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ISSN 2292-9754

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06.15.2014


दोहे

भरे-भरे से नयन हैं, मुरझाए अरमान।
मुख से, कहो न भारती, कहाँ गई मुस्कान॥१

घर से निकले जब सुता, माँ रहती हैरान।
क्या मुझसे पूछो भला, कहाँ गई मुस्कान॥२

बेटा हुआ निराश सा, ढूँढ रहा पहचान।
पिता कहें परिवार की, कहाँ गई मुस्कान॥३

राजनीति चौसर बिछा, खेल रही है द्यूत।
शकुनि दे रहे मंत्रणा, प्रज्ञा हुई अछूत॥४

चर्चा चली चुनाव की, लोग खा रहे ताव।
चमके कुर्ते, टोपियाँ, खूब पा रहे भाव॥५

चर्चा ख़त्म चुनाव की, मौसम हुआ उदास।
सोचें कुर्ते, टोपियाँ, बीत गए दिन ख़ास॥६

होगा कभी सुराज भी, पाएँ सुख-सौगात।
मुश्किल है मन को बड़ा, समझना यह बात॥७

पद्म आसना माँ सदा, करूँ विनय कर जोर।
फिर भारत उठकर चले, सही दिशा की ओर॥८

दिए दिलासा दे रहे, रख मन में विश्वास।
हला ! ना हिम्मत हारिए, जलें, भोर की आस॥९

तम की कारा से निकल, किरण बनेगी धूप।
महकेगी पुष्पित धरा, दमकेगा फिर रूप॥१०


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