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ISSN 2292-9754

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06.14.2014


कुंडलियाँ

चंदा सा सूरज हुआ, बदला बदला रूप,
सज्जन के मन सी हुई, सुखद सुहानी धूप।
सुखद सुहानी धूप, शीत में लगती प्यारी,
नयन तकें अब राह, भेंट है प्रभु की न्यारी।
तेजोमय का तेज, लगे जब कुछ मंदा सा,
समझ समय का फेर, न हो सूरज चंदा सा॥१

कैसे-कैसे दे गई, दौलत दिल पर घाव,
रिश्तों से मृदुता गई, जीवन से रस भाव।
जीवन से रस भाव, कहें ऋतु कैसी आई,
स्वयं नीति गुमराह, भटकती है तरुणाई।
स्वारथ साधें आप, जतन कर जैसे-तैसे,
लोभ दिखाए खेल, देखिये कैसे-कैसे॥२

जीवन में उत्साह से, सदा रहे भरपूर,
निर्मलता मन में रहे, रहें कलुष से दूर।
रहें कलुष से दूर, दिलों के कँवल खिले से,
हों खुशियों के हार, तार से तार मिले से।
दिशा-दिशा हो धवल, धूप आशा की मन में,
रहें सदा परिपूर्ण, उमंगित इस जीवन में॥३

बाँचो पाती नेह की, नयना मन के खोल,
वाणी का वरदान हैं, बस दो मीठे बोल।
बस दो मीठे बोल, बडी़ अदभुत है माया,
भले कठिन हो काज, सरल सा हमने पाया।
समझाती सब सार, साँस यह आती जाती,
क्या रहना मगरूर, नेह की बाँचो पाती॥४

राधा की पायल बनूँ, या बाँसुरिया, श्याम,
दोंनों के मन में रहूँ, इच्छा यह अभिराम।
इच्छा यह अभिराम, संग राखें बनवारी,
दो बाँसुरिया देख, दुखी हों राधा प्यारी।
हो उनको संताप, मिलेगा सुख बस आधा,
कान्हा के मन वास, चरण में रख लें राधा॥५


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