अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
10.01.2007
 
बापू के बन्दर
के.पी. सक्सेना ’दूसरे’

याद दो दिन साल में,

यूँ ही तुम्हें करते नहीं

बिन तुम्हारे नाम के

हम फूलते फलते नहीं,

 

हो ना जाएँ आपके

’पदचिह्न’ धूमिल इसलिए,

पूजते बापू उन्हें

उनपर कभी चलते नहीं।

 

देख सुनकर भी

ना पहला बोलता

 

दूसरा सुनता नहीं

जो बोलता

 

चौंकते क्यों

सीख ये तुमने ही दी,

 

तीसरा सुनकर

ना आँखें खोलता

 



अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें