अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
12.20.2014


एक आस

तुमने मुझे
कभी तो चाहा होता,
सराहा होता।
एक शहर में ही
रहते नहीं
अलग -अलग से,
भोली भूलें थीं
माना मेरी भी कहीं,
पर तुम्हारे?
अक्षम्य अपराध
भ्रम-सर्पों के
मन के पाताल में
पालते रहे
जो हर पल दिल
सालते रहे।
दे गये नेह-पीड़ा,
उलाहनों के
तेरे दिये वो दंश,
यूँ मुझमें भी
समा गया आखिर
विष का अंश।
फिर भी यह मन
तुझमे खोया,
चाहे टूटा या रोया
एक ही आस
भर देती है श्वास
गाते अधर-
ज़हर को ज़हर
करेगा बेअसर।

(छंद - चोका)


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें