अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
01.17.2009
 

भूमण्डलीकरण के दौर में हिन्दी
कृष्ण कुमार यादव


भूमण्डलीकरण, उदारीकरण, उन्नत प्रौद्योगिकी एवं सूचना-तकनीक के बढ़ते इस युग में सबसे बड़ा खतरा भाषा, साहित्य और संस्कृति के लिए पैदा हुआ है। इतिहास साक्षी है कि जब-जब समाज  पथभ्रमित हुआ है या अपसंस्कृति हावी हुई है तो साहित्य ने ही उसे सँभाला है। कहा भी गया है कि- साहित्य समाज का दर्पण है। साहित्य का सम्बन्ध सदैव संस्कृति से रहा है और हिन्दी भारतीय संस्कृति की अस्मिता की पहचान है। संस्कृत वाग्ङमय का पूरा सांस्कृतिक वैभव हिन्दी के माध्यम से ही आम जन तक पहुँचा है। हिन्दी का विस्तार क्षेत्र काफी व्यापक रहा है, यहाँ तक कि उसमें संस्कृत साहित्य की परंपरा और लोक भाषाओं की वाचिक परम्परा की संस्कृति भी समाविष्ट रही है। स्वतंत्रता संग्राम में भी हिन्दी और उसकी लोकभाषाओं ने घर-घर स्वाधीनता की जो लौ जलायी वह मात्र राजनैतिक स्वतंत्रता के लिए ही नहीं थी, वरन् सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा के लिए भी थी। भारत में साहित्य, संस्कृति और हिन्दी एक दूसरे के दर्पण रहे हैं ऐसा कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा।

यह एक सच्चाई है कि स्वतंत्रता से पूर्व हिन्दी ने अँग्रेज़ी राज के विरूद्ध लोगों को जोड़ने का कार्य किया पर स्वतंत्रता पश्चात उसी अँग्रेज़ी को हिन्दी का प्रतिद्वंद्वी बना दिया गया। भारत सदैव से विभिन्नताओं का देश रहा है। आज संसार भर में लगभग ५००० भाषाएँ और बोलियाँ बोली जाती हैं। उनमें से  लगभग १६५२ भाषाएँ व बोलियाँ भारत में सूचीबद्ध की गई हैं जिनमें ६३ भाषाएँ अभारतीय हैं। चूँकि इन १६५२ भाषाओं को बोलने वाले समान अनुपात में नहीं हैं अतः संविधान की आठवीं अनुसूची में १८ भाषाओं को शामिल किया गया जिन्हें देश की कुल जनसंख्या के ९१ प्रतिशत लोग प्रयोग करते हैं। इनमें भी सर्वाधिक ४६ प्रतिशत लोग हिन्दी का प्रयोग करते हैं अतः हिन्दी को राजभाषा को रूप में वरीयता दी गयी। अधिकतर भारतीय भाषाएँ दो समूहों से आती हैं - आर्य भाषा परिवार की भाषाएँ और द्रविड़ भाषा परिवार की भाषाएँ। द्रविड़ भाषाओं व बोलियों का एक अलग ही समूह ह और आर्य भाषाओं के आगमन के बहुत पहले से ही भारत में उनका उपयोग किया जा रहा है। तमिल, तेलुगू, कन्नड़ और मलयालम प्रमुख द्रविड़ भाषाएँ हैं। आर्य भाषा में सबसे प्राचीन संस्कृत भाषा (२५०० ई० पू०- ५०० ई० पू०) घ्घ्घ्घ् जाती है। वेदों की रचना भी संस्कृत में की गई। संस्कृत माने परिमार्जित अथवा विशुद्ध। संस्कृत किसी समय जनभाषा थी पर व्याकरण के कठोर नियमों और उच्चारण की कठिनता के कारण संस्कृत विशिष्ट वर्ग की भाषा बनकर रह गयी। संस्कृत के साथ ही उस समय कई लोकभाषाएँ प्रचलित थीं, जिनसे संस्कृत के विभिन्न रूप प्रचलित हुए। संस्कृत के इन विभिन्न रूपों से विभिन्न प्राकृतों व अपभ्रंशों का विकास हुआ और अंत में हिन्दी आदि प्रान्तीय भाषाओं (१००० ई० के लगभग) का विकास हुआ। कुल ७ अपभ्रंशों से आधुनिक भारतीय भाषाओं का विकास माना जाता है, जिसमें शौरसेनी से पश्चिमी हिन्दी (खड़ी बोली, ब्रजभाषा, वांगरू, कन्नौजी व बुन्देली बोलियाँ), राजस्थानी (मारवाड़ी, जयपुरी, मालवी व मेवाती बोलियाँ), और गुजराती भाषा, महाराष्ट्री से मराठी भाषा (दक्षिणी, कोंकणी, नागपुरी व बरारी बोलियाँ), मागधी से भोजपुरी मैथिली, मगही, बंगला, उड़िया व असमी भाषाएँ, अर्धमागधी से पूर्वी हिन्दी (अवधी, बघेली व छत्तीसगढ़ी बोलियाँ), पैशाची से लहँदी, ब्राचउ से सिंधी व पंजाबी भाषा तथा खस से पहाड़ी भाषाओं का उद्भव हुआ। आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं  में सर्वाधिक लोकप्रिय हिन्दी भाषा हुई। कबीर की निर्गुण भक्ति एवम् भक्ति काल के सूफी-संतों ने हिन्दी को काफी समृद्ध किया। कालांतर में मलिक मुहम्मद जायसी ने पद्मावत और गोस्वामी तुलसीदास  ने रामचरितमानस की अवधी में रचना कर हिन्दी को और भी जनप्रिय बनाया। अमीर ख़ुसरो ने इसे हिंदवी गाया तो हैदराबाद के मुस्लिम शासक कुली कुतुबशाह ने इसे जबाने हिन्दी बताया। स्वतंत्रता तक हिन्दी ने कई पड़ावों को पार किया व दिनों-ब-दिन और भी समृद्ध होती गई। सन् १७४१ में राम प्रसाद निरंजनी द्वारा  खड़ी बोली में प्रथम ग्रंथ भाषा योग्यवासिष्ठ लिखा गया तो सन् १७९६ में देवनागरी लिपि में टाइप की गयी प्रथम प्रिंटिंग तैयार हुई। सन् १८०५ में फोर्ट विलियम कॉलेज, कलकत्ता के लिए अध्यापक जान गिलक्राइस्ट के आदेश से लल्लू लाल जी ने खड़ी बोली गद्य में प्रेमसागर लिखा जिसमें भागवत दशम्‌स्कंध की कथा वर्णित की गई। यह अँग्रेज़ों द्वारा भारतीय संस्कृति को हिन्दी के माध्यम से समझने का एक शुरूआती  प्रयास  था। सन् १८२६ में कानपुरवासी पं० जुगल किशोर ने हिन्दी का प्रथम समाचार पत्र उदंत मार्तंड निकालना शुरू किया, जो एक वर्ष बाद ही सहायता के अभाव में बंद हो गया। सन् १८३५ एक निर्णायक वर्ष था जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सरकार ने मैकाले की अनुशंसा पर ७ मार्च १८३५ को अँग्रेज़ी शिक्षा के प्रचार का प्रस्ताव पास कर दिया और धीरे-धीरे अँग्रेज़ी के स्कूल खुलने लगे। हिन्दी को अलग-थलग करने का एक अन्य कारण अँग्रेज़ों की फूट डालो और राज करोकी नीति भी थी। अँग्रेज़ी शिक्षा का प्रस्ताव पास  होने के बाद भी अदालतों के कामकाज की भाषा फारसी ही रही। सर सैयद अहमद खान ने भी हिन्दी को एक गँवारी बोली बताकर अँग्रेज़ों को उर्दू की ओर झुकाने की लगातार चेष्टा की। इस बीच सन् १८९३ में बनारस में नागरी प्रचारिणी सभाका गठन इन सबकी प्रतिक्रिया स्वरूप हिन्दी को एक भाषा के रूप में बढ़ावा देने हेतु किया गया। बनारस के राजा शिव प्रसाद भी  हिन्दी की रक्षा के लिए उठ खडे हुए और निरन्तर यत्नशील रहे। सन् १९१३ में शिक्षा विभाग के इंस्पेक्टर के रूप में राजा शिवप्रसाद ने हिन्दी को विचलन से बचाने हेतु ठेठ हिन्दी का आश्रय लिया जिसमें फारसी-अरबी के चालू शब्द भी शामिल थे। सन् १९१३ में ही हिन्दी में पहली मूक फिल्म राजा हरिश्चन्द्रका निर्माण हुआ तो सन् १९३१ में हिन्दी की पहली बोलती फिल्म आलम आराका निर्माण किया गया। इस बीच राजनैतिक स्तर पर भी हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने हेतु कई समाज सुधारकों व साहित्यकारों ने यत्न किए। गुजराती कवि नर्मद (१८३३-८६) ने हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाने का प्रस्ताव किया तो सन् १९१८ में मराठी भाषी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने कांग्रेस अध्यक्ष की हैसियत से घोषित किया कि- हिन्दी भारत की राजभाषा होगी। उसी समय देश की राजनीति में एक नक्षत्र की भांति तेजी से उभर रहे गुजराती भाषी महात्मा गाँधी ने भी कहा -हिन्दी ही देश को एकसूत्र में बाँध सकती है। मुझे अँग्रेज़ी बोलने में शर्म आती है और मेरी दिली इच्छा है कि देश का हर नागरिक हिन्दी सीख ले व देश की हर भाषा देवनागरी में लिखी जाये। उन्होनें इसको तार्किक रूप देते हुए कहा कि – “सभी भाषाओं को एक ही लिपि में लिखने से वही लाभ होगा जो यूरोप की तमाम भाषाओं को एक ही लिपि में लिखे जाने से हुआ। इससे तमाम यूरोपीय भाषाएँ अधिक विकसित और समुन्नत हुयीं। १९१८ में इन्दौर में हिन्दी साहित्य सम्मेलन सभा में महात्मा गाँधी ने दक्षिण भारत में हिन्दी प्रचारकों को भेजा, इनमें स्वयं  उनके पुत्र देवदास गाँधी भी थे। १९१९ के बाद तो गाँधी जी ने कांग्रेस को अपने सभी कार्य हिन्दी में करना एक तरह से बाध्यकारी बना दिया। उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि जिसे हिन्दी नहीं आती उसे कांग्रेस के अधिवेशनों में बोलने का अवसर नहीं दिया जाएगा। इसी से प्रभावित होकर सरदार पटेल ने १९१९ में अहमदाबाद के कांग्रेस अधिवेशन में अपना स्वागत भाषण हिन्दी में दिया और अधिवेशन के स्वागत  मंत्री पी० जी० मावलंकर, जो कि कालांतर में  प्रथम लोकसभा  अध्यक्ष बने, ने  अधिवेशन के सभी दस्तावेज हिन्दी में तैयार किए। स्वामी दयानन्द सरस्वती, केशव चन्द्र सेन, सुभाष चन्द्र बोस, आचार्य कृपलानी, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी जैसे अनेक अहिन्दी भाषी नेताओं ने हिन्दी को भारत की राजभाषा बनाने की पैरवी की। २० दिसम्बर, १९२८ को कलकत्ता में राजभाषा सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए सुभाष चन्द्र बोस ने देश के प्रत्येक नागरिक विशेषकर नवयुवकों से हिन्दी सीखने की अपील की तथा इस बात पर खेद भी व्यक्त किया कि वे  स्वयं अच्छी हिन्दी नहीं बोल पाते हैं।  १९३५ में मद्रास राज्य के मुख्यमंत्री रूप में सी० राजगोपालाचारी ने हिन्दी शिक्षा को अनिवार्य कर दिया। १९३५ में ही बेल्जियम के नागरिक डॉ० कामिल बुल्के इसाई  धर्म प्रचार के लिए भारत आए पर फ्रेंच, अँग्रेज़ी, फ्लेमिश, आयरिश भाषाओं पर अधिकार होने के बाद भी हिन्दी को ही अभिव्यक्ति का माध्यम चुना। अपने हिन्दी ज्ञान में वृद्धि हेतु उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम०ए० किया और तुलसी दास को अपने प्रिय कवि के रूप में चुनकर रामकथा उद्भव और विकासपर डी० फिल की उपाधि भी प्राप्त की। निश्चिततः स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में हिन्दी  राष्टरीय आन्दोलन और भारतीय संस्कृति की अभिव्यक्ति की भाषा बनी।

यदि हम व्यवहारिक धरातल पर बात करें तो हिन्दी सदैव से राजभाषा, मातृभाषा व लोकभाषा रही है पर दुर्भाग्य से हिन्दी कभी भी राजप्रेयसी नहीं रही। स्वतंत्रता आंदोलन में जनभाषा के रूप में लोकप्रियता, विदेषी विद्वानों द्वारा हिन्दी की अहमियत को स्वीकारना, तमाम समाज सुधारकों  व महापुरूषों द्वारा हिन्दी को राजभाषा/राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने की बातें, पर अन्ततः संविधान सभा ने तीन दिनों तक लगातार बहस के बाद १४ सितम्बर १९४९ को पन्द्रह वर्ष तक अँग्रेज़ी जारी रखने के परन्तुक के साथ ही हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया। राष्ट्रभाषा के सवाल पर संविधान सभा में ३०० से ज्यादा संशोधन  प्रस्ताव आए। जी० एस० आयंगर ने मसौदा पेश करते हुए हिन्दी की पैरोकारी की पर अंततः कहा कि - हिन्दी आज काफी समुन्नत भाषा नहीं है। अँग्रेज़ी शब्दों के हिन्दी पर्याय नहीं मिल पाते। यद्यपि हिन्दी के पक्ष  में काफी सदस्यों ने विचार व्यक्त किए। पुरूषोतम दास  टंडन ने अँग्रेज़ ध्वनिविज्ञानी इसाक पिटमैन के हवाले से कहा कि विश्व में हिन्दी ही सर्वसम्पन्न वर्णमाला है तो सेठ गोविन्द दास  ने कहा कि- इस देश में हजारों वर्षों से एक संस्कृति है। अतः यहाँ एक भाषा और एक लिपि ही होनी चाहिए। आर० वी० धुलेकर ने काफी सख्त लहजे में हिन्दी की पैरवी करते हुए कहा कि- मैं कहता हूँ हिन्दी  राजभाषा है, राष्ट्रभाषा है। हिन्दी के राष्ट्रभाषा/राजभाषा हो जाने के बाद संस्कृत विश्व भाषा बनेगी। अँग्रेज़ों के नाम १५ वर्ष का पट्टा लिखने से  राष्ट्र का हित साधन नहीं होगा। स्वयं पं० नेहरू ने भी हिन्दी की पैरवी में कहा था- पिछले एक हजार वर्ष के इतिहास में भारत ही नहीं सारे दक्षिण पूर्वी एशिया में और केन्द्रीय एशिया के कुछ भागों में भी विद्वानों की भाषा संस्कृत ही थी। अँग्रेज़ी कितनी ही अच्छी और महत्वपूर्ण क्यों न हो किन्तु इसे हम सहन नहीं कर सकते, हमें अपनी ही भाषा (हिन्दी) को अपनाना चाहिए।

निश्चिततः इस आधार पर कि हिन्दी भाषा समुन्नत नहीं है, राजकाज की भाषा रूप में पन्द्रह साल तक अँग्रेज़ी को स्थान दे दिया गया। इस बात पर कालान्तर में काफी बहस हुई। कुछेक का तो मानना था कि राष्ट्रीय आन्दोलन के अधिकतर नेताओं की दिली इच्छा हिन्दी को राष्ट्रभाषा/राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने की थी पर ऐसे सदस्य जो मात्र कानूनविद होने के नाते संविधान सभा से जोड़ दिए गए, वे अँग्रेज़ भक्त थे और उन्होंने प्रयास करके अँग्रेज़ी की महत्ता भारत के राजकाज व न्यायालय पर सदैव हेतु थोप दी। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा- यदि अँग्रेज़ी अच्छी है और उसे बनाए रखना चाहिए तो अँग्रेज़ भी अच्छे थे, उन्हें भी राज करने बुला लीजिए। यदि स्वयं ब्रिटेन में अँग्रेज़ी की स्थिति पर चर्चा की जाय तो जब १५वीं शताब्दी में अँग्रेज़ी को इंग्लैड की राजभाषा घोषित किया गया तब यह अत्यन्त अविकसित और पिछड़ी हुई भाषा थी। सन् १०६६ में फ्रेंच भाषी नारमण्डों द्वारा इंग्लैंड पर कब्जा किए जाने के बाद फ्रेंच भाषा इंग्लैंड के राजकाज, न्यायालय व उच्च वर्ग की भाषा हो गई थी। उस समय उच्च वर्गीय सार्वजनिक जीवन में अँग्रेज़ी का प्रयोग वर्जित था और अँग्रेज़ी हेय व उपेक्षित समझी जाती थी किन्तु सैकड़ों सालों के अनवरत संघर्ष के बाद अँग्रेज़ी १४वीं शताब्दी में ही न्यायालय में प्रवेश पा सकी व १५वीं शताब्दी में शिक्षा का माध्यम बनी। प्रशासन, उच्च शिक्षा, विज्ञान आदि में अँग्रेज़ी १८वीं शताब्दी में ही पूरी तरह स्थापित हो सकी। यही कारण है कि प्रशासनिक, विधिक, साहित्य व रोजमर्रा के उपयोग के तमाम शब्द अँग्रेज़ी ने फ्रेंच व लैटिन से लिए। यहाँ तक कि स्वंय ब्रिटेन में  हिन्दी की शुरूआत प्रिंटिंग प्रेस क्रान्ति के साथ ही सोलहवीं शताब्दी के आरम्भ में ही हो गयी जब भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव पड़नी आरम्भ हो चुकी थी। सन् १५६० में ब्रिटेन में देवनागरी में छपाई का कार्य आरम्भ हो चुका था जबकि तब तक वह भारत में हाथ से ही लिखी जा रही थी। कालान्तर में जे० विल्किंसन व जार्ज फॉस्टर ने क्रमशः श्रीमद्भागवत गीता व अभिज्ञान शाकुन्तलम से प्रभावित होकर हिन्दी सीखी और उनका अँग्रेज़ी में अनुवाद किया। सन् १८०० के दौरान स्कॉटलैण्ड के जॉन बोथनिक गिलक्रास्ट ने देवनागरी और उसके व्याकरण पर तमाम पुस्तकें लिखीं तो डॉ० एल० एफ० रूनाल्ड ने १८७३ से १८७७ तक भारत प्रवास के दौरान हिन्दी व्याकरण पर काफी कार्य किया और लंदन से इस विषय पर एक पुस्तक भी प्रकाशित करायी। सन् १८६५ में एक राजाज्ञा के तहत लंदन की रॉयल एशियाटिक सोसायटी में हिन्दी सहित भारत में मुद्रित सभी भाषाओं के अखबार, पत्रिकायें व पुस्तकें आने लगीं। ऐसे में यह कहना कि हिन्दी समुन्नत भाषा नहीं थी, इसलिए उसे राष्ट्रभाषा/राजभाषा के रूप में एकाधिकार प्रतिष्ठा नहीं मिल सकती तथ्यों से परे लगता है।

आज हिन्दी भारत ही नहीं वरन् पाकिस्तान, नेपाल बंग्लादेश, इराक, इंडोनेशिया, इजरायल, ओमान, फिजी, इक्वाडोर, जर्मनी, अमेरिका, फ्रांस, ग्रीस, ग्वाटेमाला, सउदी अरब, पेरू, रूस, कतर, म्यंमार, त्रिनिदाद-टोबैगो, यमन इत्यादि देशों में जहाँ लाखों अनिवासी भारतीय व हिन्दी -भाषी हैं, में भी बोली जाती है। चीन, रूस, फ्रांस, जर्मनी, व जापान इत्यादि राष्ट्र जो कि विकसित राष्ट्र हैं की राष्ट्रभाषा अँग्रेज़ी नहीं वरन् उनकी खुद की मातृभाषा है। फिर भी ये दिनों-ब-दिन तरक्की के पायदान पर चढ़ रहे हैं। विज्ञान और प्रद्योगिकी क्षेत्र में अँग्रेज़ी के बिना विकास नहीं हो पाने की अवधारणा को इन विकसित देशों ने परे धकेल दिया है।

यह एक कटु सत्य है कि आज वैश्विक स्तर पर हिन्दी को प्रतिष्ठा मिलने के बाद भी हिन्दी अपनों से ही उपेक्षित रही है। एक प्रतिष्ठित शख्सियत ने विदेशी मंच पर कहा कि- हिन्दी एक पिछड़ी भाषा है, यहाँ तक कि हिन्दी में रैट और माउस हेतु के अलग-अलग शब्द नहीं हैं। इसी प्रकार प्रवासी भारतीयों के सम्मेलन में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य सैम पित्रोदा ने मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित राजेन्द्र सिंह द्वारा हिन्दी में दिए गए भाषण पर न केवल आपत्ति की बल्कि माफी भी माँगी। क्या यह माँ व प्रेयसी के द्वंद्व में असलियत जानते हुए भी प्रेयसी को ज्यादा भाव दिये जाने की सोच का परिचायक नहीं है कि प्रेयसी कहीं मुझे पिछड़ा और गँवार न समझ ले? भारत की ७० प्रतिशत जनसंख्या गाँवों में रहती है और अभी भी भारत में अँग्रेज़ी-तहजीब वालों की गिनती अंगुलियों पर की जा सकती है। अधिकतर शहरी घरों में आज भी बच्चे भले ही अँग्रेज़ी भाषी स्कूलों में पढ़ते हों, पर क्या वाकई वे अपने माता-पिता, रिश्तेदारों और मित्रों से अँग्रेज़ी में बातें करते हैं। निश्चिततः इन सबक पीछे ही छुपा है हिन्दी की उपेक्षा का भाव। असलियत तो यही है कि हम हिन्दी अपनाना चाहते हैं पर आड़े आता है, स्टेट्स सिम्बल और समाज की यह सोच कि हिन्दी रोजगार नहीं दिला सकती। राजनैतिक व प्रशासनिक नेतृत्व के शीर्ष की भाषा अँग्रेज़ी हो सकती है पर मध्यम व निचले पायदान पर हिन्दी या अन्य क्षेत्रीय भाषाएँ ही काबिज हैं। फील्ड में काम कर रहे तमाम अधिकारियों को भी लोगों से उनकी मातृभाषा में ही सम्वाद करना पड़ता है। हिन्दी को यदि उचित प्रतिष्ठा नहीं मिली है तो उसका एक अन्य प्रमुख कारण हिन्दी पर कुण्डली मारकर बैठे साहित्यकारों-प्रकाशकों-सम्पादकों का त्रिगुट है। अपना वर्चस्व न टूटन देने हेतु यह त्रिगुट नवागन्तुकों को हतोत्साहित करता है। पैसे व चमचागिरी की बदौलत एक अयोग्य व्यक्ति समाज में प्रतिष्ठा पाता है वहीं योग्य व्यक्ति अपनी रचनाएँ लेकर सम्पादकों और प्रकाशकों के दरवाजे भटकता रहता है। निश्चिततः हिन्दी के विकास में ऐसे कदम अवरोध उत्पन्न करते हैं।

निज भाषा उन्नति अहै, सब भाषन को मूल......आज वाकई  इस बात को अपनाने की जरूरत है। भूमण्डलीकरण एवं सूचना क्रांति के इस दौर में जह एक ओर सभ्यताओं का संघर्ष बढ़ा है, वहीं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की नीतियों ने भी विकासशील व अविकसित राष्ट्रों की संस्कृतियों पर प्रहार करने की कोशिश की है। सूचना क्रांति व उदारीकरण द्वारा सारे विश्व के सिमट कर एक वैश्विक गाँव में तब्दील होने की अवधारणा में अपनी संस्कृति, भाषा, मान्यताओं, विविधताओं व संस्कारों को बचाकर रखना सबसे बड़ी जरूरत है। एक तरफ बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ जहाँ हमारी प्राचीन सम्पदाओं का पेटेंट कराने में जुटी हैं वहीं इनके ब्राण्ड-विज्ञापनों ने बच्चों व युवाओं की मनोस्थिति पर भी काफी प्रभाव डाला है, निश्चिततः इन सबसे बचने हेतु हम अपनी आदि  भाषा संस्कृत व हिन्दी की तरफ उन्मुख होना होगा। हम इस तथ्य को नक्कार नहीं सकते कि हाल ही में प्रकाशित ऑक्सफोर्ड अँग्रेज़ी शब्दकोश में हिन्दी के तमाम प्रचलित शब्दों, मसलन-आलू, अच्छा, अरे, देसी, फिल्मी, गोरा, चड्डी, यार, जंगली, धरना, गुण्डा, बदमाश, बिंदास, लहँगा, मसाला इत्यादि को स्थान दिया गया है तो दूसरी तरफ अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने राष्ट्रीय सुरक्षा भाषा कार्यक्रम के तहत अपने देशवासियों से हिन्दी, फारसी, अरबी, चीनी व रूसी भाषायें सीखने को कहा है। अमेरिका जो कि अपनी भाषा और अपनी पहचान के अलावा किसी को श्रेष्ठ नहीं मानता, हिन्दी सीखने में उसकी रूचि का प्रदर्शन निश्चिततः भारत के लिए गौरव की बात है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने स्पष्टतया घोषणा की कि- हिन्दी ऐसी विदेषी भाषा है, जिसे २१वीं सदी में राष्ट्रीय सुरक्षा और समृद्धि के लिए अमेरिका के नागरिकों को सीखनी चाहिए। इसी क्रम में टेक्सास के स्कूलों में पहली बार नमस्ते जी नामक हिन्दी की पाठ्यपुस्तक को हाईस्कूल के छात्रों के लिए पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। ४८० पेज की इस पुस्तक को भारतवंशी शिक्षक अरुण प्रकाश ने आठ सालों की मेहनत से तैयार की है। इसी प्रकार जब दुनिया भर में अँग्रेज़ी का डंका बज रहा हो, तब अँग्रेज़ी के गढ़ लंदन में बर्मिंघम स्थित मिडलैंड्स वर्ल्ड ट्रेड फोरम के अध्यक्ष पीटर मैथ्यूज ने ब्रिटिश उद्यमियों, कर्मचारियों और छात्रों को हिंदी समेत कई अन्य भाषाएँ सीखने की नसीहत दी है। यही नहीं, अन्तर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान हिन्दी का अकेला ऐसा सम्मान है जो किसी दूसरे देश की संसद, ब्रिटेन के हाउस ऑफ लॉर्ड्स में प्रदान किया जाता है। आज अँग्रेज़ी के दबदबे वाले ब्रिटेन से हिन्दी लेखकों का सबसे बड़ा दल विश्व हिन्दी सम्मेलन में अपने खर्च पर पहुँचता है। निश्चिततः भूमण्डलीकरण के दौर में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र, सर्वाधिक जनसंख्या वाले राष्ट्र और सबसे बड़े उपभोक्ता बाजार क भाषा हिन्दी को नज़र अंदाज करना अब सम्भव नहीं रहा। प्रतिष्ठित अँग्रेज़ी प्रकाशन समूहों ने हिन्दी में अपने प्रकाशन आरम्भ किए हैं तो बी० बी० सी, स्टार प्लस, सोनी, जी० टी० वी०, डिस्कवरी आदि अनेक चैनलों ने हिन्दी में अपने प्रसारण आरम्भ कर दिए हैं। हिन्दी फिल्म संगीत तथा विज्ञापनों की ओर नज़र डालने पर हमें एक नई प्रकार की हिन्दी के दर्शन होते हैं। यहाँ तक कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के विज्ञापनों में अब क्षेत्रीय बोलियों भोजपुरी इत्यादि का भी प्रयोग होने लगा है और विज्ञापनों के किरदार भी क्षेत्रीय वेश-भूषा व रंग-ढंग में नज़र आते हैं। निश्चिततः मनोरंजन और समाचार उद्योग पर हिन्दी की मजबूत पकड़ ने इस भाषा में सम्प्रेषणीयता की नई शक्ति पैदा की है पर वक्त के साथ हिन्दी को वैश्विक भाषा के रूप में विकसित करने हेतु हमें भाषाई शुद्धता और कठोर व्याकरणिक अनुशासन का मोह छोड़ते हुए उसका नया विशिष्ट स्वरूप विकसित करना होगा अन्यथा यह भी संस्कृत की तरह विशिष्ट वर्ग तक ही सिमट जाएगी। हाल ही मे विदेश मंत्रालय ने इसी रणनीति के तहत प्रति वर्ष दस जनवरी को विश्व हिन्दी दिवस मनाने का निर्णय लिया है, जिसमें विदेशों मे स्थित भारतीय दूतावासों में इस दिन हिन्दी दिवस समारोह का आयोजन किया जाएगा। आगरा के केन्द्रीय हिन्दी संस्थान में देश का प्रथम हिन्दी संग्रहालय तैयार किया जा रहा है, जिसमें हिन्दी विद्वानों की पाण्डुलिपियाँ, उनके पत्र और उनसे जुड़ी अन्य सामग्रियाँ रखी जायेंगी।

आज की हिन्दी वो नहीं रही..... बदलती परिस्थितियों में उसने अपने को परिवर्तित किया है। विज्ञान-प्रौद्योगिकी से लेकर तमाम विषयों पर हिन्दी की किताबें अब उपलब्ध हैं, क्षेत्रीय अखबारों का प्रचलन बढ़ा है, इण्टरनेट पर हिन्दी की बेबसाइट में बढ़ोत्तरी हो रही है, सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की कई कम्पनियों ने हिन्दी भाषा में परियोजनाएँ आरम्भ की हैं। सूचना क्रांति के दौर में कम्प्यूटर पर हिन्दी में कार्य संस्कृति को बढ़ावा देने हेतु सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के प्रतिष्ठान सी-डैक ने निःशुल्क हिन्दी साफ्टवेयर जारी किया है, जिसमें अनेक सुविधाएँ उपलब्ध हैं। माइक्रोसाफ्ट ने ऑफिस हिन्दी के द्वारा भारतीयों के लिए कम्प्यूटर का प्रयोग आसान कर दिया है। आई० बी० एम० द्वारा विकसित सॉफ्टवेयर में हिन्दी भाषा के ६५,००० शब्दों को पहचानने की क्षमता है एवं हिन्दी और हिन्दुस्तानी अँग्रेज़ी के लिए आवाज़ पहचानने की प्रणाली का भी विकास किया गया है जो कि शब्दों को पहचान कर कम्प्यूटर लिपिबद्ध कर देती है। एच० पी० कम्प्यूटर्स एक ऐसी तकनीक का विकास करने में जुटी हुई है जो हाथ से लिखी हिन्दी लिखावट को पहचान कर कम्प्यूटर में आगे की कार्यवाही कर सके। चूँकि इण्टरनेट पर ज्यादातर सामग्री अँग्रेज़ी में है और अपने देश में मात्र १३ फीसदी लोगों की ही अँग्रेज़ी पर ठीक-ठाक पकड़ है। ऐसे में हाल ही में गूगल द्वारा कई भाषाओं में अनुवाद की सुविधा प्रदान करने से अँग्रेज़ी न जानने वाले भी अब इण्टरनेट के माध्यम से अपना काम आसानी से कर सकते हैं। अपनी तरह की इस अनोखी व पहली सेवा में हिन्दी, तमिल, तेलगू, कन्नड़ और मलयालम का अँग्रेज़ी में अनुवाद किया जा सकता है। यह सेवा इण्टरनेट पर ूूूण्हववहसमण्पदध्जतंदेसंजमऋज  टाइप कर हासिल की जा सकती है। आज हिन्दी के वेब पोर्टल समाचार, व्यापार, साहित्य, ज्योतिषी, सूचना प्रौद्योगिक एवं तमाम जानकारियाँ सुलभ करा रहे हैं। यहाँ तक कि दक्षिण भारत में भी हिन्दी के प्रति दुराग्रह खत्म हो गया है। निश्चिततः इससे हिन्दी भाषा को एक नवीन प्रतिष्ठा मिली है।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें