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| 10.01.2007 |
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औकात के.पी. सक्सेना ’दूसरे’ |
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“शादी
के पच्चीस बरस बाद जब बेटी के विवाह का समय आ गया है,
तब अचानक तुझे अलग होने की यह क्या सूझी है?”
“अभी
पिछले हफ़्ते ही तो तूने बताया था कि समाचार-पत्र में मेट्रोमोनियल देने के
लिए उससे कहा है और यह कह कर छेड़ा भी था कि जल्दी करो वर्ना बेटी भी कहीं
अपने माँ-बाप की तरह किसी विधर्मी से शादी रचाकर आशीर्वाद लेने न चली आए।”
चुप देखकर सहेली ने उसे उकसाया।
इस बार उसने अपना सर उठाया और आग्नेय नेत्रों से सहेली की ओर देखते हुए,
व्यंग्यात्मक लहजे से बोली- “हाँ!
कल ही तो
’वैवाहिकी’
में छपा है।”
“तो!”
सहेली उसके लहजे का आशय न समझ पायी।
“तो
क्या! जनाब को बेटी के लिए
एक स्वजातीय वर की तलाश है।”
अब उसका स्वर जरा और तीखा हो गया था -
“ये
नहीं लिखा कि माँ की या बाप की! उस समय तो जाति-धर्म सब पुरानपंथी बातें
थीं.....
इंसानों के बीच भेदभाव बनाए रखने की कठमुल्लई साज़िश! अब क्या हुआ?
बात जब बेटी की आयी तो.... आ गए औकात पर। |
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