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| 03.06.2009 |
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२१वीं सदी में स्त्री समाज के बदलते सरोकार
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भारत में
नारी को पूजनीय माना गया है। वैदिक काल से ही नारी विभिन्न रूपों में
सम्मानजनक स्थिति प्राप्त करती आ रही है। नारी की सुकोमलता,
सौंदर्य,
लज्जा व स्नेहिल स्वभाव सदैव से इसके आभूषण रहे हैं पर दुर्भाग्यवश इन्हीं
गुणों के कारण उसके साथ बार-बार छल भी हुआ है। समाज की सामन्तवादी सोच ने
नारी की आन्तरिकता की उपेक्षा कर उसकी भौतिक काया एवं बाहरी रूप-रंग को ही
आधार बनाया । आज जहाँ पुरुष की शुचिता उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व के आधार पर
मापी जाती है,
वहीं नारी की शुचिता अंग विशेष के आधार पर मापी जाती है।
प्राचीन
काल से ही जहाँ नारी को एक तरफ समाज में प्रतिष्ठा मिली,
वहीं दूसरी तरफ वह बर्बरता का शिकार हुयी । तुलसीदास ने तो नारी को ताड़ना
का अधिकारी बताकर पशु के समकक्ष खड़ा कर दिया-
’’ढोल,
गँवार,
षूद्र,
पशु नारी,
ये
सब ताड़न के अधिकारी।‘‘
मर्यादा पुरूषोत्तम राम ने पत्नी सीता के अग्निपरीक्षा में खरे उतरने के
बाद भी एक धोबी के कहने पर धोखे से अपनी पत्नी को घर से निर्वासित कर दिया
। सती-प्रथा की आड़ में तमाम नवयुवतियों को मृत पति के साथ चिता में ज़िन्दा
भस्म कर दिया गया । तमाम राजाओं की हैवानियत तब तक पूरी नहीं होती थी जब तक
वे पराजित राजाओं की रानियों को अपने हरम का हिस्सा नहीं बना लेते थे।
जौहर-प्रथा इसी का नतीजा थी । यह सब तो बीते युग की बातें हैं,
वर्तमान दौर में भी इस तरह की व्यथायें देखी और सुनी जा सकती हैं।
बिहार से मुसहर जाति की एक सांसद को टी० टी० ने ट्रेन के
वातानुकूलित कोच से परिचय देने के बावजूद इसलिये बाहर निकाल दिया क्योंकि
वह वेश-भूषा से वातानुकूलित कोच में बैठने लायक नहीं लगती थीं। याद कीजिये
दक्षिण अफ्रीका में
अंग्रेजों द्वारा गाँधी जी को ट्रेन के प्रथम श्रेणी डिब्बे से बाहर
निकालने का दृश्य। राजस्थान में
’साथिन‘
नामक संस्था से जुड़ी भँवरी
देवी ने जन-जागरूकता का बीड़ा उठाया तो हश्र बलात्कार के रूप में सामने आया।
देवदासी प्रथा के नाम पर कुंवारी
कन्या को भगवान के
दरबार में सौंप देना और तत्पश्चात मन्दिर के पुरोहित द्वारा कन्या के साथ
संभोग करना जैसी घटनायें भी
कुछेक देशों में देखी जा सकती हैं। पंचायत संस्थाओं में निम्न वर्ग की
महिलाओं को आरक्षण मिलने के साथ ही देश के कई क्षेत्र में निर्वाचित
सरपंचों के साथ बद्सलूकी की घटनायें अखबारों की सुर्खियाँ बनी । मध्य
प्रदेश के पन्ना जिले में हुआ
’सती
काण्ड‘
अभी बहुत पुराना नहीं हुआ है । इक्कीसवीं सदी की ओर उन्मुख राष्ट्र की
गर्वोक्ति घोषणाओं के साथ ही अखबारों में नित्य नाबालिगों
के साथ दुष्कर्म की घटनायें छपती रहती हैं। मुम्बई की लोकल ट्रेन
में एक वहशी द्वारा पाँच-छः यात्रियों के सामने एक बालिका से बलात्कार करना
और उन यात्रियों का चुप-चाप तमाशा देखना क्या इंगित करता है
?
सभ्य समाज
का दर्जा पा चुकने के बाद भी घर की महिलाओं से बलात्कार कर बदला चुकाने का
पाशविक अंदाज नहीं बदला है। विश्व के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र एवम्
लोकतन्त्र व सभ्यता के स्वयंभू रक्षक अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल
क्लिंटन भी अपने कार्यालय की एक अदना सी महिला कर्मचारी मोनिका लेविंस्की
के साथ अंतरंग क्षणों का लोभ नहीं छोड़ सके। एक सभ्य समाज की ये असभ्य
घटनायें हमें कहाँ ल जा रही हैं
?
आधुनिक
समाज सक्रमणकालीन दौर से गुजर रहा है। आाधुनिकता के नाम पर सफलता हेतु
शार्टकट रास्ते अपनाना,
स्वतन्त्रता के नाम पर उन्मुक्तता का पक्ष- पोषण करना इसकी विशेषतायें बन
चुकी हैं ।
’आई
डोन्ट केयर‘
की
संस्कृति फलने-फूलने लगी है। शारीरिक वर्जनायें खत्म होती जा रही हैं ।
गली- मुहल्लों में तेजी से बढ़ता सौन्दर्य का बाज़ार,
ब्यूटी-क्वीन प्रतियोगिताओं की भरमार,
कुछ ही समय में सब कुछ पा लाने की महत्वाकांक्षा,
विज्ञापन के नाम पर नारी मॉडलों के शरीर का प्रदर्शन,
फिल्मों और धारावाहिकों में रिश्तों के तेजी से टूटने का प्रचलन एवम् कम
होते कपड़े किस आाधुनिकता व स्वतंत्रता के परिचायक हैं?
क्या
भारतीय संस्कृति अपनी मूल आस्थाओं को छोड़कर उस पाश्चात्य संस्कृति की तरफ
उन्मुख हो रही है,
जहाँ बात-बात में नार स्वतन्त्रता के नाम पर छाती उघाड़ देना फैशन बन गया
है?
इस
संक्रमण काल के बीच २१वीं सदी के प्रारम्भिक वर्षों में एक ऐसा वर्ग उभरा
जो अपनी मुक्ति शारीरिक वर्जनाओं को तोड़ने में नहीं अपितु खोखली
सामाजिक-धार्मिक रूढ़ियों को तोड़ने में देखता है। इनकी शक्लो-सूरत ओर
हैसियत पर मत जाईये। ये न तो फेमिनिस्ट के रूप में नारी आन्दोलनों से जुड़ी
हैं और न पश्चिमी देशों की उन नारियों की तरह है जो स्वतंत्रता के नाम पर
अपनी छाती उघाड़कर प्रदर्शन करती हैं। न ही इनके साथ किसी बड़े घराने या
कॉरपोरेट जगत या राजनैतिक दल का नाम जुड़ा हुआ है और न ही ये कोई बड़े-बड़े
दावे करती हैं। ये वो महिलायें हैं
जो हमारे पास-पड़ोस की और हमारे बीच की हैं,
जिनसे हम न जाने कितने बार रूबरू हुए होंगे पर हमें उनकी खासियत का पता ही
नहीं। एक लम्बे समय से धर्मशास्त्रों और रूढ़ियों के नाम पर इन्हें यही
बताया जाता रहा कि फलां काम तुम्हारे लिए वर्जित है और यदि तुम ऐसा करने का
प्रयास करोगी तो तुम्हारे ऊपर अपशकुन व ईश्वरीय प्रकोप का खतरा मंडरायेगा।
पर ये औरों से अलग हैं क्योंकि वर्जनाओं को तोड़कर एक अलग लीक बनाना ही
इनकी खासियत है। पाश्चात्य सभ्यता के समर्थक कुछ लोगों को नारी स्वतंत्रता
का रास्ता दैहिक वर्जनाओं को तोड़ने और उन्मक्तता में दिखा। नतीजन,
गली-गली में कुकुरमुत्तों की तरह सौंदर्य प्रतियोगिताओं के आयोजन,
मॉडल बनने की होड़,
फिल्मों में काम पाने हेतु सर्वस्व न्यौछावर कर देने वालों की बढ़ती भीड़
.... पर समाज का यह वर्ग ऐसा है जो अभी भी सिर से पाँव तक पूरे कपड़े पहने
अपनी बौद्धिकता और जीवटता के दम पर समाज की रूढ़िगत वर्जनाओं को तोड़ने का
साहस रखता है।
कर्मकाण्डों के लिये विख्यात बनारस की लड़कियों ने तमाम रूढ़िगत वर्जनाओं और
परम्पराओं को बहुत पीछे धकेल कर कुछ नये मानदण्ड स्थापित किये हैं।
कर्मकाण्ड का सबसे प्रमुख तत्व पुरोहिती है और पाँडित्य में बनारस का कोई
सानी नहीं। प्राचीन काल से ही यहाँ के पंडितों ने दुनिया भर में अपनी धाक
जमाई है। प्राचीनकाल में जहाँ लोमशा एवं लोपामुद्रा आदि नारियों ने ऋग्वेद
के अनेक सूक्तों की रचना करके और मैत्रेयी,
गार्गी,
शाश्वती,
घोषा,
अदिति इत्यादि विदुषियों ने अपने ज्ञान से तब के तत्वज्ञानी पुरुषों को
कायल बना रखा था,
उसी परम्परा में अब पुरुष पुरोहितों की परम्परा को बनारस की लड़कियों ने
तोड़ दिया है। तुलसीपुर स्थित पाणिनी कन्या महाविद्यालय से शास्त्री की
परीक्षा उतीर्ण कई लड़कियाँ अब लोगों के विवाह करवा रही हैं और यह ज़रूरी
नहीं कि वे ब्राह्मण ही हों। महाविद्यालय की आचार्या नंदिता शास्त्री बड़े
गर्व से बताती हैं कि विवाह कराने के लिये उनकी छात्राओं को बनारस ही नहीं
वरन् दूर-दूर से लोग आमंत्रित कर रहे हैं। हैदराबाद में बसी यहाँ की पूर्व
छात्रा मैत्रेयी को वैदिक रीति से विवाह कराने के लिए अमेरिका तक से
आमंत्रण आ चुके हैं। जब इन छात्राओं ने आरम्भ में यह कार्य आरम्भ किया तो
इनका विरोध करने के लिए परम्परागत पंडितों ने वर व कन्या पक्ष को शास्त्रों
से उद्धरण देकर काफी भड़काया पर अब वही पंडित इन लड़कियों का लोहा मानने
लगे हैं। कारण- मंत्रों का शुद्ध उच्चारण,
उसकी सम्यक व्याख्या और वैवाहिक संस्कार की सभी रस्मों का पालन करवाने में
लड़कियाँ परम्परागत पंडितों से कहीं आगे हैं। आम तौर पर कम पढ़े-लिखे पंडित
विवाहों में शुद्ध मंत्र का उच्चारण तक नहीं कर पाते। अब ये छात्रायें
विवाह ही नहीं शांति यज्ञ,
गृह प्रवेश,
मुंडन,
नामकरण और यज्ञोपवीत भी करा रही हैं। ऐसा नहीं है कि यह क्रांतिकारी बदलाव
सिर्फ बनारस तक ही सीमित है वरन् देश के अन्य भागों में भी इस बदलाव को
महसूस किया जाने लगा है। औद्योगिक महानगर कानपुर में कानपुर विद्या मंदिर
डिग्री कॉलेज की प्राचार्या डॉ० आशारानी राय वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच
पुरोहिती का कार्य करती हैं। उन्होंने जब छात्राओं को सार्वजनिक रूप से वेद
पाठ आरम्भ कराया तो व्यापक विरोध भी झेलना पड़ा। यहाँ तक कि एक शंकराचार्य
ने इसे वेद विरुद्ध तक घोषित कर दिया। पर आशारानी ने हार नहीं मानी और
नतीजन आज उनकी तमाम छात्रायें कर्मकाण्ड कराने लगी हैं। हरिद्वार में कनखल
स्थिति माँ योग शक्ति धाम की अधिष्ठाता माँ योग शक्ति ने अमेरिका में रहने
वाले भारतीय मूल की साध्वी माँ ज्योतिषानन्दन को जगद्गुरू शंकराचार्य के
समकक्ष पार्वत्याचार्य की
उपाधि से अलंकृत किया तो गुस्साये साधु सन्तों ने किसी महिला को यह उपाधि
देने के विरोध में जमकर हंगामा किया।
सिर्फ
घरेलू कर्मकाण्डों तक ही क्यों,
माता-पिता के अंतिम संस्कार से लेकर तर्पण और पितरों के श्राद्ध तक करने का
साहस भी इन लड़कियों ने किया है,
जिसे महिलाओं के लिए सर्वथा निषिद्ध माना जाता रहा है। संयोग से इसकी
शुरूआत भी कर्मकाण्डों के लिये विख्यात बनारस से ही हुई। इस दिशा में
सुनीति गाडगिल ने अलख जगाई जिन्होंने विवाह,
पूजा,
यज्ञ आदि करवाने में ही भूमिका नहीं निभाई वरन् श्राद्ध कर्म भी करवाकर
मिसाल कायम की। बनारस के ही पाण्डेयपुर क्षेत्र की निवासी तनू उर्फ वन्दना
जायसवाल,
मंडुवाडीह की लक्ष्मीणा देवी,
नगर निगम के सफाईकर्मी रहे गोलगड्ढा निवासी मुन्ना की विधवा बीदा देवी और
भेलूपुर की महिला चित्रकार और विदेश में कला की प्रोफेसर रहीं डॉ० अलका
मुखर्जी ने परिवार में किसी अन्य पुरुष सदस्य के न रहने पर अपनी माँ,
पिता और पति का अंतिम संस्कार धार्मिक क्रियाओं के बीच विधिवत सम्पन्न
किया। वन्दना जायसवाल ने घंट इत्यादि बाँधकर नित्य घाट पर अपनी माँ का
तर्पण भी किया। अब तो इस सामाजिक बदलाव की बयार का असर देश के अन्य भागों
में भी दिखाई पड़ने लगा। तभी तो कानपुर की डॉ० आशारानी राय महिलाओं के लिए
सर्वथा निषिद्ध श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार सम्पन्न कराने से नहीं
हिचकतीं। अपने पिता और श्वसुर का अंतिम संस्कार भी स्वयं उन्होंने ही
सम्पन्न किया। यही नहीं कुछेक समय पहले तक प्रयाग के रसूलाबाद घाट पर
महाराजिन बुआ नामक महिला श्मशानघाट में वैदिक रीति से अंतिम संस्कार
सम्पन्न कराती थीं। राजस्थान के भीलवाड़ा में एक ७२ वर्षीया विधवा की मृत्यु
पर उसकी सात बेटियों ने मिलकर अर्थी को कंधा दिया तथा अंतिम संस्कार के
लिये चिता को मुखाग्नि दी और पिण्डदान किया। परिवार में बेटों के न होने पर
लोगों ने बड़े दामाद से मुखाग्नि दिलवाने का प्रयास किया पर सातों बेटियों
ने कहा कि-
“उनकी
माँ ने बेटा न पैदा होने पर बेटियों को ही बेटों की तरह पाला तथा किसी भी
तरह की कमी नहीं होने दी।“
हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले की दलित महिला प्रेमी देवी ने तो अपने पति
की अर्थी को बेटों को कन्धा तक नहीं लगाने दिया और अर्थी को कंधा देने की
ज़िद करने पर उन्हें धक्के मारकर घर से निकाल दिया। उसने कहा कि मेरे पति के
ज़िन्दा होने पर इन बेटों ने कभी हमारी सेवा नहीं की और न ही रोज़मर्रा के
खर्च के लिये कोई इन्तजाम किया और ऐसे में पति का निर्देश था कि-
’’इन
अवारा कलयुगी बेटों को मेरी अर्थी में कंधा न लगाने दिया जाये।‘‘
अंततः अर्थी को दोनों बहुओं व पड़ोस की दो अन्य औरतों ने कंधा दिया और
मुखाग्नि उसके चार पोतों ने दी। इसी प्रकार गोरखपुर स्थित सहजनवां के
दीनदयाल उपाध्याय महिला विद्यालय में स्नातक की विकलांग छात्रा बुधवन्त
सिंह ने अपने पिता की अर्थी को अपने हाथों से सजाया और कंधा देने वालों के
अभाव में ठेले पर रखकर श्मशान घाट ले जाकर विधिवत मुखाग्नि देकर अपना
कर्तव्य निभाया। बाँदा में निर्मला गर्ग नामक महिला ने पुत्र के होते हुए
भी अपने पति की चिता को आग दी तो शाहजहाँपुर में पेशे से इंजीनियर शिप्रा
नामक लड़की ने सगाई के अगले ही दिन दिवंगत हुए अपने पिता की अर्थी को न
केवल मेंहदी रचे हाथों से कांधों पर धरा बल्कि उन्हें मुखाग्नि देकर
रूढ़ियों को भी ललकारा। धार्मिक मान्यताओं पर विश्वास करें तो अंतिम संस्कार
कोई भी सम्पन्न करा सकता है किन्तु अदृश्य की उत्पत्ति का अधिकार शास्त्रों
में पुत्र और पौत्र के अलावा राजा व ब्राह्मण को ही होता है। भले ही धर्म
के पुरोधा मानें कि शवदाह के बाद का काम ब्राह्मण ही करेगा वरना आत्मा
भटकेगी और अगले जन्म में शरीर का अंग-प्रत्यंग भी ठीक-ठाक नहीं होगा पर इन
महिलाओं की मानें तो यह पुरुष प्रधान पितृसतात्मक समाज की सोच है जो सारे
पुण्य अकेले ही लूटना चाहता है। हिमाचल प्रदेश की घटना समाज के सामने यह भी
सवाल खड़ा करती है कि अपने माँ-बाप की देखरेख न करने वाले बेटों को धार्मिक
मान्यताओं के नाम पर माँ-बाप की अर्थी में कंधा देने का क्या नैतिक अधिकार
है?
निश्चिततः उस निरक्षर दलित महिला ने इसी बहाने माँ-बाप के प्रति संतानों को
दायित्व बोध का पाठ भी पढ़ाया।
याद
कीजिये
’बीबी
हो तो ऐसी‘
फिल्म में नायिका रेखा का घोड़ी पर सवार होकर दूल्हे के द्वार बारात ले
जाना। इस फिल्मी कथानक को भी लड़कियों ने हकीकत में बदल दिया। संयोग से
इसकी शुरूआत भी कर्मकाण्डों के लिये विख्यात बनारस से ही हुई यानी भोलेनाथ
की नगरी में गंगा एक बार फिर उल्टी बही। इस सब के पीछे कश्यप फिल्म एण्ड
टेलीविजन रिसर्च इन्स्टीट्यूट के निदेशक डा० डी०एल० कश्यप की प्रमुख भूमिका
रही,
जिन्होंने अपने तीन बेटों और दो बेटियों के हाथ बनारस के घमहापुर गाँव में
एक साथ एक ही मण्डप में पीले किये। अभी तक दहेजलोलुप दूल्हों को लड़कियों
द्वारा विवाह मण्डप से बाहर निकालने या शराबी दूल्हे के साथ विवाह करने से
इन्कार करने जैसे उदाहरण ही सामने आये हैं पर परम्पराओं को दरकिनार करते
हुए डा० कश्यप के तीनों बेटों से विवाह करने उनकी दुल्हनें घोड़ी पर सवार
होकर मय बारात उनके दरवाजे आयीं जहाँ दूल्हे के पिता ने बहुओं की आगवानी की
तथा उन्हें घोड़ी से उतारकर उनका पाँव पूजा। जबकि परम्परा है कि लड़की का
पिता दूल्हे का पाँव पूजता है। प्रतीकात्मक द्वारपूजा के बाद दुल्हनों को
मंच पर महाराजा कुर्सी पर बिठाया गया और फिर दूल्हे राजा मंच पर आये। लड़की
वालों की ओर से निभाये जाने वाले सभी रस्मोरिवाज लड़कों के पिता ने पूरे
किये। इस विवाह में न तो कोई मंत्र पढ़ा गया और न ही सात फेरों के साथ कसमें
खायी गयीं,
अपितु सिर्फ जयमाल व सिन्दूरदान हुआ। इसी प्रकार जयपुर में कानून की छात्रा
रही दो जुड़वाँ बहनें अपनी शादी के अवसर पर निकाली जानेवाली
’बिन्दौरी‘
में घोड़ी पर सवार होकर निकलीं। उनका मानना था कि-
’’यह
क्रांतिकारी कदम दर्शाता है कि हमारे समाज में लड़के-लड़कियों में कोई
भेद-भाव नहीं है।‘‘
उ०प्र० के जौनपुर में जब शादी पश्चात एक लम्बे समय तक पति अपनी विवाहिता को
लेने नहीं पहुँचे तो कुछेक लड़कियाँ खुद ही बारात (गौना) लेकर पतियों के
दरवाजे पहुँच गयीं। यही नहीं आधी आबादी की प्रतीक नारियों ने अब अनचाहे
दूल्हों को दरवाजे से लौटाना भी आरम्भ कर दिया है। गाय की बछिया समझकर किसी
के भी हाथ में पगहा पकड़ा देने वाले माता-पिता की पगड़ी की लाज की खातिर,
सामाजिक संस्कारों के बोझ तले दबकर अपना भविष्य बर्बाद करने की बजाय तमाम
लड़कियों ने दहेज लोभी,
शराबी,
उम्रदराज इत्यादि जैसे दूल्हों को निडरता से दरवाजे से लौटाने में संकोच
नहीं किया।
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