर सोच में पड़ गया कि कल वाली बात बताऊँ या नहीं? अगर बताता हूँ तो कहेंगे तभी या सुबह क्यों  नहीं बताया और अगर नहीं बताता तो ...........

मैं फिर कनफ़्यूजड था।



अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें