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| 03.12.2009 |
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फक्कड़ कवि थे निराला |
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‘अभी
न होगा मेरा अंत
अभी-अभी तो आया है,
मेरे
वन मृदुल वसन्त
अभी न होगा मेरा अन्त।’
निराला की
रचनाओं में अनेक प्रकार के भाव पाए जाते हैं। यद्यपि वे खड़ी बोली के कवि थे,
पर
ब्रजभाषा व अवधी में भी कविताएँ ढ़ लेते थे। उनकी रचनाओं में कहीं प्रेम की
सघनता है,
कहीं आध्यात्मिकता तो कहीं विपन्नों के प्रति सहानुभूति व सम्वेदना,
कहीं देश-प्रेम का जज्बा तो कहीं सामाजिक रूढ़ियों का विरोध व कहीं प्रकृति
के प्रति झलकता अनुराग। इलाहाबाद में पत्थर तोड़ती महिला पर लिखी उनकी कविता
आज भी सामाजिक यथार्थ का एक आईना है। उनका जोर वक्तव्य पर नहीं वरन चित्रण
पर था,
सड़क के किनारे पत्थर तोड़ती महिला का रेखाकंन उनकी काव्य चेतना की
सर्वोच्चता को दर्शाता है -
वह तोड़ती पत्थर
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर
वह तोड़ती पत्थर
कोई न छायादार पेड़
वह जिसके तले बैठी हुयी स्वीकार
श्याम तन,
भर
बंधा यौवन
नत नयन प्रिय,
कर्म-रत मन
गुरू हथौड़ा हाथ,
करती
बार-बार प्रहार
सामने तरू- मल्लिका अट्टालिका,
प्राकार।
इसी
प्रकार राह चलते भिखारी पर उन्होंने लिखा-
पेट-पीठ
दोनों मिलकर हैं एक
चल रहा
लकुटिया टेक
मुट्ठी
भर दाने को,
भूख
मिटाने को
मुँह फटी
पुरानी झोली को फैलाता
दो टूक
कलेजे के करता पछताता।
‘राम
की शक्ति पूजा’
के
माध्यम से निराला ने राम को समाज में एक आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया।
वे लिखते हैं-
होगी
जय,
होगी
जय
हे
पुरुषोत्तम नवीन
कह महाशक्ति राम के बदन में हुईं लीन।
सौ पदों
में लिखी गयी
‘तुलसीदास’
निराला की सबसे बड़ी कविता है,
जो
कि १९३४ में लिखी गयी और १९३५ में सुधा के पाँच अंकों में किस्तवार
प्रकाशित हुयी। इस प्रबन्ध काव्य में निराला ने पत्नी के युवा तन-मन के
आकर्षण में मोहग्रस्त तुलसीदास के महाकवि बनने को बखूबी दिखाया है-
जागा,
जागा
संस्कार प्रबल
रे
गया काम तत्क्षण वह जल
देखा
वामा,
वह न
थी,
अनल
प्रमिता वह
इस ओर
ज्ञान,
उस ओर
ज्ञान
हो
गया भस्म वह प्रथम भान
छूटा
जग का जो रहा ध्यान।
निराला की
रचनाधर्मिता में एकरसता का पुट नहीं है। वे कभी भी बँधकर नहीं लिख पाते थे
और न ही यह उनकी फक्कड़ प्रकृति के अनुकूल था। निराला की
‘जूही
की कली’
कविता आज भी लोगों के जेहन में बसी है। इस कविता में निराला ने अपनी
अभिव्यक्ति को छंदों की सीमा से परे छन्दविहीन कविता की ओर प्रवाहित किया
है-
विजन-वन वल्लरी पर
सोती
थी सुहाग भरी स्नेह स्वप्न मग्न
अमल
कोमिल तन तरूणी जूही की कली
दृग
बंद किये,
शिथिल
पत्ांक में
वासन्ती निशा थी।
यही नहीं,
निराला एक जगह स्थिर होकर कविता-पाठ भी नहीं करते थे। एक बार एक समारोह में
आकाशवाणी को उनकी कविता का सीधा प्रसारण करना था,
तो
उनके चारों ओर माइक लगाए गए कि पता नहीं वे घूम-घूम कर किस कोने से कविता
पढ़ें। निराला ने अपने समय के मशहूर रजनीसेन,
चण्डीदास,
गोविन्द दास,
विवेकानन्द और रवीन्द्र नाथ टैगोर इत्यादि की बंग्ला कविताओं का अनुवाद भी
किया,
यद्यपि उन पर टैगोर की कविताओं के अनुवाद को अपना मौलिक कहकर प्रकाशित
कराने के आरोप भी लगे। राजधानी दिल्ली को भी निराला ने अपनी कविताओं में
अभिव्यक्ति दी-
यमुना
की ध्वनि में है गूँजती सुहाग-गाथा
सुनता
है अन्धकार खड़ा चुपचाप जहाँ
आज वह
‘फिरदौस’,
सुनसान है पड़ा
शाही
दीवान,
आम
स्तब्ध है हो रहा है
दुपहर
को,
पार्श्व में उठता है झिल्ली रव
बोलते
हैं स्यार रात यमुना-कछार में
लीन
हो गया है रव शाही अँगनाओं का
निस्तब्ध मीनार,
मौन
हैं मकबरे।
निराला की
मौलिकता,
प्रबल भावोद्वेग,
लोकमानस के हृदय पटल पर छा जाने वाली जीवन्त व प्रभावी शैली,
अद्भुत वाक्य विन्यास और उनमें अन्तर्निहित गूढ़ अर्थ उन्हें भीड़ से अलग
खड़ा करते हैं। वसन्त पंचमी और निराला का सम्बन्ध बड़ा अद्भुत रहा और इस दिन
हर साहित्यकार उनके सानिध्य की अपेक्षा रखता था। ऐसे ही किन्हीं क्षणों में
निराला की काव्य रचना में यौवन का भावावेग दिखा-
रोक-टोक से कभी नहीं रुकती है
यौवन-मद की बाढ़ नदी की
किसे
देख झुकती है
गरज-गरज वह क्या कहती है,
कहने
दो
अपनी
इच्छा से प्रबल वेग से बहने दो।
यौवन के
चरम में प्रेम के वियोगी स्वरूप को भी उन्होंने उकेरा-
छोटे
से घर की लघु सीमा में
बंधे
हैं क्षुद्र भाव
यह सच
है प्रिय
प्रेम
का पयोधि तो उमड़ता है
सदा
ही निःसीम भूमि पर।
निराला के
काव्य में आध्यात्मिकता,
दार्शनिकता,
रहस्यवाद और जीवन के गूढ़ पक्षों की झलक मिलती है पर लोकमान्यता के आधार पर
निराला ने विषयवस्तु में नये प्रतिमान
स्थापित किये और समसामयिकता के पुट को भी खूब उभारा। अपनी पुत्री
सरोज के असामायिक निधन और साहित्यकारों के एक गुट द्वारा अनवरत अनर्गल
आलोचना किये जाने से निराला अपने जीवन के अन्तिम वर्षों में मनोविक्षिप्त
से हो गये थे। पुत्री के निधन पर शोक-सन्तप्त निराला
‘सरोज-स्मृति’
में लिखते हैं-
मुझ
भाग्यहीन की तू सम्बल
युग
वर्ष बाद जब हुयी विकल
दुख
ही जीवन की कथा रही
क्या
कहूँ आज,
जो
नहीं कही।
१५
अक्टूबर १९६१ को अपनी यादें छोड़कर निराला इस लोक को अलविदा कह गये पर
मिथक और यथार्थ के बीच अन्तर्विरोधों के बावजूद अपनी रचनात्मकता को
यथार्थ की भावभूमि पर टिकाये रखने वाले निराला आज भी हमारे बीच जीवन्त हैं।
मुक्ति की उत्कट आकांक्षा उनको सदैव बेचैन करती रही,
तभी तो उन्होंने लिखा-
तोड़ो,
तोड़ो,
तोड़ो
कारा
पत्थर
की,
निकलो
फिर गंगा-जलधारा
गृह-गृह की पार्वती
पुनः
सत्य-सुन्दर-शिव को सँवारती
उर-उर
की बनो आरती
भ्रान्तों की निश्चल ध्रुवतारा तोड़ो, तोड़ो, तोड़ो कारा। |
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