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ISSN 2292-9754

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03.27.2015


शिक्षा, ज्ञान-विज्ञान, अंतर्राष्ट्रीय आदान-प्रादान, और विदेशी भाषा शिक्षण:
मातृभाषा बनाम अँग्रेज़ी माध्यम में पढ़ाई

१. सफल शिक्षा की भाषा:

भारत भर में यह धारणा घर कर गई लगती है कि पूरे विश्व का ज्ञान अँग्रेज़ी में है, दुनिया के साथ हर तरह का आदान-प्रादान अँग्रेज़ी से ही हो सकता है, विज्ञान एवं तकनालोजी के विषयों को पढ़ाने के लिए भारतीय भाषाओं में न तो सामग्री उपलब्ध है और न ही हमारी भाषाओं में यह सामर्थ्य है कि ये विषय उन में पढ़ाए जा सकें। इस धारणा के परिणामस्वरूप भारत भर में अब उच्च शिक्षा के साथ-साथ स्कूल स्तर पर भी अँग्रेज़ी माध्यम शिक्षा प्रणाली बड़ी तीव्र गति से बढ़ रही है।

अँग्रेज़ी के प्रति यह दृष्टिकोण शिक्षा एवं भाषा के संबंधों के बारे में गैर पेशेवर क्षेत्रों में पिछले ३० साल से कब्ज़ा जमाए बैठा है। अँग्रेज़ी के प्रति इस दृष्टिकोण से भारतीय भाषाओं को, भारत की शिक्षा को, और अँग्रेज़ी भाषा के शिक्षण को न पूरा किए जा सकने वाला नुकसान हो चुका है और आगे और नुक्सान होने वाला है। भारत में अँग्रेज़ी के प्रति इस दृष्टिकोण को समझने के लिए निम्न प्रश्नों के उत्तर जानना ज़रूरी है:

क. आज के युग में ज्ञान-विज्ञान एवं तकनालोजी की शिक्षा किस भाषा में सफलतापूर्वक दी जा सकती है?

ख. विश्व में अँग्रेज़ी की क्या स्थिति है, क्या रहेगी और दुनिया से व्यवसाय करने के लिए अँग्रेज़ी की कितनी आवश्यकता है?

ग. यदि विज्ञान और तकनालोजी वगैरा का शिक्षण भारतीय भाषाओं में करना हो तो क्या भारतीय भाषाओं में ऐसा सामर्थ्य और सामग्री मौजूद है?

घ. यदि अँग्रेज़ी इन क्षेत्रों के लिए आवश्यक निकल आए तो फिर अँग्रेज़ी भाषा की अच्छी मुहारत कैसे हासिल की जा सकती है?

यह प्रश्न ऐसे प्रश्न हैं जिन पर विश्व भर के शिक्षा एवं भाषा विशेषज्ञ पिछले पचास वर्षों में हज़ारों शोध कर चुके हैं और इन पर विचार कर चुके हैं। इस तरह इन प्रश्नों पर अत्याधिक अकादमिक और व्यावहारिक प्रमाण हासिल हैं। इस दस्तावेज़ में इन प्रमाणों का सारांश ही पेश किया गया है।

विश्व भर के माहिर इस विषय पर एकमत हैं और विश्व भर का तजुर्बा यही दर्शाता है कि शिक्षा सिर्फ और सिर्फ मातृभाषा में ही सफलतापूर्वक दी जा सकती है। अगर बच्चे को भाषा ही समझ नहीं आ रही तो उसके दिमाग में विचार कैसे भरे जा सकते हैं? मशीन से छेद करके दिमाग में संकल्प भरने की विधि अभी तैयार नहीं हुई है। अगर हो भी जाए तो भी छेदों में भी भाषा ही भरनी पढ़ेगी क्योंकि विचार का अस्तित्व भाषा के रूप में ही होता है। इसी लिए बच्चे को उस भाषा का ज्ञान होना आवश्यक है जिस भाषा में ज्ञान-विज्ञान और तकनालोजी का शिक्षण होना है। विश्व भर के शिक्षाविदों और भाषाविदों का मत है कि ५-७ साल लगाकर ही किसी भाषा का इतना ज्ञान होता है कि उसमें शिक्षा की आरम्भिक बातें की जा सकें। इसलिए अगर आरम्भ में मातृ भाषा में शिक्षा नहीं होती तो बच्चे के इतने साल ख़राब हो जाते हैं, और जो इसके साथ मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, और सांस्कृतिक नुक्सान होते हैं वो अलग हैं। सो, शिक्षा की सफलता के लिए बहुत ज़रूरी है कि सकूल स्तर पर अँग्रेज़ी माध्यम शिक्षा को तुरंत बंद किया जाए।

तजुर्बे से भी यही सामने आता है कि अँग्रेज़ी माध्यम शिक्षा ने शिक्षा के स्तर को और अँग्रेज़ी भाषा के शिक्षण के स्तर को गहरी घात लगाई है। कोई ऐसा प्रमाण नहीं मिलता कि अँग्रेज़ी माध्यम में शिक्षा से कोई ऐसे बड़े विज्ञानी और विद्वान पैदा हो गए हैं जो भारतीय भाषाओं के माध्यम में शिक्षा से पैदा न हो सके हों। बल्कि यह बात अब सब मानते लगते हैं कि अँग्रेज़ी माध्यम से केवल शिक्षा का स्तर ही नहीं गिरा है, अँग्रेज़ी की मुहारत का स्तर भी पहले से गिर गया है।

अँग्रेज़ी माध्यम की शिक्षा प्रणाली ने एक और तरह से भारतीय शिक्षा का विनाश किया है। इस ने लगभग ८० फीसद आबादी को शिक्षा के क्षेत्र से बाहर कर दिया है। प्रभावशाली वर्ग के सभी बच्चे अँग्रेज़ी स्कूलों में चले जाने के कारण सरकारी शिक्षा प्रणाली का विनाश हो गया है और ८० फीसद बच्चे इसी प्रणाली पर निर्भर हैं। इस बात पर तो किसी की असहमति नहीं होनी चाहिए कि एक अशिक्षित व्यक्ति आज के युग में विज्ञान और तकनालोजी में कोई विशेष योगदान नहीं दे सकता। सभी जानते हैं कि ज़्यादातर तीसरी दुनिया के मुकाबले में भी भारत में शिक्षा का प्रसार कम हो रहा है। और यह ज्ञान-विज्ञान की सदी में हो रहा है।

इस संदर्भ में अंतर्राष्ट्रीय स्थिति पर नज़र डालना आवश्यक है। शिक्षा और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में केवल वही देश आगे जा रहे हैं जहाँ शिक्षा मातृभाषा में दी जा रही है। चीन, जापान, कोरिया, रूस, जर्मनी, फ्रांस जैसे देश अँग्रेज़ी माध्यम की शिक्षा के बिना हम से कहीं आगे हैं। वे इसी लिए आगे हैं कि उन्होंने अपनी शिक्षा को विदेशी-भाषा-रोग से ग्रस्त नहीं होने दिया। यहाँ तक कि अमेरिका, कैनेडा, न्यूज़ीलैंड जैसे अँग्रेज़ी भाषी देशों में भी बच्चे को उसकी मातृभाषा में स्कूली शिक्षा देने की पूरी कोशिश की जाती है। इन देशों में हज़ारों स्कूल हैं जिनमें शिक्षा का माध्यम अँग्रेज़ी नहीं है। अमेरिका के शहर बोस्टन की एक मिसाल तो आँखें खोलने वाली है। वहाँ एक स्कूल में शिक्षा का माध्यम अँग्रेज़ी न होकर उस क्षेत्र के अफ्रीकी मूल के निवासियों की स्थानीय भाषा थी। लेकिन उन्होंने हमारी तरह अंधविश्वास में स्कूल की शिक्षा का माध्यम अँग्रेज़ी कर दिया। दो-तीन साल में ही वहाँ ऐसे बुरे नतीजे सामने आए कि उस स्कूल की शिक्षा फिर से स्थानीय भाषा में कर दी गई।

इस बात पर विश्वास करना कठिन है पर यह सच है कि दक्षिण एशिया के क्षेत्र को छोड़ कर गैर-अँग्रेज़ी भाषी देशों में अँग्रेज़ी शिक्षा के माध्यम के रूप में लगातार खारिज की जा रही है। इस सम्बन्ध में नाईजीरिया, मलेशिया, फिलिपीन जैसे देशों की मिसालें दी जा सकती हैं। यूनेस्को पिछले ५० सालों से बार-बार अध्ययन करके ज़ोर-ज़ोर से कह रही है कि सफल शिक्षा मातृभाषा में ही संभव है। हमारे समय में छठी कक्षा में अँग्रेज़ी के एक अध्याय में सड़क के नियम पढ़ाए जाते थे। उस अध्याय की दो पंक्तियाँ मुझे अभी तक याद हैं – ‘कुछ लोगों के कान होते हैं पर वो सुनते नहीं है, और कुछ लोगों की आँखें होती हैं पर देखते नहीं हैं। अब इनमें यह जोड़ना भी ज़रूरी लगता है कि ‘कुछ लोगों के सर होते हैं पर उनमें भेजे नहीं होते’। भारतीय शिक्षा नीतिकार इस उत्तम नसल की सर्वोतम मिसाल हो सकते हैं। भारत में डॉ. मनमोहन सिंह और मोंटेक सिंह आहलूवालिया जैसे गैर-शिक्षाशास्त्रियों की शिक्षा नीतियों से पहले भारतीय शिक्षा कमीशन (कोठारी कमीशन) ने भी यही निर्देश दिए थे कि शिक्षा मातृभाषा में ही होनी चाहिए। अत: सपष्ट है कि सफल शिक्षा के लिए शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होना आवश्यक है। यूनेस्को की एक पुस्तक से निम्न मिसाल यह विशवास दिलाने के लिए काफी होनी चाहिए:

“यह स्वत:सिद्ध है कि बच्चे के लिए शिक्षा का सबसे बढ़िया माध्यम उसकी मातृभाषा है। मनोवैज्ञानिक आधार पर यह सार्थक चिन्हों की ऐसी प्रणाली है जो संप्रेषण और समझ के लिए उसके दिमाग में स्वचालित रूप में काम करती है, सामाजिक आधार पर जिस जनसमूह के सदस्यों से उसका सम्बन्ध होता है उसके साथ एकात्मक होने का साधन है, शैक्षिक आधार पर वह मातृभाषा के माध्यम से एक अनजाने माध्यम की अपेक्षा तेज़ी से सीखता है। (यूनेस्को, १९५३, द यूज़ आफ वर्नाक्लर्ज़ इन एजुकेशन, नम्बर ८, पन्ना-११)।

इस परिप्रेक्ष्य में एक और तथ्य हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है; २००३ में गणित और विज्ञानों के अध्ययन के रुझानों में शिखर पर रहने वाले पाँच देश (सिंगापुर, कोरिया गणतंत्र, हांगकांग, चाईना ताईपेई, और जापान) वो थे जहाँ स्कूली शिक्षा मातृभाषा माध्यम में होती है। २०१२ में स्कूल स्तर पर विज्ञान की शिक्षा में प्रथम १० देशों में अँग्रेज़ी में पढ़ाने वाल देश एक ही था।

२. विश्व में अँग्रेज़ी की स्थिति

विश्व में अँग्रेज़ी ३५ करोड़ लोगों की मातृभाषा है। इस हिसाब से दुनिया में अँग्रेज़ी का तीसरा स्थान बनता है। ११८ करोड़ के साथ मंडारिन (चीनी) पहले स्थान पर है और ४० करोड़ के साथ स्पेनी दूसरे स्थान पर। अँग्रेज़ी के मातृभाषी कहने वालों में अगर उन लोगों को भी शामिल कर लिया जाए जो अँग्रेज़ी द्वितीय भाषा के रूप में प्रयोग करते हैं, तो विश्व में अँग्रेज़ी जानने वालों की संख्या ७० करोड़ के लगभग बनती है। यह दुनिया की आबादी के १० फीसद के आस-पास है। इसका मतलब यह हुआ कि अँग्रेज़ी भाषा के ज़रिये विश्व के १० फीसद से ज़्यादा लोगों से बात नहीं हो सकती। बाकी ९० फीसद से बात करने के लिए अँग्रेज़ी किसी काम नहीं आती। हमें अँग्रेज़ी की व्यापारिक ज़रूरत इस लिए ज़्यादा महसूस होती है क्योंकि भारत का अंग्रजों की गुलामी का इतिहास रहा है। इस वज़ह से हमारा दूसरे विदेशी भाषियों की तुलना में अँग्रेज़ी से ज़्यादा संपर्क रहा है। दूसरे, १९८० के बाद अमेरिका का पूरे विश्व पर वर्चस्व हो जाने से अमेरिकी आर्थिकता और जीवन शैली के भारी होने के फलस्वरूप अँग्रेज़ी भाषा का प्रभाव भी बढ़ गया है। तीसरे, इन्टरनेट जैसे संचार माध्यम मूल रूप में अँग्रेज़ी पर आधारित होने के कारण भी अँग्रेज़ी को बहुत बल मिला। चौथे, भारत में सरकारी शिक्षा के निजीकरण और व्यापारीकरण से सरकारी शिक्षा का विनाश हो गया और व्यापारिक शिक्षा संस्थों ने मुख्य रूप से अँग्रेज़ी माध्यम को ही अपनाया। इसका कारण यह भी है कि भारत की केन्द्रीय एवं प्रांतीय सरकारों ने भारतीय भाषाओं को शिक्षा का माध्यम (विशेष रूप से उच्च शिक्षा का माध्यम) बनाने के प्रयत्न ७०वें के दशक के बाद बिलकुल ही छोड़ दिए। इस में अमीर वर्ग द्वारा ग़रीब वर्ग को शिक्षा और दूसरे लाभ के स्थानों से बाहर रखने का स्वार्थ भी गहन रूप से जुड़ा हुआ है। एक और बड़ा कारण यह भी है कि भारतीय उच्च वर्ग सदियों से विदेशी हुकमरानों की सेवादारी करते हुए अपना राष्ट्रीय स्वाभिमान खो चुका है और सामूहिक राष्ट्रीय विकास के लक्ष्य की और पूरी तरह पीठ कर चुका है। इन सभी कारणों से अँग्रेज़ी भाषा का प्रभाव इतना बढ़ गया है कि यह स्कूली शिक्षा के माध्यम के रूप में भी भारतीय मातृभाषाओं को बाहर धकेल रही है। यदि इस रुझान को रोका नहीं गया तो भारतीय मातृभाषाओं का शिक्षा एवं प्रशासन के क्षेत्रों से पूरी तरह बाहर होने का ख़तरा वास्तविक है। आज के युग में, शिक्षा एवं प्रशासन में प्रयोग किसी भी भाषा के जीवन व विकास का मूल आधार है।

लेकिन जैसे इतिहास में पहले भी होता रहा है, अँग्रेज़ी भाषा का प्रभाव बढ़ाने वाले कारण कोई सदैव नहीं हैं। विश्व के किसी भी साम्राज्य के पतन से उसकी भाषा का प्रभाव भी ख़त्म हो जाता है। क्योंकि प्रत्येक साम्राज्य के पतन के कारण भी उसी के अन्दर ही होते हैं, इस लिए अमेरीकी साम्राज्य का प्रभाव भी सदैव नहीं हो सकता। चीन विश्व के नक़्शे पर बहुत बड़ी आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित हो चुका है और इससे चीनी भाषा का अंतर्राष्ट्रीय कारोबार की भाषा के रूप में फैलाव होने के स्पष्ट संकेत भी आने लगे हैं (प्रमाण के लिए आगे देखिए)। कुछ समय पहले भारतीय समाचार पत्रों में ख़बर लगी थी कि केंद्रीय स्कूल शिक्षा बोर्ड अपने स्कूलों में चीनी भाषा के शिक्षण के प्रबंध करेगा। अमेरिका में एक उच्च स्तरीय नीतिकार ने कहा है कि हो सकता है कि कुछ वर्ष बाद हम अपने आप को कहें कि हम कितने मूर्ख थे जो अँग्रेज़ी भाषा के पीछे पड़े हुए थे। ज़रूरत तो चीनी सीखने की थी। अमेरिकी शिक्षा संस्थाओं में भी गैर-अँग्रेज़ी भाषाएँ सीखने वालों की संख्या में भारी वृद्धि हो रही है। अमेरिका में २००७ में चीनी भाषा सीखने वालों की गिनती २००० के मुकाबले १० गुना थी। २००७ के बाद तो चीनी तूफ़ान की रफ्तार और भी तेज़ हुई है।

यह तथ्य और भी महत्वपूर्ण है कि अमेरिका में गैर-अँग्रेज़ी भाषी अमेरिकी नागरिक भी अँग्रेज़ी को छोड़ रहे हैं। २०११ में अमेरिका में घर में अँग्रेज़ी न बोलने वालों की गिनती १९८० के मुकाबले १४० फीसदी ज़्यादा थी, जबकि इन सालों में अमेरिकी आबादी में केवल ४० फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। स्पष्ट है कि अमेरिका में भी ज़्यादा से ज़्यादा लोग गैर-औपचारिक क्षेत्रों में अँग्रेज़ी भाषा का प्रयोग तज रहे हैं। अमेरिका और इसके साथ अँग्रेज़ी के कम होते प्रभाव का इससे बड़ा और क्या प्रमाण हो सकता है? निम्न उक्ति आँखे खोलने वाली है (बशर्ते कि किसी ने आँखे बंद रखने की ठान ही न रक्खी हो, भारतीय कुलीन वर्ग की तरह):

“अँग्रेज़ी ने जो इज़ारेदाराना स्थिति बीसवीं सदी के अंत तक हासिल कर ली थी, इक्कसीवीं सदी में ऐसी इज़ारेदाराना स्थिति किसी भी भाषा की रहने वाली नहीं है। अँग्रेज़ी और सूचना तकनालोजी का रिश्ता अल्प-सम्यक हो सकता है। जैसे पहले अँग्रेज़ी भाषी सबसे बढ़िया और नई तकनालोजी का लाभ उठाते थे, अब यह सत्य नहीं है.” (डेविड ग्राडोल, २००० (१९९७), द फ्यूचर आफ इंग्लिश? अ गाईड टू फोरकास्टिंग द पापुलैरिटी आफ इंग्लिश इन द ट्वंटी फर्स्ट सेंचुरी, द ब्रिटिश काऊंसिल)।

आस्ट्रेलिया ने `एशियाई अध्ययन पाठ्यक्रम प्रोग्राम’ में तय किया है कि हर स्कूल में एशियाई भाषाएँ पढ़ाना ज़रूरी होगा (फिलिप कूरी, द सिडनी मार्निंग हेराल्ड, २९ अक्टूबर २०१२).

बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ उन्हीं लोगों को नौकरियाँ देने की इच्छुक हैं जिनको अँग्रेज़ी के बिना किसी और भाषा का ज्ञान भी हो। विश्व के एकीकरण से जैसे पहले अँग्रेज़ी भाषा को बल मिला था, अब इसके फलस्वरूप व्यापारिक आदान-प्रादान और वस्तुओं (और मानव-वस्तुओं) के मंडीकर्ण में स्थानीय भाषाएँ आवश्यक हो गई हैं। बहुत सारे उपकरण (कंप्यूटर आदि) भाषा से जुड़े होने के कारण इनकी बिक्री के लिए इनको स्थानीय भाषों पर आधारित करना आवश्यक हो गया है। इंटरनेट पर भी अँग्रेज़ी का वर्चस्व ख़त्म हो रहा है और गैर-अँग्रेज़ी भाषाओं का दायरा बढ़ रहा है। २००० के आस-पास इंटरनेट पर ८० फीसदी जानकारी अँग्रेज़ी में होती थी। अब यह प्रतिशत ३५ के आस-पास है। अँग्रेज़ी के प्रसार से मातृभाषाओं और संस्कृति के भारी नुक्सान होने से मातृभाषाओं और संस्कृति के प्रति चैतन्य और अँग्रेज़ी भाषा का विरोध भी बढ़ रहा है। अँग्रेज़ी भाषा की वज़ह से शैक्षिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और प्राशासनिक क्षेत्रों में होने वाले नुक्सान भी सामने आने लगे हैं और इन क्षेत्रों में मातृभाषाओं की भूमिका और महत्व के पक्ष में तर्क अधिक स्वीकारीय होने लगे हैं। समाज के इस पड़ाव पर विश्व में जनवाद की प्रक्रिया को रोकना क्योंकि अब इतना आसान नहीं है, इस लिए स्थानीय भाषाओं की सामाजिक शक्ति में वृद्धि का रुझान जारी रहना स्वाभाविक है। भाषा से क्योंकि ताकत की बाँट भी जुडी हुई है, इस लिए ताकत की बाँट की लड़ाई में मातृभाषाओं की स्थिति की लड़ाई भी चल रही है। उच्च वर्ग की पहचान अँग्रेज़ी भाषा से जुड़ जाने से वर्गों की लड़ाई के साथ भाषाओं के लिए लड़ाई भी जुड़ गई है। वंचित वर्ग को महिसूस होने लगा है कि अँग्रेज़ी भाषा को हथियार बनाकर उनको किस प्रकार शिक्षा, ताकत और लाभ के स्थानों से दूर रक्खा जा रहा है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यूरोपीय संघ एक राजनैतिक इकाई के रूप में उभर कर सामने आ रहा है और यूरोपीय संघ में अँग्रेज़ी के साथ-साथ फ्रांसीसी और जर्मन भाषाएँ भी यूरोपीय संघ की काम-काज की भाषाएँ बनी हुई हैं। वैसे यूरोपीय संघ के किसी भी देश में किसी भी बोली जाने वाली भाषा को संघ की काम-काज की भाषा के रूप में स्वीकृति है। जर्मनी, फ्रांस और स्पेन यूरोपीय संघ की अगुवाई करने वाले देश हैं और इनमें एक की भी भाषा अँग्रेज़ी नहीं है। दक्षिण एशिया और एक-दो और देशों को छोड़ कर विश्व के सभी देशों में स्कूली शिक्षा मातृभाषाओं में दी जाती है। जिस भी गैर-अँग्रेज़ी भाषी देश ने शिक्षा को अँग्रेज़ी पर आधारित किया है, उसने न तो कोई विशेष सामाजिक या आर्थिक विकास किया है और ग़रीबी और सामाजिक बिखराव की गंभीर समस्याओं से उभर भी नहीं सका। यहाँ उल्लेखनीय है कि भारत गरीबी को कम करने और स्कूली शिक्षा की दर बढाने में बांग्लादेश से भी पीछे है। यह सही है कि विश्व स्तर पर आदान-प्रादान के लिए अँग्रेज़ी भाषा का प्रयोग किसी भी दूसरी भाषा से अधिक हो रहा है। यह कोई बुरी बात भी नहीं है कि विश्व के लोग किसी न किसी भाषा में आपस में बात कर सकें, बल्कि यह आवश्यक है। पर विश्व स्तर पर आदान-प्रादान की भाषा होना एक अलग बात है और अँग्रेज़ी द्वारा मातृभाषाओं का स्थान हथियाना दूसरी बात। इस लिए बहुत ज़रूरी है कि मातृभाषाओं के क्षेत्रों में मातृभाषाओं को उचित स्थान हासिल हो। ऐसा सबसे बड़ा क्षेत्र शिक्षा का होता है। मातृभाषाओं और स्थानीय संस्कृतियों के विकास के लिए बिना आज़ादी ही अधूरी नहीं है बल्कि किसी भी क्षेत्र में अच्छा विकास भी संभव नहीं है।

यह देखने के बाद कि मातृभाषाएँ हर तरह के विकास के लिए आवश्यक हैं, अब यह देखना ज़रूरी है कि क्या हमारी भाषाओं में इतना सामर्थ्य है कि वे हर तरह के कार्य के लिए प्रयोग में लाई जा सकें।

३. विज्ञान की शिक्षा और भारतीय भाषाएँ बनाम अँग्रेज़ी

अँग्रेज़ी को शिक्षा का माध्यम बनाने के पक्ष में एक तर्क यह दिया जाता है कि शब्दावली की कमी होने से विज्ञान की शिक्षा के लिए भारतीय भाषाएँ सक्षम नहीं हैं, और न ही भारतीय भाषाओं में विज्ञान आदि कि शिक्षा के लिए सामग्री है। आगे इन दोनों प्रश्नों पर विचार किया गया है।

क्षमता का प्रश्न:

जहाँ तक क्षमता का सवाल है, भाषा विशेषज्ञ बार-बार यह स्थापित कर चुके हैं कि प्रत्येक भाषा में उच्च से उच्च भाषिक कार्य के लिए क्षमता होती है। ज़रूरत बस उसके प्रयोग की होती है। नए संकल्प और नई वस्तुओं के आने से नए शब्दों की ज़रूरत होती है। लेकिन किसी भी भाषा की नई शब्दावली उसकी मूल शब्दावली पर आधारित होती है, और सभी भाषाओं की मूल (आधारभूत) शब्दावली में कोई अंतर नहीं है। किसी भी भाषा की शब्दावली का विकास बड़े साधारण प्रयत्नों से संभव है। विश्व भर की भाषाओं की शब्दावली का विकास उस भाषा को बोलने वालों ने बिना किसी शिक्षा के किया है। यह कार्य लोग बिना किसी शिक्षा संस्थान के भी किए जा रहे हैं। विश्व की किसी भी भाषा की आधारभूत शब्दावली किसी शिक्षित ने नहीं बनाई। यह तथाकथित ‘अशिक्षित’ मनुष्यों ने सहज में ही तैयार की है। शिक्षित वर्ग ने इन मूल शब्दों से आगे शब्द बनाए हैं। अँग्रेज़ी के विद्वानों का भी अँग्रेज़ी की अमीरी में बस इतना ही योगदान है। गाँव की किसी चौपाल में सिर्फ एक दिन गुज़ारने से पता चल जाता है कि लोग कैसे-कैसे नए शब्द बनाए जा रहे हैं। किसी भाषा की क्षमता पर शंका करने वालों को यह टिप्पणी बड़ी हल्की लग सकती है पर दिमाग का थोड़ा सा ही प्रयोग करने से इसकी गहराई का एहसास हो जाएगा। शब्दावली की अमीरी के लिए अँग्रेज़ी के सर पर जो ताज है वह अँग्रेज़ी भाषिकों द्वारा डकैती का ही नतीजा है। अँग्रेज़ी में ज्ञान-विज्ञान की लगभग सारी शब्दावली लातीनी व यूनानी मूल की है। इसमें कुछ फ्रांसीसी भी शामिल है। यह कोई ऐसी चीज़ भी नहीं है जो दूसरी भाषाओं में न मिलती हो। मिसाल के लिए कुछ अधिक परेशान करने वाले क्षेत्र चिकित्सा की कुछ शब्दावली को लेकर देखा जा सकता है। मैंने चिकित्सा की एक किताब बंद आँखों से खोली तो मेरे सामने ये शब्द आए - lipaemia, liparia, lipase, lipamia, lipid, lipide, lipodystrophia, lipodystrophy, lipoid, lipolysis, lipoma, lipometosis। इन शब्दों को पढ़कर एक बार तो बेहोशी सी होने लगती है कि भारतीय भाषाओं में चिकित्सा (सभ्य व्यक्ति इसे मेडिकल साईंस कहते हैं) तो शब्द कहाँ से मिलेंगे। प्रिय भारतीयो, मत घबराओ! इन शब्दों के लिए हिंदी शब्द आप की सेवा में क्रमवार अभी हाज़िर हैं – वसा-रक्तता (रक्त में चर्बी बढ़ना), वसा-बाहुल्य (मोटे हो जाना), वसा-रस (चर्बी पचाने वाला रस), वसा-रक्तता (रक्त में चर्बी होना), वसा-रूपी (चर्बी जैसा), वसा-रूपी, वसा-पाचन-दोष (चर्बी पचाने में मुश्किल), वसा-पाचन-दोष, वसा-रूपी, वसा-क्षय (चर्बी का रासायनिक विघटन), वसा-गाँठ (चर्बी की रसौली), और वसा-ग्रंथन (चर्बी की गाँठ बनना)। इन हिंदी शब्दों में दो दोष ज़रूर हैं – एक तो यह आसानी से समझ आ जाते हैं और दूसरे इन्हें सुनकर कानों में वो नवाबी घंटीयाँ नहीं बजतीं जो lipaemia, liparia से बजती हैं। सो मेरे प्यारे ‘श्रेष्ठ’ भारतीयो! दास की विनती है कि अँग्रेज़ी पटरानी को जैसी भी आलीशान लाल-बत्ती गाड़ियों में आप घुमाना चाहते हैं घुमाइए, या जैसे भी मखमली बिस्तरों में आप सुलाना चाहते हैं सुलाइए, पर भारतीय भाषा माताओं को क्षमता गाली मत दीजिए। (कहते हैं न, नाच न जाने आँगन टेढ़ा, और आदतों की तरह गुलामी की भी आदत पड़ जाती है)।

सामग्री का प्रशन:

अँग्रेज़ी उन्माद के हक़ में एक तर्क यह दिया जाता है कि अँग्रेज़ी माध्यम में इस लिए शिक्षण होता है क्योंकि भारतीय भाषाओं में विज्ञान और तकनालोजी आदि के लिए पठन सामग्री नहीं है। दसवीं के स्तर तक की शिक्षा के लिए तो यह तर्क बिलकुल गलत है। १९८० तक कुछेक स्कूलों को छोड़कर भारत भर में पढ़ाई अँग्रेज़ी भाषा में नहीं होती थी। सरकारी स्कूलों में आज भी इस स्तर की पढ़ाई मातृभाषाओं में ही हो रही है। सो, इस स्तर की सामग्री की कमी तो नहीं कही जा सकती। अगर कहीं भारतीय भाषा माध्यम वाले स्कूलों में भी अँग्रेज़ी भाषा माध्यम वाले स्कूलों जितनी शिक्षा दी जाए और सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों को भी दूसरे स्कूलों जैसे स्कूल और घरेलू हालात प्राप्त हों तो फिर पता चले कि विज्ञान (और अँग्रेज़ी भी) मातृभाषा माध्यम में पढ़ने से ज़्यादा आता है या अँग्रेज़ी भाषा माध्यम में पढने से। इस बात पर भी गौर करने की ज़रूरत है कि मानव विज्ञानों और समाज विज्ञानों की प्रत्येक स्तर की शिक्षा कई भारतीय भाषाओं में हो रही है। क्या इन विषयों के संकल्प शुद्ध विज्ञानों से आसान हैं? बिलकुल नहीं। बल्कि सच्चाई इसके विपरीत है। मानव विज्ञानों और समाज विज्ञानों के संकल्प अधिक अमूर्त होते हैं। सो, जिस भाषा के पास मानव और समाज विज्ञानों के शिक्षण की क्षमता है उनमें दूसरे विज्ञानों की शिक्षा के लिए तो कोई मुश्किल होनी ही नहीं चाहिए। होती भी नहीं है। किसी भाषा के विकास की अवस्था का अनुमान तो इस तथ्य से होना चाहिए कि क्या उस भाषा में अमूर्त संकल्पों को प्रकट करने के लिए सामग्री है या नहीं।

अगर शुद्ध विज्ञानों और तक्नालोजी जैसे विषयों के लिए भारतीय भाषाओं में सामग्री की कुछ कमी है तो यह सरकारों और इन विषयों के विशेषज्ञों की अपनी-अपनी मातृभाषा के प्रति बेरुखी के कारण है, न कि भारतीय भाषाओं में क्षमता की कमी के कारण। यह सामग्री पैदा करनी कोई मुश्किल काम भी नहीं है। भारतीय सरकारों के बस एक ऐलान की ज़रूरत है कि दो-तीन वर्षों के पश्चात प्रत्येक स्तर की शिक्षा भारतीय भाषाओं में होगी। उच्च शिक्षा के सभी विषयों की सामग्री प्रकाशक बंधु समय से पहले ही तैयार करवा देंगे। भिन्न-भिन्न प्रदेशों के भाषा विभाग और विश्वविद्यालय बहुत से विषयों की तकनीकी शब्दावली पहले से ही तैयार करवा चुके हैं। सो सामग्री की समस्या इतनी बड़ी नहीं है जितनी नीति और नीयत की है। यह सामग्री भारतीयों के लिए अमेरिका से नहीं आने वाली। यह भारतीयों ने खुद तैयार करनी है और इसके लिए सबसे अधिक ज़िम्मेदारी सरकारों और भारतीय विश्वविद्यालयों की है। भाषा विभाग पंजाब और पंजाबी विश्वविद्यालय ने यह काम बड़े स्तर पर किया है। सो, भारत के दूसरे भाषा विभागों और विश्वविद्यालयों को भी इनसे सीख लेनी चाहिए।
भारतीय भाषाओं को शिक्षा और प्रशासन आदि का आधार बनाने के पक्ष में ऊपर दी जा चुकी दलीलें काफी होनी चाहिएँ। पर यह हक़ीक़त है कि अँग्रेज़ी भाषा की अच्छी जानकारी एक बड़ा लाभ है। तो यह जानना भी ज़रूरी है कि अँग्रेज़ी अच्छी किस तरह सीखी जा सकती है।

४. अच्छी अँग्रेज़ी कैसे आए

मैं इस विचार का बिलकुल कायल नहीं हूँ कि अँग्रेज़ी भाषा का ज्ञान स्वर्गद्वार की कुंजी है। (हाँ, अँग्रेज़ी को मातृभाषाओं का स्थान देना स्वर्गधाम में जल्दी समाधि आवश्य है)। अँग्रेज़ी से जुड़े लाभ भारत की सरकारों की मातृभाषा विनाशी और शिक्षा विनाशी नीतियों के कारण हैं। इन फायदों के लालचवश हमारी शिक्षा और भाषाओं को अँग्रेज़ी भाषा खाए जा रही है। इसके भयानक शैक्षिक, सामाजिक और सांस्कृतिक नतीजे ठीक नज़र वालों को तो नज़र आ रहे हैं और वो दुहाई भी दे रहे हैं। जिनकी आँखों को भाषा-अंधापन-रोग लगा हुआ है उनको भी अब ये निकट भविष्य में नज़र आने वाले हैं।

दुर्भाग्य की बात यह है कि अँग्रेज़ी माध्यम शिक्षा प्रणाली अँग्रेज़ी की अच्छी मुहारत के लिए भी ठीक नहीं है पर फिर भी यह बढ़ रही है। मैं पिछले कोई दस वर्षों से अपने बहुत से पंजाबी लेखों में दूसरी/विदेशी भाषा सीखने के सन्दर्भ में विश्व भर में हुए शोध के नतीजे पंजाबी समूह के सामने ला चुका हूँ। इस लिए ज़्यादा विस्तार में न जाकर विदेशी भाषा सीखने की उचित विधि के बारे में यूनेस्को की २००८ में छपी पुस्तक ‘इम्प्रूवमैंट इन द क्वालिटी आफ मदर टंग-बेस्ड लर्निंग एंड लिट्रेसी’ से निम्न उद्धरण देना ही काफी समझाता हूँ:

"हमारे रास्ते में बड़ी रुकावट भाषा एवं शिक्षा के बारे में कुछ अंधविश्वास हैं और लोगों की आँखें खोलने के लिए इन अंधविश्वासों का भंडा फोड़ना चाहिए। ऐसा ही एक अन्धविश्वास यह है कि द्वितीय (विदेशी - ज.स.) भाषा सीखने का अच्छा तरीका इसका शिक्षा के माध्यम के रूप में प्रयोग है (दरअसल, अन्य भाषा को एक विषय के रूप में पढ़ना ज़्यादा कारगर होता है। दूसरा अंधविश्वास यह है कि द्वितीय (विदेशी - ज.स.) भाषा सीखना जितनी जल्दी शुरू किया जाए उतना बेहतर है (जल्दी शुरू करने से लहजा तो बेहतर हो सकता है पर लाभ की स्थिति में वह सीखने वाला होता है जो पहली भाषा (मातृभाषा – ज.स.) में अच्छी मुहारत हासिल कर चुका हो)। तीसरा अंधविश्वास यह है कि मातृभाषा विदेशी भाषा सीखने के राह में रुकावट है (मातृभाषा में मजबूत नींव से विदेशी भाषा बेहतर सीखी जा सकती है)। स्पष्ट है कि ये अंधविश्वास हैं और हक़ीक़त नहीं। लेकिन फिर भी यह नीतिकारों की इस प्रश्न पर अगुवाई करते हैं कि प्रभुत्वशाली (हमारे प्रसंग में अँग्रेज़ी – ज.स.) भाषा कैसे सीखी जाए।““ (पन्ना – १२)।

उपरोक्त टिपण्णी खुली मंडी और अँग्रेज़ीवाद के बड़े मुद्दई विश्व बैंक द्वारा दी गई आर्थिक मदद से १२ देशों में किए गए अध्ययन के नतीजों में से है। इन १२ देशों में भारत भी शामिल था।
सो, यदि भारत किसी भी क्षेत्र में विकास करना चाहता है तो यह मातृभाषाओं को शिक्षा, प्रशासन और दूसरे सभी क्षेत्रों में मातृभाषाओं को आधार बनाकर ही संभव है। इस लेख में दिए प्रमाण इस बात को स्थापित करने के लिए पर्याप्त होने चाहिएँ। इन सवालों पर और विस्तृत प्रमाण और तथ्यों के लिए मेरी पुस्तिका ‘भाषा के बारे में अंतर्राष्ट्रीय खोज: मातृभाषा खोलती है शिक्षा, ज्ञान और अँग्रेज़ी सीखने के दरवाज़े’ हिंदी, पंजाबी, डोगरी, मैथिलि, उर्दू, तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और अँग्रेज़ी में http://punjabiuniversity.academia.edu/JogaSingh/papers

से पढ़ी जा सकती है। भाषा के मामलों के बारे में अँग्रेज़ी में एक वीडिओ

https://www.youtube.com/watch?v=Xaio_TyWAAY&feature=youtu.be

 से देखा जा सकता है।


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