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05.31.2008
 

रसगुल्ला
कृष्ण कुमार यादव


रसगुल्ला मैं गोल-मटोल
खोल दूँ पेटुओं की पोल

सबके मन को हूँ मैं भाता
हर कोई देख मुझे ललचाता

हर उत्सव की जान हूँ
मिठाईयों की शान हूँ

फटे दूध से ही बन जाऊँ
सबके मुँह में पानी लाऊँ

बच्चे खायें चोरी-चोरी
ना चले किसी की सीनाजोरी।


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