अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
03.01.2016


झरे पुष्प पात
(हाइकु)

1.
तेरे सामने
पात झरे मन से
तू चुप रहा!
2.
शर्म से सूखी
अनावृत्त शाखाएँ
लौटा दो वस्त्र!
3.
एक ही रात
ले गई पुष्प–पात,
शोक में शाखा।
4.
कुंती-सी डाली
बहाती सरिता में
पर्ण-कर्ण-से।
5.
तजे हैं माया
पतझर गुरु की
ये ऋतु शिष्या।
6.
रूपसी ऋतु
उतारे आभरण
कोई तो ऋण!
7.
साध्वी है ऋतु
पतझर साधक
मोक्ष की ओर।
8.
डाकू-मौसम
छीने हैं जड़े रत्न
तरु-तन से।
9.
डाली-पांचाली
बसंत कृष्ण रोके
चीर-हरण।
10.
ये झरे पात
हैं निमंत्रण-पत्र
मधुमास के।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें