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09.06.2008
प्रथम पुण्यतिथि (२१ अगस्त) पर विशेष

साझी विरासत की कड़ी थीं कुर्रतुल ऐन हैदर
कृष्ण कुमार यादव


 

पाश्चात्य और प्राच्य संस्कृति की अद्भुत संगम कुर्रतुल ऐन हैदर न सिर्फ उर्दू साहित्य वरन् समूचे भारतीय साहित्य की एक अग्रणी और मूर्धन्य कथाकार थीं। २१ अगस्त २००७ की शाम, मौत इतनी खामोशी से उन्हें अपने आगोश में लेकर चली गई, कि कोई कुछ सोच भी न पाया। इतिहास, दर्शन, राजनीति, अध्यात्म, सभ्यताओं के संघर्ष और सांस्कृतिक परिवर्तनशीलता पर बेबाकी से अपने विचार रखने वाली  कुर्रतुल ऐन हैदर ने सदैव से रचनात्मक विविधता में रंग भरे, फिर चाहे वह उपन्यास, कहानी, लेख, समीक्षा, संस्मरण, आत्मकथा, रिपोर्ताज, अनुवाद, पेटिंग या फोटोग्राफी हो। साझी संस्कृति की संवाहक कुर्रतुल ऐन हैदर, इस्मत चुगताई और अमृता प्रीतम के बाद अकेली ऐसी साहित्यकार थीं, जिनके पास  विभाजन की पीड़ा और नारी संवेदना की पीड़ा समान रूप से विद्यमान थी। कमलेश्वर जी ने कभी इस तिकड़ी हेतु कहा था कि- अमृता प्रीतम, इस्मत चुगताई और कुर्रतुल ऐन हैदर जैसी विद्रोहिणियों ने हिन्दुस्तानी अदब को पूरी दुनिया में एक अलग स्थान दिलाया। जो जिया, जो भोगा या जो देखा, उसे लिखना शायद बहुत मुश्किल नहीं, पर जो लिखा वह झकझोर कर रख दे, तो तय है कि बात कुछ खास ही होगी।

 

ऐनी आपाके नाम से मशहूर कुर्रतुल ऐन हैदर न सिर्फ एक प्रखर साहित्यकार थीं वरन् उतनी ही संवेदनशील शख्सियत भी थीं। यह एक अजीबोगरीब तथ्य है कि बचपन से रईसी व पाश्चात्य संस्कृति में पली-बढ़ी कुर्रतुल ऐन हैदर को लोक संस्कृति के अंगों, लोक नृत्य, अवधी भाशा, गीत-संगीत, पेन्टिंग व पियानो से बेहद लगाव था। अपनी रचनाओं में वे सदैव ऐतिहासिक तथ्यों के बीच इन्सानी फितरत, सामाजिक मेलजोल, मिली-जुली संस्कृति और इन्सानी रिश्तों की कद्रो-कीमत पर जोर देती रहीं। उनका साहित्य आधुनिक जीवन की जटिल परिस्थितियों को अपने में समेटे, समय के साथ परिवर्तित होते मानवीय सम्बन्ध का जीता-जागता दस्तावेज है। आग का दरिया, मेरे भी सनमखाने, आखिर-ए-शब के हमसफर व चाँदनी बेगम जैसे उपन्यासों में सामाजिक विसंगतियों और समकालीन परिस्थितियों का दर्द बखूबी झलकता है। साम्प्रदायिकता का उपचार वह सदैव साझी संस्कृति में ढूँढती रहीं। तभी तो वे बेबाकी से लिखती हैं कि- मिली-जुली संस्कृति किसी अखबार की सुर्खी नहीं, जो दूसरे ही दिन भुला दी जाये। यह तो दुनिया के इतिहास का शीर्षक है जो अपनी जगह महफूज़ भी है और दूसरी संस्कृतियों को अपनी ओर खींचता है। वस्तुतः कुर्रतुल ऐन हैदर के चिन्तन के दायरे को देश-विदेश भ्रमण, लोगों से मुलाकात और अध्ययन से विस्तृत आयाम मिले। उन्होंने दुनिया के उतार-चढ़ावों, बँटवारों, कौमों के पतन को नज़दीक से देखा और महसूस किया। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में भी ये तथ्य व घटनायें प्रतिबिम्बित होती हैं। उनके पात्र दर्शन की बातें करते हैं और अपने सुख-दुख को इतिहास के दर्पण में तौलते हैं। कुर्रतुल ऐन हैदर का यह विशिष्ट अंदाज ही कहा जायेगा कि वे वर्तमान से फौरन ही अतीत की वादियों में लम्बी छलाँग लगा जाती थीं। अपनी रचनाओं में भूत, भविष्य और वर्तमान को संजोकर वे एक जादुई माहौल तैयार करती थीं। यहाँ पर वे इस्मत चुगताई के करीब थीं, जो अपने पात्रों की परतें तुरन्त नहीं खोलतीं, अपितु उनसे संवाद करते हुये धीरे-धीरे ऐतिहासिक गर्तों के बहाने उनमें डूबती जातीं। उनकी रचनाओं में व्याप्त पात्रों की फलसफी अंदाज़ की बातें हर किसी की समझ में नहीं आतीं। अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहाये जाने पर उन्होंने तीखी प्रतिक्रिया करते हुये हिन्दू-मुसलमान दोनों को खरी-खरी सुनाई थी। कबीर को उद्धृत करते हुये उन्होंने कहा था कि- अरे, इन दोउ राह न पाई।

              

२० जनवरी  १९२७ को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जनपद में जन्मीं कुर्रतुल ऐन हैदर मूलतः बिजनौर जनपद स्थित नहटौर के एंग्लो-इण्डियन जागीरदार घराने से थीं। उनके पिता सज्जाद हैदर यलदरम उर्दू साहित्य के प्रथम कहानीकार होने के साथ-साथ ब्रिटिश शासन के राजदूत की हैसियत से अफगानिस्तान, तुर्की इत्यादि देशों में तैनात रहे थे, तो माँ नजर सज्जाद हैदर भी एक मशहूर साहित्यकार थीं। कुर्रतुल ऐन हैदर ने अपनी शुरुआती तालीम लालबाग, लखनऊ स्थित गाँधी स्कूल में प्राप्त की व तत्पश्चात अलीगढ़ से हाईस्कूल पास किया। लखनऊ के मशहूर आई०टी०कालेज से बी०ए० व लखनऊ विश्वविद्यालय से ही उन्होंने एम०ए० किया। बाद में कुर्रतुल ऐन हैदर ने लन्दन के हीदरलेस आर्ट्स स्कूल में शिक्षा ग्रहण की। चूँकि कुर्रतुल ऐन हैदर को साहित्यिक परिवेश बचपन से ही मिला था सो अल्पायु में उनका लेखन कार्य  आरम्भ हो गया। कहा जाता है कि उन्होंने अपनी पहली कहानी मात्र छः वर्ष की अल्पायु में ही लिखी थी, पर वह कहीं प्रकाशित नहीं हो सकी। बी चुहिया उनकी प्रथम प्रकाशित कहानी है  और १८ वर्ष की आयु में उनका प्रथम कहानी संग्रह शीशे का घर प्रकाशित हो चुका था। अगले ही वर्ष १९ वर्ष की आयु में उनका प्रथम उपन्यास मेरे भी सनमखाने प्रकाशित हुआ। कुर्रतुल ऐन हैदर ने उस समय लिखना आरम्भ किया, जब आधुनिक उपन्यास हिन्दी साहित्य में अपनी जड़ें जमा रहा था।

 

मात्र २० वर्ष की आयु में कुर्रतुल ऐन हैदर ने न सिर्फ मुल्क का बँटवारा देखा बल्कि साझी संस्कृति का शीराजा भी बिखरते देखा। इस बँटवारे ने उनके परिवार को छिन्न-भिन्न कर दिया और उनके भाई-बहन व रिश्तेदार पाकिस्तान पलायन कर गए। लखनऊ में अपने पिता की मौत के बाद कुर्रतुल ऐन हैदर भी अपने बड़े भाई मुस्तफा हैदर के साथ पाकिस्तान पलायन कर गयीं। बँटवारे की टीस कुर्रतुल ऐन हैदर को सदैव सालती रही और भारत से उनका लगाव बना रहा। वैसे भी साझी संस्कृति की हिमायती हैदर का मजहबी आधार पर बने पाकिस्तान में जाकर बसना स्वयं में विरोधाभास था। फिर वह वहाँ ज्यादा दिन कैसे टिक पातीं, सो १९५१ में वे लन्दन चली गयीं। वहाँ स्वतंत्र लेखक व पत्रकार के रूप में वह बी०बी०सी० लन्दन से जुड़ीं तथा दि टेलीग्राफ की रिपोर्टर व इम्प्रिंट पत्रिका की प्रबन्ध सम्पादक भी रहीं। कुर्रतुल ऐन हैदर इलेस्ट्रेड वीकली की सम्पादकीय टीम में भी रहीं।

१९५६ में जब वे भारत भ्रमण पर आईं तो उनके पिताजी के अभिन्न मित्र मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने उनसे पूछा कि क्या वे भारत आना चाहतीं हैं? कुर्रतुल ऐन हैदर के हामी भरने पर उन्होंने इस दिशा में कोशिश करने की बात कही और अन्ततः वे वह लन्दन से आकर मुम्बई में रहने लग। आजीवन अविवाहित रहीं कुर्रतुल ऐन हैदर सदैव से एक आज़ाद ख्याल की शख्सियत थीं। कहते हैं कि बचपन में जब वे गुड़ियों से खेलती थीं, तो खेल-खेल में भी कभी गुड़िया की शादी नहीं की। इसी प्रकार जब उनके पिताजी स्थानान्तरित होकर अंडमान गये तो वहाँ दूर तक फैला हुआ समुद्र देखकर कुर्रतुल ऐन हैदर ने बाल जिज्ञासा में पूछा कि- अम्मी! यह समुद्र बनाने के लिये कितनी ज़मीन खरीदी गयी थी। उनके इस सवाल पर उनकी अम्मी भी अवाक रह गयी थीं। निहायत नफ़ीस, विनोदप्रिय और साथ में सख्त मिज़ाज कुर्रतुल ऐन हैदर अदम्य जीवन प्रवाह की गाथाकार थीं। वह एक साथ प्रगतिशील भी थीं, आधुनिक भी और परम्परावादी भी। वर्ष १९५९ में जब उनका बहुचर्चित उपन्यास आग का दरिया प्रकाशित हुआ तो इसकी तपिश से पाकिस्तान में उनके खिलाफ तूफान उठ खड़ा हुआ। इस उपन्यास पर हिन्दू संस्कृति व दर्शन के प्रचार-प्रसार का आरोप था। वस्तुतः इस उपन्यास के माध्यम से कुर्रतुल ऐन हैदर ने ईसा पूर्व चौथी शताब्दी से लेकर १९४७ तक की भारतीय समाज की सांस्कृतिक और दार्शनिक बुनियादों को समकालीन परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित करते हुये अपनी वैविध्यपूर्ण रचनाशीलता का एक ऐसा आकर्षक, भव्य और गम्भीर संसार निर्मित किया, जिसका चमत्कार सारे साहित्यिक जगत ने महसूस किया। इस उपन्यास में उन्होंने हिन्दुस्तानी संस्कृति के बारे में एक जगह लिखा कि – “हिन्दू संस्कृति की खुसूसियत यह है कि इसमें कोई किसी को हुक्म नहीं देता है कि यह करो, वह करो, यह तो करना ही है।

कुर्रतुल ऐन हैदर ने उर्दू साहित्य को बढ़ावा देने के लिये अथक प्रयास किये। साहित्य अकादमी में उर्दू सलाहकार बोर्ड की वे दो बार सदस्य भी रहीं। विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में वे जामिया इस्लामिया विश्वविद्यालय व अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय और अतिथि प्रोफेसर के रूप में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से भी जुड़ी रहीं। उनके बहुचर्चित उपन्यास आग का दरियाको वर्ष १९८९ में भारतीय साहित्यिक जगत के सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा गया। इससे पहले उर्दू साहित्य में ज्ञानपीठ पुरस्कार मात्र फ़िराक़ गोरखपुरी को ही मिला था। वस्तुतः कुर्रतुल ऐन हैदर से पूर्व भारत में उर्दू साहित्य में जो शून्यतापूर्ण उदासी थी, उसमें उन्होंने अपनी रचनाओं से नया रंग भरा और उसे बुलन्दियों तक पहुँचाया। अपने साहित्यिक जीवन में १२ उपन्यास, ४ लघुकथा संग्रह, रिपोतार्ज व जीवनी लिखकर हिन्दी-उर्दू साहित्य के बीच एक सेतु की भूमिका निभाने वाली कुर्रतुल ऐन हैदर की प्रमुख कृतियों में- मेरे भी सनमखाने, आग का दरिया, सफीन-ए-गम-ए-दिल, कारे जहाँ दराज, आखिर-ए-शब के हमसफर, गर्दिशे रंगे चमन, शीशे का घर, चाँदनी बेगम, पतझड़ की आवाज, सितारों के आगे, दास्तान-ए-अहदे-गुल, यह दाग उजाला, सीता हरण, चार नावें लेट, चाय का घर, अगले जनम मोहे बिटिया न कीज्यौ इत्यादि का नाम लिया जा सकता है। उनके साहित्य का अंग्रेजी व कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी हुआ। कुर्रतुल ऐन हैदर की एक खासियत यह थी कि वे अपने उपन्यासों के शीर्षक चर्चित शेर या लोक संस्कृति में रंगे गीतों की गुनगुनाती पंक्तियों से उठाती थीं। गालिब के चर्चित शेर-ये इश्क़ नहीं आसां बस इतना समझ लीजै, इक आग का दरिया है और डूब के जाना हैसे उन्होंने अपने बहुचर्चित उपन्यास आग का दरिया शीर्षक लिया तो एक पारम्परिक लोकगीत से अगले जनम मोहे बिटिया न कीज्यौ शीर्षक लिया। कुर्रतुल ऐन हैदर को यद्यपि साहित्य विरासत में मिला पर उनकी रचनाओं में उनके अध्ययन, मनन, चिन्तन, दूरदर्शिता और मानवीय जीवन के करीब रहकर सोचने का भी प्रमुख हाथ है। कुर्रतुल ऐन हैदर को उनकी प्रखर रचनाधर्मिता हेतु पद्मभूषण (२००५), ज्ञानपीठ पुरस्कार (१९८९), पद्मश्री (१९८४), साहित्य अकादमी सम्मान (१९८५), सोवियतलैण्ड नेहरू पुरस्कार (१९८९) व इकबाल सम्मान (१९८७) से नवाजा गया।

 

उर्दू की मशहूर साहित्यकार व उपन्यासकार रहीं कुर्रतुल ऐन हैदर हिन्दी-उर्दू की मिश्रित परम्परा की कड़ी थीं। वे इस बात को संजीदगी के साथ महसूस करती थीं कि हिन्दी-उर्दू की मिली-जुली परम्परा ही दोनों देषों को तरक्की के रास्ते ले जा सकती है।  ऐसे में जब पाकिस्तान ने विशुद्ध इस्लामी संस्कृति पर आधारित संगीत के सृजन पर जोर दिया तो कुर्रतुल ऐन हैदर ने इसे मिश्रित परम्परा के विरुद्ध बताते हुये पाकिस्तान संस्कृति प्रसारण विभाग के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। कुर्रतुल ऐन हैदर ने इस मिश्रित संस्कृति के अंदाज़ को यूँ जिया- बच्चा मुसलमान के घर होता है, गीत कृष्ण-कन्हैया के गाये जाते हैं, मुसलमान बच्चे बरसात की दुआ माँगने के लिए मुँह नीला-पीला किये गली-गली टीन बजाते हैं, साथ-साथ चिल्लाते हैं- हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की। मुसलमान पर्दानशीं औरतें जिन्होंने पूरी उम्र किसी गैर मर्द से बात नहीं की, जब ढोलक लेकर बैठती हैं तो लहक-लहक कर अलापती हैं- भरी गगरी मेरी ढलकाई तूने, श्याम हाँ तूने। साम्प्रदायिकता का उपचार वह सदैव साझी संस्कृति में ढूँढती रहीं। तभी तो वे बेबाकी से लिखती हैं कि- मिली-जुली संस्कृति किसी अखबार की सुर्खी नहीं, जो दूसरे ही दिन भुला दी जाये। यह तो दुनिया के इतिहास का शीर्षक है जो अपनी जगह महफूज़ भी है और दूसरी संस्कृतियों को अपनी ओर खींचता है।

 

अवधी संस्कृति और तहज़ीब व तमद्दुन के शहर लखनऊ से कुर्रतुल ऐन हैदर का गहरा नाता रहा। इसका एक कारण यह भी था कि यहीं से उन्होंने बी०ए० व एम०ए० की तालीम ग्रहण की थी। बँटवारे के बाद जब अवध की तहज़ीब का शीराजा उन्होंने बिखरते देखा तो उनकी सारी रूमानियत चूर-चूर हो गयी और जिन्दगी व साहित्य की कडवी सच्चाईयों के प्रति उनमें काफी गम्भीरता झलकने लगी थी। लखनऊ की दुर्दशा पर उन्होंने अपनी पीड़ा भी व्यक्त की कि-तहज़ीब के शहर की तहज़ीब पता नहीं कौन चुरा ले गया?” फिर भी जब कभी वह लखनऊ आतीं तो यहाँ के गली-कूचों में घूम-घूम कर पुरानी याद को ताजा करतीं। कुर्रतुल ऐन हैदर की रचनाओं में घूम-फिर कर अवध व लखनऊ और यहाँ की गंगा-जमुनी तहज़ीब के ज़िक्र दिखते हैं। अवधी की पृष्ठभूमि में रचे गये मेरे भी सनमखाने में कुँवर इरफान अली और रक्षंदा के जरिये उन्होंने क्रमशः परम्परागत मूल्यों और नई संस्कृति के टकरावों का रोचक वर्णन किया है तो चाँदनी बेगम लखनऊ रेड रोज की कोठी के इर्द-गिर्द रचे बसे और परिवर्तित होते समाज, रिश्तों व चरित्र की तस्वीरें पेश करती हैं। उनके बहुचर्चित उपन्यास आग का दरिया में भी लखनऊ की सरजमीं व तहज़ीब का विस्तृत वर्णन है। स्ट्रीट सिंगर्स ऑफ लखनऊ एण्ड अदर स्टोरीज  में गंगा-जमुनी तहज़ीब को कहानियों में बखूबी ढाला गया है। कुर्रतुल ऐन हैदर की रचनाओं में मानवीय बेबसी व पीड़ा की ऐसी वास्तविक व यथार्थ अभिव्यक्ति हुई है कि पात्रों के साथ पाठक का स्वतः एक हमदर्द जुड़ाव हो जाता है।

     

ज्वलंत मुद्दों पर जबरदस्त पकड़ के साथ-साथ कुर्रतुल ऐन हैदर के लेखन में विद्रोह का भी स्वर था। उन्होंने परम्पराओं को जिया तो दकियानूसी से उन्हें निजात भी दिलायी। एक नारी होने के चलते कुर्रतुल ऐन हैदर ने अपनी लेखनी समकालीन समाज में नारी की स्थिति पर भी चलायी। अस्तित्ववादी विचारों की पोषक सीमोन डी बुआ ने सेकेण्ड सेक्स में स्त्रियों के विरूद्ध होने वाले अत्याचारों और अन्यायों का विश्लेषण करते हुए लिखा था कि- पुरुष ने स्वयं को विशुद्ध चित्त

(Being-for-itself :  - स्वयं में सत्) के रूप में परिभाषित किया है और स्त्रियों की स्थिति का अवमूल्यन करते हुए उन्हें अन्यके रूप में परिभाषित किया है व इस प्रकार स्त्रियों को वस्तु रूप में निरूपित किया गया है। कुर्रतुल ऐन हैदर बुआ के इस विचार से पूर्णतया इत्तफाक रखती थीं और मानती थीं कि समाज का एक बड़ा वर्ग स्त्री को सेक्सका पर्यायवाची बनाकर उसे यौन प्राणी मात्र के रूप में देखता है अर्थात पुरुष को विषयी, निरपेक्ष व स्वायत्त रूप में एवं स्त्री को विषय, अन्य, सापेक्ष व पराधीन रूप में माना जाता है। कुर्रतुल ऐन हैदर इस ख्यालात से एकदम भिन्न नज़रिया रखती थीं कि - नारी अपने शरीर के जंजाल से मुक्त नहीं हो पाती। कुर्रतुल ऐन हैदर इस मत की कायल थीं कि नारी देह न तो कोई प्रदर्शन की चीज है, न मनोरंजन की और न लेन-देन की। वे नारी देह की बजाय उसके दिमाग पर जोर देती थीं। उनका मानना था कि दिमाग पर बात आते ही नारी पुरुष के समक्ष खड़ी दिखायी देती है, जो कि पुरुशों को बर्दाश्त नहीं। इसी कारण पुरुष नारी को सिर्फ देह तक सीमित रखकर उसे गुलाम बनाये रखना चाहता है। यहाँ पर कुर्रतुल ऐन हैदर की तरह ही विद्रोहिणी रही अमृता प्रीतम की रचना दिल्ली की गलियाँ याद आती है, जब  कामिनी नासिर की पेंटिग देखने जाती है तो कहती है- तुमने वूमेन विद फ्लॉवर,  वूमेन विद ब्यूटी या वूमेन विद मिरर को तो बड़ी खूबसूरती से बनाया पर वूमेन विद माइंड बनाने से क्यों रह गए। निश्चिततः यह कथ्य पुरुष वर्ग की उस मानसिकता को दर्शाता है जो नारी को सिर्फ भावों का पुंज समझता है, एक समग्र व्यक्तित्व नहीं। सीमोन डी बुआ और अमृता प्रीतम की परम्परा में कुर्रतुल ऐन हैदर भी नारी को मर्दवादी यौनिकतासे परे एक स्वतंत्र व समग्र व्यक्तित्व के रूप में देखती थीं।

 

आज कुर्रतुल ऐन हैदर हमारे बीच नहीं रहीं पर उनके धारदार विचार समकालीन प्रासंगिकता के साथ आज भी मौजूद हैं। चाहे वह जातिवाद, सम्प्रदायवाद के बहाने साझी संस्कृति की बुनियाद को कमजोर करने वाले हों या विज्ञापनों के बहाने नारी को एक भोगवादी वस्तु के रूप में पेश करने वाले हों, उनके प्रतिकार के लिये कुर्रतुल ऐन हैदर के विचार सदैव प्रासंगिक हैं। साझी संस्कृति में आस्था के साथ न सिर्फ उन्होंने उर्दू-हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया अपितु हमें अपनी ऐतिहासिक विरासतों से जोडते हुये एक नये समाज का सपना भी दिखाया। कुर्रतुल ऐन हैदर को मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत, परम्परा व आधुनिकता एवं साझी संस्कृति की संवाक के रूप में, एक ऐसी प्रगतिशील साहित्यकार व लेखिका रूप में याद रखा जायेगा, जिसने तमाम विरोधों के बावजूद अपनी लेखनी को सच्चाई व यथार्थ से परे नहीं होने दिया । समकालीन समाज में जिस रूप में कट्टरपंथी विचार बढ़ रहे हैं, उनके प्रतिकार हेतु कुर्रतुल ऐन हैदर के आग के दरियाकी तपिश कभी नहीं खत्म होगी।


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