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| 03.29.2009 |
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विद्यार्थी जी की पुण्यतिथि पर (२५ मार्च) |
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गणेश शंकर
’विद्यार्थी‘
का अद्भुत
’प्रताप‘ |
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साहित्य
की सदैव से समाज में प्रमुख भूमिका रही है। स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान
पत्र-पत्रिकाओं में विद्यमान क्रान्ति की ज्वाला क्रान्तिकारियों से कम
प्रखर नहीं थी। इनमें प्रकाशित रचनायें जहाँ स्वतन्त्रता आन्दोलन को एक
मजबूत आधार प्रदान करती थीं,
वहीं लोगों में बखूबी जन जागरण का कार्य भी करती थीं। गणेश शंकर
’विद्यार्थी’
साहित्य और पत्रकारिता के ऐसे ही शीर्ष स्तम्भ थे,
जिनके अखबार
’प्रताप’
ने
स्वाधीनता आन्दोलन में प्रमुख भूमिका निभायी। प्रताप के जरिये न जाने कितने
क्रान्तिकारी स्वाधीनता आन्दोलन से रूबरू हुए,
वहीं समय-समय पर यह अखबार क्रान्तिकारियों हेतु सुरक्षा की ढाल भी बना।
कानपुर
में विद्यार्थी जी ने १९१३ से साप्ताहिक
’प्रताप‘
के
माध्यम से न केवल क्रान्ति का नया प्राण फूँका बल्कि इसे एक ऐसा समाचार
पत्र बना दिया जो सारी हिन्दी पत्रकारिता की आस्था और शक्ति का प्रतीक बन
गया। प्रताप प्रेस में कम्पोजिंग के अक्षरों के खाने में नीचे बारूद रखा
जाता था एवं उसके ऊपर टाइप के अक्षर। ब्लाक बनाने के स्थान पर नाना प्रकार
के बम बनाने का सामान भी रहता था। पर तलाशी में कभी भी पुलिस को ये चीजें
हाथ नहीं लगीं। विद्यार्थी जी को १९२१-१९३१ तक पाँच बार जेल जाना पड़ा और यह
प्रायः
’प्रताप’
में प्रकाशित किसी समाचार के कारण ही होता था। विद्यार्थी जी ने सदैव
निर्भीक एवं निष्पक्ष पत्रकारिता की। उनके पास पैसा और समुचित संसाधन नहीं
थे,
पर
एक ऐसी असीम ऊर्जा थी,
जिसका संचरण स्वतंत्रता प्राप्ति के निमित्त होता था।
’प्रताप’
प्रेस के निकट तहखाने में ही एक पुस्तकालय भी बनाया गया,
जिसमें सभी जब्तशुदा क्रान्तिकारी साहित्य एवं पत्र-पत्रिकाएं उपलब्ध थी।
यह
’प्रताप‘
ही
था जिसने दक्षिण अफ्रीका से विजयी होकर लौटे तथा भारत के लिये उस समय तक
अनजान महात्मा गाँधी की महत्ता को समझा और चम्पारण-सत्याग्रह की नियमित
रिपोर्टिंग कर राष्ट्र को गाँधी जी जैसे व्यक्तित्व से परिचित कराया।
चौरी-चौरा तथा काकोरी काण्ड के दौरान भी विद्यार्थी जी
’प्रताप‘
के
माध्यम से प्रतिनिधियों के बारे में नियमित लिखते रहे। स्वतंत्रता आन्दोलन
के दौरान माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा रचित सुप्रसिद्ध देशभक्ति कविता
‘पुष्प
की अभिलाषा‘
प्रताप अखबार में ही मई १९२२ में प्रकाशित हुई। बालकृष्ण शर्मा नवीन,
सोहन लाल द्विवेदी,
सनेहीजी,
प्रताप नारायण मिश्र इत्यादि ने प्रताप के माध्यम से अपनी देशभक्ति को मुखर
आवाज दी।
विद्यार्थी जी एक पत्रकार के साथ-साथ क्रान्तिधर्मी भी थे। वे पहले ऐसे
राष्ट्रीय नेता थे जिन्होंने काकोरी षडयंत्र केस के अभियुक्तों के मुकदमे
की पैरवी करवायी और जेल में क्रान्तिकारियों का अनशन तुड़वाया। कानपुर को
क्रान्तिकारी गतिविधियों का केन्द्र बनाने में विद्यार्थी जी का बहुत बड़ा
योगदान रहा है। सरदार भगत सिंह,
चन्द्रशेखर आज़ाद,
विजय कुमार सिन्हा,
राजकुमार सिन्हा जैसे तमाम क्रान्तिकारी विद्यार्थी जी से प्रेरणा पाते
रहे। वस्तुतः प्रताप प्रेस की बनावट ही कुछ ऐसी थी कि जिसमें छिपकर रहा जा
सकता था तथा फिर सघन बस्ती में तलाशी होने पर एक मकान से दूसरे मकान की छत
पर आसानी से जाया जा सकता था। बनारस षडयंत्र से भागे सुरेश चन्द्र
भट्टाचार्य प्रताप अखबार में उपसम्पादक थे। बाद में भट्टाचार्य और प्रताप
अखबार से ही जुड़े पं० राम दुलारे त्रिपाठी को काकोरी काण्ड में सज़ा मिली।
भगत सिंह ने तो
’प्रताप’
अखबार में बलवन्त सिंह के छद्म नाम से लगभग ढाई वर्ष तक कार्य किया।
सर्वप्रथम दरियागंज,
दिल्ली में हुये दंगे का समाचार एकत्र करने के लिए भगत सिंह ने दिल्ली की
यात्रा की और लौटकर
’प्रताप‘
के
लिए सचिन दा के सहयोग से दो कालम का समाचार तैयार किया। चन्द्रशेखर आज़ाद से
भगत सिंह की मुलाकात विद्यार्थी जी ने ही कानपुर में करायी थी,
फिर तो शिव वर्मा सहित तमाम क्रान्तिकारी जुड़ते गये। यह विद्यार्थी जी ही
थे कि जेल में भेंट करके क्रान्तिकारी राम प्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
छिपाकर लाये तथा उसे
’प्रताप’
प्रेस के माध्यम से प्रकाशित करवाया। जरूरत पड़ने पर विद्यार्थी जी ने राम
प्रसाद बिस्मिल की माँ की मदद की और रोशन सिंह की कन्या का कन्यादान भी
किया। यही नहीं अशफ़ाकउल्ला ख़ान की क़ब्र भी विद्यार्थी जी ने ही बनवाई।
विद्यार्थी जी का
’प्रताप’
तमाम महापुरुषों को भी आकृष्ट करता था। १९१६ में लखनऊ कांग्रेस के बाद
महात्मा गाँधी और लोकमान्य तिलक इक्के पर बैठकर प्रताप प्रेस आये एवं वहाँ
दो दिन रहे। १९२५ के कानपुर कांग्रेस अधिवेशन के दौरान विद्यार्थी जी
स्वागत मंत्री रहे और जवाहर लाल नेहरू के साथ-साथ घोड़े पर चढ़कर अधिवेशन
स्थल का भ्रमण करते थे। यह विद्यार्थी जी ही थे जिन्होंने श्यामलाल गुप्त
’पार्षद’
को
प्रताप प्रेस में रखा एवं उनके गान
’राष्ट्र
पताका नमो-नमो’
को
’झण्डा
ऊँचा रहे हमारा’
में तब्दील कर दिया। विद्यार्थी जी सिद्धांतप्रिय व्यक्ति थे। एक बार जब
ग्वालियर नरेश ने उन्हें सम्मानित किया और कहा कि मुझे खुशी है कि आपके
पिताजी मेरे अंतर्गत मुंगावली में कार्यरत रहे हैं,
परन्तु आप मेरे बारे में अपने अखबार में लगातार विरोधी खबरें छाप रहे हैं।
तो विद्यार्थी जी ने निडरता से कहा कि मैं आपका और पिताजी के आपसे
सम्बन्धों का सम्मान करता हूँ,
परन्तु इसके चलते अखबार के साथ अन्याय नहीं कर सकता। हाँ,
यदि आप इन ख़बरों का प्रतिवाद लिखकर भेजेंगे तो अवश्य प्रकाशित करूँगा।
कालान्तर
में विद्यार्थी जी गाँधीवादी विचारधारा से काफी प्रभावित हुए एवं यह उनकी
लोकप्रियता का भी सबब बना। वे क्रान्तिकारियों एवं गाँधीवादी विचारधारा के
अनुयायियों के लिए समान रूप से प्रिय थे। इस बीच अंग्रेज़ी हुकूमत ने २३
मार्च १९३१ को भगत सिंह को फाँसी पर चढ़ा दिया तो भारतीय जनमानस आगबबूला हो
उठा। अंग्रेज़ी निर्दयता के विरूद्ध जनमानस सड़कों पर उतर आया। निडर एवं
साहसी व्यक्तित्व के धनी तथा साम्प्रदायिकता विरोधी विद्यार्थी जी इस दौरान
भड़के हिन्दू-मुस्लिम दंगों को शान्त कराने के लिए लोगों के बीच उतर पड़े।
उधर विद्यार्थी जी के प्रताप
से अंग्रेज़ी हुकूमत भी भयभीत थी। रायबरेली में मशीगंज गोली काण्ड के तहत
’प्रताप’
पर
मानहानि का केस चल रहा था और अंग्रेज बार-बार यह संदेश दे रहे थे कि जब तक
कानपुर में
’प्रताप’
जीवित है,
तब
तक प्रदेश में शान्ति स्थापना मुश्किल है। भड़की हिंसा को काबू करने के
दौरान २५ मार्च १९३१ को विद्यार्थी जी साम्प्रदायिकता की भेंट चढ़ गए। उनका
शव अस्पताल की लाशों के मध्य पड़ा मिला। वह इतना फूल गया था कि उसे पहचानना
तक मुश्किल था। नम आँखों से २९ मार्च को विद्यार्थी जी का अन्तिम संस्कार
कर दिया गया पर
’प्रताप’
के
माध्यम से
’विद्यार्थी’
जी
ने राजनैतिक आन्दोलन,
क्रान्तिकारी चेतना,
क्रान्तिधर्मी पत्रकारिता एवं साहित्य को जो ऊँचाईयाँ दीं,
उसने उन्हें अमर कर दिया एवं इसकी आंच में ही अन्ततः स्वाधीनता की लौ
प्रज्जवलित हुई।
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