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| 09.09.2007 |
| चार मुक्तक के.पी. सक्सेना ’दूसरे’ |
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लाख तुम सूबे बदल दो तट किसी भी नाम कर दो कर नहीं सकते अलग पानी नदी का एक है। 2 आपका लोबान हो या हो हमारी अगरबत्ती हर धुआँ जाता है ऊपर खुशबू हर ज़र्रे में बसती हैं अंधेरे में अगरचे मस्जिदें मंदिर शिवाले रोशनी देगी बराबर गिरजाघर की मोमबत्ती।। 3 ईद मंगल को पड़ गयी होगी होली जुम्में को जल गयी होगी होगी कुछ बात वर्ना बस्ती में चील दावत पे क्यों गयी होगी।। 4 वर्ना भारत पाक में कब का होता मेल।। मुनाबाव से चल पड़ी रेल खोखरापार लेकिन है मंजिल नहीं जाना सरहद पार राम और रहमान में चले सियासी खेल |
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