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| 09.17.2008 |
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अनूभूतियाँ और विमर्श : विविध सरोकारों के रंगचित्र |
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पुस्तक
:
अनुभूतियाँ और विमर्श (निबन्ध संग्रह)
लेखक
:
कृष्ण कुमार यादव
मूल्य
:
२५०/-
समीक्षक
:
उमाशंकर शुक्ल
‘उमेश’, प्रकाशक : नागरिक उत्तर प्रदेश, प्लाट नं० २, नन्दगाँव रिजॉर्टस्, तिवारीगंज,
फैजाबाद
रोड,
लखनऊ-२२६०१९
हिन्दी
साहित्य के विद्वानों ने निबन्ध विधा को गद्य का सर्वोकृष्ट स्वरूप माना
है। आचार्य पं० रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में-”यदि
गद्य कवियों या लेखकों की कसौटी है तो निबन्ध गद्य की कसौटी है।”
वस्तुतः निबन्ध गद्य का अत्यन्त सशक्त रूपविधान है। डॉ० जे० डब्ल्यू०
मेरियट और फ्रांसीसी समालोचक सान्तवे यह स्वीकार करते हैं कि-
“निबन्ध-रचना
एक कठिन कार्य है और ऐसी अवस्था में किसी भी विषय पर निबन्ध लिखने के लिए
उस विषय का पूर्ण पण्डित होना चाहिए।”
इससे स्पष्ट है कि सफल और श्रेष्ठ निबन्ध लिखना अतन्य दुष्कर कार्य है।
ह्ष की बात है कि भारतेन्दु युग से अब तक अनेक साहित्यकारों ने इस दिशा
में सराहनीय कार्य किया है। भारतीय डाक सेवा के अधिकारी एवं कवि व चिन्तक
कृष्ण कुमार यादव का प्रस्तुत निबन्ध संग्रह
‘अनूभूतियाँ
और विमर्श’
इस
दिशा में किया गया,
एक
अच्छा प्रयास माना जाएगा,
जिसमें लेखक की जिज्ञासु प्रवृत्ति,
समसामयिक संदर्भों को समझने की चेष्टा,
ऐतिहासिक संदर्भों के यथोचित प्रयोग,
अपनी सभ्यता एवं संस्कृति के प्रति अनुराग एवं तथ्यों को सही ढंग से
प्रयुक्त कर उनका विश्लेषणात्मक विवेचन करने की रुचि के दर्शन होते हैं।
प्रशासनिक सेवा में रहकर चिन्तन मनन करना एवं साहित्यिक लेखन करना अपने आप
में एक विशिष्ट उपलब्धि है। राजकीय सेवा के दायित्वों का निर्वहन और
श्रेष्ठ कृतियों की सर्जना का यह मणि-कंचन योग विरल है। कृष्ण कुमार यादव
के निबन्धों में उनका बहुआयामी चिन्तन मुखर हुआ है।
संग्रह के
निबन्धों को स्वयं लेखक ने तीन खण्डों में विभक्त करते हुए लिखा है कि
प्रस्तुत निबन्ध-संग्रह के लेखों को तीन भागों में बाँटा जा सकता है-
व्यक्तित्व विशेष पर आधारित लेख,
संस्कृति के प्रतिमानों पर आधारित लेख एवम् समसामयिक मुद्दों पर आधारित
लेख। प्रेमचन्द,
राहुल सांकृत्यायन,
मनोहर श्याम जोशी,
अमृता प्रीतम और डा० अम्बेडकर पर लिखे लेख जहाँ इनके व्यक्तिगत जीवन पर
प्रकाश डालते हुए भारतीय समाज को इनके अवदानों से अवगत कराते हैं,
वहीं नारी शक्ति का उत्कर्ष,
इतिहास के आयाम,
भारतीय परिप्रेक्ष्य में धर्मनिरपेक्षता,
भारतीय संस्कृति और त्यौहारों के रंग,
भूमण्डलीकरण के दौर में हिन्दी जैसे लेख भारतीय संस्कृति के विभिन्न
प्रतिमानों को ग्राह्य करते नजर आते हैं। अन्य लेखों को समसामयिक संदर्भों
में रखा जा सकता है। मेरी दृष्टि में संग्रह के प्रथम खण्ड के लेख श्रद्धा
भाव,
द्वितीय खण्ड के लेख समीक्षक भाव तथा व तृतीय खण्ड के लेख प्रशिक्षक-भावना
से प्रेरित होकर लिखे गये हैं। इसलिए ये निबन्ध जहाँ एक ओर लेखक की
अध्ययनशीलता और उसकी विश्लेषणात्मक दृष्टि को रेखांकित करते हैं वहीं दूसरी
ओर उसके समीक्षक स्वरूप की भी झाँकी प्रस्तुत करते हैं।
‘प्रेमचन्द
के सामाजिक व साहित्यक विमर्श’
निबन्ध में लेखक की यह दृष्टि कि यह एक रोचक तथ्य है कि प्रेमचन्द जिस दौर
के थे वह दौर खुलकर स्वतंत्रता-आन्दोलन में भाग लेने का था पर उनकी कलम
समाज की आन्तरिक विसंगतियों और बुराईयों पर ही ज्यादा चली जिसे कि आधुनिक
साहित्य में दलित विमर्श,
नारी-विमर्श इत्यादि के रूप में देखा जा सकता है,
सर्वथा उचित कही जाएगी। हिन्दू और मुसलमान की एकता विषयक प्रेमचन्द के
विचारों को आज भी परखा जा सकता है। उन्होंने लिखा है-’हिन्दू
और मुसलमान न कभी दूध और चीनी थे न होंगे और न ही होने चाहिए। दोनों की
पृथक-पृथक सूरतें बनी रहनी चाहिए और बनी रहेंगी।’
लेखक की यह अवधारणा कि प्रेमचन्द के लेखों में दक्षिण
पंथी-मध्यमार्गी-वामपंथी सभी धारायें फूटकर सामने आती हैं,
एक
कटु सत्य है। लेख प्रभावपूर्ण है।
यायावरी
वृत्ति के सबल सम्पोषक राहुल सांकृत्यायन की बहुमूल्य कृति
‘भागो
नहीं दुनिया को बदलो’
की
तर्ज पर ही लेखक ने अपने द्वितीय निबन्ध का शीर्षक रखा है। उनके रचना-संसार
का उल्लेख करते हुए लेखक ने स्पष्ट किया है कि
‘छत्तीस
भाषाओं के ज्ञाता राहुल जी ने लगभग सभी प्रमुख विधाओं में साहित्य सृजन
किया है,
जिसमें अधिकांश हिन्दी भाषा में लिखा गया है।’
राहुल जी के समग्र जीवन का मूल्यांकन करते हुए निबन्धकार ने बहुत सही
टिप्पणी करते हुए लिखा है-
’वे
एक ऐसे घुमक्कड़ थे जो सच्चे ज्ञान की तलाश में था और जब भी सच को दबाने की
कोशिश की गई तो वह बागी हो गया।’
उनका सम्पूर्ण जीवन अन्तर्विरोधों से भरा पड़ा है। लेख में अनेक अनकहे
तथ्यों को उद्घाटित करने का अच्छा प्रयास किया गया है।
‘खो
गया किस्सागोई’
निबन्ध में लेखक ने मनोहर श्याम जोशी के सम्बन्ध में लिखा है-’जोशी
जी ने अमृतलाल नागर से भाषा और किस्सागोई सीखी है। इसी प्रकार भगवतीचरण
वर्मा से तुर्शी तो यशपाल से नजरिया सीखा है। उनके लेखन की विशिष्टताओं को
सूक्ष्म रूप में दो शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता है-
’साधारण
चरित्रों का अद्भुतिकरण और अद्भुत चरित्रों का सामान्य विश्लेषण उनकी
विशेषता रही है। लेखक ने अमृता प्रीतम के आत्मकथ्यात्मक उपन्यास
‘रसीदी
टिकट’
से
प्रभावित हो कर उसका मनोवैज्ञानिक विश्लेषण भावविभोर होकर
’गुम
हो गया रसीदी टिकट’
लेख में किया है। देश के बँटवारे के दर्द को अमृता जी के शब्दों में इस
प्रकार व्यक्त किया गया है-
“पुराने
इतिहास के भीषण अत्याचारी काण्ड हम लोगों ने भले ही पढ़े हुए थे,
पर
फिर भी हमारे देश के बँटवारे के समय जो कुछ हुआ,
किसी की कल्पना में भी उस जैसा खूनी काण्ड नहीं आ सकता। मैंने लाशें देखी
थीं,
लाशों जैसे लोग देखे थे।”
अमृताजी के जीवन की व्याख्या करते हुए लेखक ने एक वाक्य में उनका वास्तविक
चित्र उभारने का सराहनीय प्रयास किया है। लेखक के शब्दों में-
’एक
ही साथ मानवतावादी,
अस्तित्ववादी,
स्त्रीवादी और आधुनिकतावादी थीं।’
’दलितों
के मसीहा : डॉ० अम्बेडकर’
इस
खण्ड का अन्तिम लेख है। इसमें लेखक ने यह दर्शाने का प्रयास किया है कि
लगभग सौ वर्ष पूर्व समाज में अस्पृश्यता आदि की जो पीय़ दलितों को झेलनी
पड़ती थी वह बालक अम्बेडकर को भी झेलनी पड़ी थी। कालान्तर में डॉ० अम्बेडकर
एक योग्य पुरुष बने और अपनी योग्यता के बल पर संविधान निर्माण में अपनी
अहम् भूमिका का निर्वहन किया। लेख अम्बेडकर जी के जीवन पर अच्छा प्रकाश
डालता है। डॉ० अम्बेडकर के अन्तर्विरोधों पर चर्चा के साथ-साथ वर्तमान
राजनैतिक-सामाजिक परिवेश में जिस प्रकार उन्हें भुनाया जा रहा है,
उस
पर भी चर्चा करके इस लेख को और भी आयाम दिये जा सकते थे।
निबन्ध-संग्रह के द्वितीय खण्ड के
‘नारी
शक्ति के उत्कर्ष’
लेख में लेखक ने जहाँ एक ओर नारी की महिमा-गरिमा प्रतिपादित की है वहीं
दूसरी ओर नारी की कमियों की ओर भी संकेत किया है। महाकवि तुलसीदास की एक
अर्द्धाली का उल्लेख करते हुए लेखक ने
’ताड़ना’
शब्द की जो व्याख्या की है वह उचित नहीं प्रतीत होती। ताड़ना शब्द का
वास्तविक अर्थ ग्रहण करते हुए इसकी व्याख्या उचित होगी। फिर संत कवि
तुलसीदास ही क्यों,
महाकवि संत प्रवर कबीरदास तथा सूरदास ने नारी के सम्बन्ध में बहुत सी कटु
उक्तियों का प्रयोग किया है क्योंकि नारी को साधना पथ पर बाधक माना गया है।
इतिहास के आयाम लेख में लेखक ने इतिहासकारों की भूलों तथा इतिहास को देखने
की उनकी दृष्टि की विस्तार से चर्चा की है। इतिहास की कमियों को उदाहरणों
द्वारा अच्छे ढंग से दर्शाया गया है।
’भारतीय
परिप्रेक्ष्य में धर्मनिरपेक्षता’
विषयक लेख में पाश्चात्य और भारतीय विद्वानों द्वारा की गयी व्याख्याओं का
अंकन करते हुए लेखक ने दोनों का अन्तर सुस्पष्ट करते हुए ठीक ही लिखा है कि
जहाँ पाश्चात्य धर्मनिरपेक्षता धर्म और आध्यात्मिक परम्परा की अवहेलना करती
है,
वहीं भारतीय समाज प्राचीन आध्यात्मिक परम्परा को स्वीकार करते हुए सभी
धर्मों के प्रति सहनशील होना तथा उन सबका समान रूप से आदर करना ही
धर्मनिरपेक्षता मानता है। लेख पाठक के लिए चिंतन के कई बिन्दु छोड़ जाता
है। यही लेखक की उपलब्धि है।
भारतीय
संस्कृति त्यौहारों एवं उत्सवों की संस्कृति है। उल्लास,
उमंग,
आशा,
हर्ष इस संस्कृति का मूलाधार है। भारतीय संस्कृति की विशिष्टता यह है कि
इसमें शोक का कोई त्यौहार नहीं होता है। लेखक ने दार्शनिक लाओत्से के
शब्दों को दोहराते हुए लिखा है-
“इसकी
फिक्र मत करो कि रीति-रिवाज का क्या अर्थ है?
रीति-रिवाज मजा देता है बस काफी है। जिन्दगी को सरल और नैसर्गिक रहने दो,
उस
पर बड़ी व्याख्याएँ मत थोपो।”
सम्पूर्ण लेख में मिथक,
धार्मिक मान्यताओं,
परम्पराओं और ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़े अनेक त्यौहारों,
उत्सवों की विस्तार से सार्थक चर्चा की गयी है तथापि पोंगल आदि दक्षिणांचल
और उत्तरांचल के त्यौहारों को जोड़कर इसे और भी रोचक बनाया जा सकता था।
द्वितीय खण्ड का अन्तिम लेख है-’भूमण्डलीकरण
के दौर में हिन्दी’
लेखक का यह विचार समीचीन प्रतीत होता है कि भूमण्डलीकरण,
उदारीकरण,
उन्नत प्रौद्योगिकी एवं सूचना-तकनीकि के बढ़ते इस युग में सबसे बड़ा खतरा
भाषा,
साहित्य और संस्कृति के लिए पैदा हुआ है। आज अंग्रेजी हिन्दी की
प्रतिद्वन्दी बन गई है। लेखक का इस बिन्दु पर क्षुब्ध होना उचित है कि
राजभाषा का दर्जा प्राप्त होने पर भी हिन्दी आज राजभाषा नहीं बन सकी।
वस्तुतः विदेश में हिन्दी अपने बलबूते पर बढ़ रही है,
किन्तु अपने देश में वह उपेक्षा का शिकार हो रही है। यह स्थिति चिन्ताजनक
है।
निबन्ध-संग्रह के
तृतीय खण्ड में लेखक ने जिन समसामयिक सरोकारों से जुड़े निबन्धों को संजोया
है,
वे
हैं- युवा भटकाव की स्थिति क्यों,
भूमण्डलीकरण के दौर में तेजी से बढ़ते भारतीय कदम,
ब्राण्ड इमेज की महत्ता,
इण्टरनेट का बढ़ता प्रभाव तथा कोचिंग संस्थाओं का फैलता मायाजाल। ये सभी
निबन्ध समसामयिक सन्दर्भों से जुड़े होने के कारण प्रतियोगी परीक्षाओं और
विशेषकर सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध
होंगे। सभी लेख पाठकों का ज्ञानवर्द्धन करते हैं।
कृति में संकलित
निबन्ध जहाँ एक ओर लखक की अध्ययनशीलता,
अनुभूति की गहराई,
सूक्ष्म निरीक्षण की शक्ति का परिचय कराते हैं,
वहीं दूसरी ओर उसकी वर्णन-शैली की प्रभावोत्पादकता को भी परिलक्षित करते
हैं। अभिव्यक्ति को प्रभावपूर्ण बनाने में लेखक का अंग्रेजी-मोह भी मुखर हो
उठता है। भावों को गुम्फित करते समय निबन्धकार के व्यक्तित्व का गाम्भीर्य
कहीं-कहीं साथ छोड़ देता है। अधिकांश निबन्ध व्यास शैली में लिखे गये हैं।
फलतः कोई-कोई निबन्ध अधिक विस्तार पा गया है। मेरी दृष्टि में मूल विषय की
गरिमा बनाये रखना इन निबन्धों की विशिष्टता है,
जो
लेखक के उज्जवल भविष्य की ओर संकेत करती है।
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