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ISSN 2292-9754

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06.14.2014


सेदोका


रे कवि मन
बस अब वीरों का
कर अभिनन्दन
भाए न मुझे
बिंदिया या कजरे
कंगन का वंदन।

लें केसरिया
गूँज उठे धरती
केसरी -सा गर्जन
जागें जो सोए
शावक सिंहनी के
डरे, विद्रोही मन।

धवल कान्ति
बने मन निर्मल
सौम्य शांत उज्ज्वल
तिरंगा मेरा
जग में फहराए
सुख -शान्ति बढ़ाए।

क्षमा सहेजें
अनाचार गद्दार
कभी नहीं स्वीकार,
उग्र तेज से
रहे दीपित माथा
लिखें गौरव गाथा।

हरित हरे
पीड़ाएँ जगती की
तपती धरती की
सुख समृद्धि
बिखरे चहुँ ओर
होए निशि से भोर।

मै तारिका -सी
मन आकाश दिपी
उज्ज्वल औ शीतल
मधुर गीत
भाव भरा कोमल
रुनझुन पायल।

मेरी गोद में
छुपोगे अभी तुम
यू आँचल पसारा,
ममता कहे-
दुख की छाया न हो
हाँ,सुख पा लो सारा।

अनुरागिनी
चाहा अनुराग से
भरूँ मन तुम्हारा
दूँ प्यार सारा
अपनाते तो तुम
सहज विश्वास से।

जानोगे कब ?
मै हूँ तुम्हारे लिए
प्रेम अमृत लिये
बना लो मुझे
बस द्वार- तोरण
या आँगन की वृन्दा।
१०
तेजोमयी सी
तेरे दिये ताप से
जागरित हो गई
उदात्त हो या
अनुदात्त हो तुम
मै स्वरित हो गई।
११
सुरभित- सी
पवन, ले अनंग
धरा पीत वसना
हे ऋतुराज!
कुहू, पिक पुकारे -
स्वागत है तुम्हारा!


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