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| 02.28.2009 |
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भारतीय संस्कृति में होली के विभिन्न रंग |
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होली
भारतीय समाज का एक प्रमुख
त्यौहार है,
जिसका लोग बेसब्री के साथ इंतजार करते हैं। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में
अलग-अलग रूपों में होली मनाई जाती है। रबी की फसल की कटाई के बाद वसन्त
पर्व में मादकता के अनुभवों के बीच मनाया जाने वाला यह पर्व उत्साह और
उल्लास का परिचायक है। अबीर-गुलाल व रंगों के बीच भांग की मस्ती में फगुआ
गाते इस दिन क्या बूढ़े व क्या बच्चे,
सब
एक ही रंग में रंगे नजर आते हैं। नारद पुराण के अनुसार दैत्य राज हिरणकश्यप
को यह घमंड था कि उससे सर्वश्रेष्ठ दुनिया में कोई नहीं,
अतः लोगों को ईश्वर की पूजा करने की बजाय उसकी पूजा करनी चाहिए। पर उसका
बेटा प्रहलाद जो कि विष्णु भक्त था,
ने
हिरणकश्यप की इच्छा के विरूद्ध ईश्वर की पूजा जारी रखी। हिरणकश्यप ने
प्रहलाद को प्रताड़ित करने हेतु कभी उसे ऊँचे पहाड़ों से गिरवा दिया,
कभी जंगली जानवरों से भरे वन में अकेला छोड़ दिया पर प्रहलाद की ईश्वरीय
आस्था टस से मस न हुयी और हर
बार वह ईश्वर की कृपा से सुरक्षित बच निकला। अंततः हिरणकश्यप ने अपनी बहन
होलिका जिसके पास एक जादुई चुनरी थी,
जिसे ओढ़ने के बाद अग्नि में
भस्म न होने का वरदान प्राप्त था,
की
गोद में प्रहलाद को चिता में बिठा दिया ताकि प्रहलाद भस्म हो जाय। पर होनी
को कुछ और ही मंजूर था,
ईश्वरीय वरदान के गलत प्रयोग के चलते जादुई चुनरी ने उड़कर प्रहलाद को ढक
लिया और होलिका जल कर राख हो गयी और प्रहलाद एक बार फिर ईश्वरीय कृपा से
सकुशल बच निकला। दुष्ट होलिका की मृत्यु से प्रसन्न नगरवासियों ने उसकी राख
को उड़ा-उड़ा कर खुशी का इजहार किया। मान्यता है कि आधुनिक होलिकादहन और उसके
बाद अबीर-गुलाल को उड़ाकर खेले जाने वाली होली इसी पौराणिक घटना का स्मृति
प्रतीक है।
भविष्य
पुराण में वर्णन आता है कि राजा रघु के राज्य में धुंधि नामक राक्षसी को
भगवान शिव द्वारा वरदान प्राप्त था कि उसकी मृत्यु न ही देवताओं,
न
ही मनुष्यों,
न
ही हथियारों,
न
ही सर्दी-गर्मी-बरसात से होगी। इस वरदान के बाद उसकी दुष्टतायें बढ़ती गयीं
और अंततः भगवान शिव ने ही उसे यह शाप दे दिया कि उसकी मृत्यु बालकों के
उत्पात से होगी। धुंधि की दुष्टताओं से परेशान राजा रघु को उनके पुरोहित ने
सुझाव दिया कि फाल्गुन मास की १५वीं तिथि को जब सर्दियों पश्चात गर्मियाँ
आरम्भ होती हैं,
बच्चे घरों से लकड़ियाँ व घास-फूस इत्यादि एकत्र कर ढेर बनायें और इसमें आग
लगाकर खूब हल्ला-गुल्ला करें। बच्चों के ऐसा ही करने से भगवान शिव के शाप
स्वरूप राक्षसी धुंधि ने तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया। ऐसा माना जाता है कि
होली का पंजाबी स्वरूप
’धुलैंडी‘
धुंधि की मृत्यु से ही जुड़ा हुआ है। आज भी इसी याद में होलिका दहन किया
जाता है और लोग अपने हर बुरे कर्म इसमें भस्म कर देते हैं।
होली की
रंगत बरसाने की लट्ठमार होली के बिना अधूरी ही कही जायेगी। कृष्ण-लीला भूमि
होने के कारण फाल्गुन शुल्क नवमी को ब्रज में बरसाने की लट्ठमार होली का
अपना अलग ही महत्व है। इस दिन नन्दगाँव के कृष्णसखा
’हुरिहारे‘
बरसाने में होली खेलने आते हैं,
जहाँ राधा की सखियाँ लाठियों से उनका स्वागत करती हैं। सखागण मजबूत ढालों
से अपने शरीर की रक्षा करते हैं एवं चोट लगने पर वहाँ ब्रजरज लगा लेते हैं।
बरसाना की होली के दूसरे दिन फाल्गुन शुक्ल दशमी को सायंकाल ऐसी ही लट्ठमार
होली नन्दगाँव में भी खेली जाती है। अन्तर मात्र इतना है कि इसमें नन्दगाँव
की नारियाँ बरसाने के पुरूषों का लाठियों से सत्कार करती हैं। इसी प्रकार
बनारस की होली का भी अपना अलग अन्दाज है। बनारस को भगवान शिव की नगरी कहा
गया है। यहाँ होली को रंगभरी एकादशी के रूप में मनाते हैं और बाबा विश्वनाथ
के विशिष्ट शृंगार के बीच भक्त भांग व बूटी का आन्नद लेते हैं।
होली को
लेकर देश के विभिन्न अचलों में तमाम मान्यतायें हैं और शायद यही विविधता
में एकता की भारतीय संस्कृति का परिचायक भी है। उत्तर पूर्व भारत में
होलिकादहन को भगवान कृष्ण द्वारा राक्षसी पूतना के वध दिवस से जोड़कर पूतना
दहन के रूप में मनाया जाता है तो दक्षिण भारत में मान्यता है कि इसी दिन
भगवान शिव ने कामदेव को तीसरा नेत्र खोल भस्म कर दिया था और उनकी राख को
अपने षरीर पर मल कर नृत्य किया था। तत्पश्चात कामदेव की पत्नी रति के दुख
से द्रवित होकर भगवान शिव ने कामदेव को पुनर्जीवित कर दिया,
जिससे प्रसन्न हो देवताओं ने रंगों की वर्षा की। इसी कारण होली की पूर्व
संध्या पर दक्षिण भारत में अग्नि प्रज्ज्वलित कर उसमें गन्ना,
आम
की बौर और चन्दन डाला जाता है। यहाँ गन्ना कामदेव के धनुष,
आम
की बौर कामदेव के बाण,
प्रज्वलित अग्नि शिव द्वारा कामदेव का दहन एवं चन्दन की आहुति कामदेव को आग
से हुई जलन हेतु शांत करने का प्रतीक है। मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले में
अवस्थित धूंधड़का गाँव में होली तो बिना रंगों के खेली जाती है और होलिकादहन
के दूसरे दिन ग्रामवासी अमल कंसूबा (अफीम का पानी) को प्रसाद रूप में ग्रहण
करते हैं और सभी ग्रामीण मिलकर उन
घरों में जाते हैं जहाँ बीते वर्ष में परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु हो
चुकी होती है। उस परिवार को सांत्वना देने के साथ होली की खुशी में शामिल
किया जाता है।
कानपुर
में होली का अपना अलग ही इतिहास है। यहाँ अवस्थित जाजमऊ और उससे लगे बारह
गाँवों में पाँच दिन बाद
होली खेली जाती है। बताया जाता है कि कुतुबुद्दीन ऐबक की हुकुमत के दौरान
ईरान के शहर जंजान के शहर काजी सिराजुद्दीन के शिष्यों के जाजमऊ पहुँचने पर
तत्कालीन राजा ने उन्हें जाजमऊ छोड़ने का हुक्म दिया तो दोनो पक्षों में
जंग आरम्भ हो गई। इसी जंग के बीच राजा जाज का किला पलट गया और किले के लोग
मारे गये। संयोग से उस दिन होली थी पर इस दुखद घटना के चलते नगरवासियों ने
निर्णय लिया कि वे पाँचवें दिन होली
खेलेंगे,
तभी से यहाँ होली के पाँचवें दिन पंचमी का मेला लगता है। इसी प्रकार वर्ष
1923 के दौरान होली मेले के आयोजन को लेकर कानपुर के हटिया में चन्द
बुद्धिजीवियों व्यापारियों और साहित्यकारों (गुलाबचन्द्र सेठ,
जागेश्वर त्रिवेदी,
पं० मुंशीराम शर्मा
’सोम‘,
रघुबर दयाल,
बाल कृष्ण शर्मा
’नवीन‘,
श्याम लाल गुप्त
’पार्षद‘,
बुद्धूलाल मेहरोत्रा और हामिद खाँ) की एक बैठक हो रही थी। तभी पुलिस ने इन
आठों लोगों को हुकूमत के खिलाफ साजिश रचने के आरोप में गिरफ़्तार करके
सरसैया घाट स्थित जिला कारागार में बन्द कर दिया। इनकी गिरफ़्तारी का कानपुर
की जनता ने भरपूर विरोध किया। आठ दिनों पश्चात् जब उन्हें रिहा किया गया,
तो
उस समय
’अनुराधा-नक्षत्र‘
लगा हुआ था। जैसे ही इनके रिहा होने की खबर लोगों तक पहुँची,
लोग कारागार के फाटक पर पहुँच गये। उस दिन वहीं पर मारे खुशी के पवित्र
गंगा जल में स्नान करके अबीर-गुलाल और रंगों की होली खेली। देखते ही देखते
गंगा तट पर मेला सा लग गया। तभी से परम्परा है कि होली से अनुराधा नक्षत्र
तक कानपुर में होली की मस्ती छायी रहती है और आठवें दिन प्रतिवर्ष गंगा तट
पर गंगा मेले का आयोजन किया जाता है।
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