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| 08.15.2007 |
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निश्चय |
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सुब्रत
बनर्जी अपने चौदह वर्षीय बेटे को साथ लिए सुबह शाम जॉगिंग कर रहे हैं –
खिड़की से यह देखना कितना अच्छा लगता था। कहीं पढ़ा था कि माता-पिता सबसे
मूल्यवान उपहार अपने बच्चों को क्या दे सकते हैं - वह है समय और समय। अपनी
अत्याधिक व्यस्तता के बावजूद उसका पूरा प्रयास होता था कि अपने इकलौते
लाड़ले के साथ समय बिताये। आई.टी. कम्पनी में वाइस प्रेसिडेंट के पद पर थे
सुब्रत बनर्जी। अक्सर उनका विदेशों में आना-जाना लगा रहता था। विदेश से
लौटते ही वह रितम के कंधे पर हाथ रख अपने से सटा लेते और प्यार से उसका
माथा चूमते फिर बंगला में उससे वार्तालाप करते, जिसक उत्तर रितम अमेरिकन
एक्सेन्ट में अंग्रेज़ी में देता। उसके साथ वार्तालाप से सुब्रत खुश होते।
सुब्रत
चाहे सात-आठ घंटे की फ़्लाईट से ही क्यों न आ रहे हों, थकावट उन्हें छू नहीं
पाती। वे बिल्कुल तरोताज़ा और एनर्जी से सराबोर लगते थे। चालीस साल की उम्र
में भी उनमें बीस वर्षीय युवक जैसी चुस्ती-फ़ुर्ती और चमक थी।
तीन साल
पहले जब मैं अमेरिका आया था उनसे मिलकर बहुत अच्छा लगा था। बिना किसी
पूर्वाग्रह के वह हिन्दी में धाराप्रवाह वार्तालाप करते, हँसते-हँसते सोफे
पर बार-बार उछलते और माहौल को जीवन्त बना देते। उनकी हँसी झरने की तरह
ताज़गी देने वाली थी। जिससे
एनर्जी के छींटे बरसते थे जो
साथ के लोगों को भी उत्साहित करते। उनकी पत्नी उनसे लम्बी थी। गोरी और चटक।
उनसे मिल कर लगा कि उन्हें अमेरिका ने काट खाया। वार्तालाप के दौरान वह
भूल-कर भी हिन्दी का प्रयोग नहीं करती थी। केवल अंग्रेज़ी ही उनकी भाषा हो
गई थी और देसी तौर-तरीकों के प्रति उन्होंने दिल में सख़्त नफ़रत पाल ली थी।
अपनी ऊपरी ख़ूबसूरती और ओठों पर चमकीली लिपस्टिक लगाये सलीके से अमरीकी
लिबास पहने वह व्यवहार में असहज व बनावटी लगती थीं। अक्सर दोनों पति-पत्नी
में तकरार हो जाता। ऐसे में सुब्रत अपनी बी.एम.डब्ल्यू. गाड़ी गैराज़ से बाहर
निकालता। अपनी व बेटे रितम की साइकिलें उसमें रखता और लम्बी ड्राइव कर्के
फ़िलिप्स पार्क चला जाता। तीन चार घंटे बाद घर लौटता शायद तब तक बीवी का
उफान ठंडा हो गया होता होगा।
मेरे बेटे
व सुब्रत के फ़्लैट के ठीक आमने-सामने थे। स्लेटी रंग के एक जैसे फ़्लैट।
नीचे पाँच-सात सीढ़ियाँ चढ़कर दरवाज़ा फिर सीढ़ियाँ और पहुँचते ही खुला बड़ा सा
ड्राइंगरूम – जिसमें दो बड़े साइज़ के सोफे थे। ये फ़्लैट अमेरीकी भव्यता और
विशिष्टता को दिखाते से लगते।
उन्होंने
हमें अपने घर पर डिनर पर बुलाया था। अच्छा खाना था और सुरुचिपूर्ण वातावरण
में परोसा गया था। सुब्रत के साथ देश-विदेश की देर तक बातें होती रही और
उन्होंने बताया कि वो जुलाई में बेटे को इटली ले जाना चाहते हैं। छुट्टियाँ
हैं और स्कूल में भी इटली पर विशेष प्रोजेक्ट चल रहा है। मुझे सुनकर अच्छा
लगा। कितना अच्छा एक्सपोज़र होगा बच्चे के लिए। समय और पैसे का कितना अच्छा
उपयोग। एक-डेढ़ घंटा हम लोग बात करते रहे थे। इस बीच सुब्रत की पत्नी
शिवांगी भोजन की व्यवस्था में व्यस्त थी। अच्छी बातों के साथ बढ़िया खाने का
लुत्फ़ लिया और आखिर में स्वीट-डिश ’सूफ़ले’ तो लाजवाब था।
सीढ़ियाँ
उतरे। ओ.के. बाय-बाय हुआ।
“अंकल,
कल आपके पास समय है? शाम को आऊँगा। कुछ काम है।“
“हमारे
पास तो समय ही समय है जब चाहे आओ। बस शाम को छह से सात तक टहलने निकल जाता
हूँ।“
“ठीक
है, कल साढ़े सात बजे आऊँगा शाम को”,
सुब्रत मुस्कुराते हुए बोला।
मुझे याद है – अगले दिन यानि ३० जून, २००४ की शाम ठीक साढ़े सात बजे सुब्रत
अपने बेटे के साथ हमारे घर आये। हाय अंकल के अभिवादन के बाद सोफे पर बैठते
हुए बोले –
“अंकल,
मेरे बेटे को हिन्दी सिखाइए। बंगला तो बोल समझ लेता है। भारतीय है तो
हिन्दी तो आनी चाहिए न। सिखाइए मेहरबानी होगी।“
बात इतनी सी थी बस! पर इस बात ने ही दोनों परिवारों के बीच दरार पैदा कर दी
थी।
रितम दोनों हथेलियों पर ठोड़ी थामें, कोहनी जाघों पर टिकाये, बेमन असहज सा
जैसे जबर्दस्ती वहाँ पर बैठा था। मैंने उसकी ओर मुँह करके पूछा –“आर
यू इन्टरेस्टेड इन लर्निंग हिन्दी?”
“नो,
आय एम नॉट”’
उसने अमेरिकन अन्दाज़ में कन्धे उचका कर कहा।
मैंने सुब्रत की ओर देखा, वह तटस्थ और दृढ़ था।
“इसे
हिन्दी सीखनी होगी अंकल। मैं इसे समझाऊँगा। कल से यह आपके पास आयेगा।“
थोड़ी देर रुक कर वो लोग चले गए।
अगला दिन। शाम के सात बजे हैं। खिड़की से मैंने देखा सुब्रत बेटे के साथ
हँसते-हँसते घर लौट रहे हैं। उन्होंने शॉर्ट्स और स्पोर्ट्स शू पहने हुए
हैं। अब नहाने के बाद साढ़े सात बजे रितम हमारे घर आयेगा। उसे हिन्दी पढ़नी
है, सोचकर मैं तैयार हुआ अपने कमरे से ड्राइंगरूम में आ गया। मैंने जेब में
रखे पैन को टटोला वह सही सलामत था। मैं उसे हिन्दी पढ़ाने के लिए पूर्णतः
मानसिक रूप से तैयार हो चुका था और मन ही मन सोच रहा था कि कैसे रुचिकर ढंग
से उसे पढ़ाऊँगा। मैं खुश था कि परदेस में कुछ सार्थक करने का संतोष तो
मिलेगा। वरना दिनचर्या तो सूखे संतरे की फाँकों की तरह बेरस सी हो गई थी।
दो माह हो गये थे शिकागो आए। नेपरविल में रह रहे थ। बीच में तिकोना अमेरिकन
लॉन। वहाँ लाल चिकने पत्तों वाला अमेरिकियों की तरह मोटा ऊँचा घना पेड़।
शिकागो को ’विन्डी सिटी’ भी कहा जाता है। यहाँ हवायें चलती तो बस दिन रात
चलती ही रहती हैं। तेज ठंडी तूफ़ानी हवाएँ। ऐसे में इस पेड़ को देखन सुकून
देता है। लगता जैसे वह दिन रात मस्ती में इधर-उधर झूमता नृत्य करता कभी
नहीं थकता। कभी नहीं सोता। लोग खिड़कियाँ, दरवाज़े बन्द कर घरों, होटलों और
रैस्टोरेन्ट में खुशियों की साँस लेते। मैंने घड़ी देखी- सात पच्चीस। पाँच
मिनट रह गये रितम के आने में। मैंने खिड़की से बाहर झाँका – हवा तेज़ी से
नहीं चल रही थी। दो जुलाई थी तो धूप में गरमी थी। यहाँ पर दिन शाम के
नौ-साढ़े नौ बजे तक छिपत है।
ठीक
साढ़े सात बजे कॉल बेल बजी। मैं सावधान की मुद्रा में बैठ गया। मेरी
पुत्रवधू ने दरवाज़ा खोला।
ये
क्या! रितम नहीं आया। वहाँ पर उसकी माँ कूल्हे पर हाथ रखे खड़ी थी। उसकी
मुद्रा आधुनिक लिबास जीन्स, टॉप में बिल्कुल फ़िट नहीं बैठ रही थी। अमेरिकी
लिबास में खास देसी मुद्रा।
“प्लीज़
कम इन”
“नो.......”,
मिसेज़ शिवांगी बनर्जी चीखी। फिर क्रोध भरी अंग्रेज़ी में आक्रमक तरीके से
बोलती रही। जिसका भाव कुछ इस प्रकार था। आप हमारे घर को क्यों बर्बाद करने
में लगे हैं। मेरे पति को क्यों भड़का रहे हैं मेरे ख़िलाफ़। आप ऐसा क्यों कर
रहे हैं। शर्म आनी चाहिए आप को। आपको आखिर मिल क्या जायेगा ऐसा करके।
हमने तो ऐसा कुछ नहीं किया, भौंचक्की निधी ने शिवांगी से कहा। उबलती हुई
शिवांगी बोली,
“
मेरे हस्बैंड ने बताया कि आप लोग रितम को हिन्दी सिखाना चाहते हैं। वह
यू.एस. में पढ़ रहा है। वह हिन्दी सीखकर क्यों समय बर्बाद कर। आप लोग क्यों
हमारे पीछे पड़े हैं?”
माजरा आखिर क्या है? अब समझ में आया निधी के।
आवाज़ को ऊँची कर वह बोली –
“यह
आप पति-पत्नी का मामला है।
हमें इसमें मत घसीटिये – प्लीज़। सुब्रत खुद ही रितम को लेकर हमारे घर आये
थे। उसे ससुर जी से हिन्दी पढ़वाना चाहते थे। हम तो आपके घर नहीं गये थे कि
उसे हमारे घर पढ़ने के लिए भेजो। बेकार में हमारे पीछे क्यों पड़ती हो।“
“यू
पीपल आर वैरी बैड। फ़िजूल में
हमारी फैमली में इन्टरफ़ियर करते हैं। आगे से ऐसा किया तो ठीक नहीं होगा,
कहे देती हूँ। किसी के परिवार में दरार डालना ठीक नहीं।“
पैर पटकती हुई शिवांगी अपने घर लौट गई।
इस
बात से हमारे घर में बेबात तनाव हो गया। मैं चुपचाप ड्राइंगरूम से उठकर
सिटिंग रूम में आ गया। जहाँ पर खिड़की से सुब्रत के घर की सीढ़ियाँ और गैराज
दिखाई देता था।
करीब आधे घंटे बाद सुब्रत व रितम एक दूसरे का हाथ पकड़े हँसते-हँसाते घर की
सीढ़ियाँ चढ़ रहे थे। वे दोनों टेनिस खेलकर आ रहे थे। अब दोनों जाकर
नहायेंगे। थोड़ी देर बाद उस घर से प्लेटें और बर्तन फेंकने चीखने चिल्लाने
की आवाज़ आने लगी। डिनर टाइम में यह एपेटाइज़र मैंने सोचा। सुब्रत घर से नीचे
गैराज में आया ाड़ी निकाली और तनाव से बचने के लिए पब में चला गया।
दो
दिन बाद सुब्रत की फ़्लाइट थी फ्रांस के लिए। वह एक हफ़्ते के लिए फ्रांस चला
गया। पर लौटा पन्द्रह दिन बाद। इधर श्रीमती शिवांगी बनर्जी की हालत खराब।
दरअसल सुब्रत फ्रांस से सीधे भारत बंगलौर में अपने मेन ऑफ़िस चले गये थे।
उनकी नियुक्ति बंगलौर स्थित नामी आई.टी. कम्पनी में हुई थी और वे कम्पनी की
तरफ से अमेरिका में कार्यरत थे। भारत जाने का प्रोग्राम उन्होंने जानबूझ कर
बनाया था। वे वहाँ के स्कूलों के बारे में जानकारी लेना चाह रहे थे। रितम
अमेरिका में काफी अच्छा कर रहा था। छठी कक्षा में वह प्रथम तीन में आ रहा
था। सुब्रत उसके व्यक्तित्व पर छाते जा रहे अमेरीकी संस्कारों को अच्छा
नहीं मानते थे, पर उनकी पत्नी रितम के अमेरीकी होते जा रहे व्यक्तित्व को
गर्व और संतोष से देखती थी। इसका यह मतलब कतई नहीं है कि सुब्रत संकीर्ण
विचारों के थे।
सुब्रत के विदेश जाने के बाद से घर के क्रम में कोई खास फ़र्क नहीं पड़ा था।
सुबह आठ बजे स्कूल बस आती रितम उसमें बैठ कर और बच्चों के साथ स्कूल चला
जाता। शाम को जॉगिंग के लिए या टेनिस खेलने जाता। सप्ताहान्त पर रितम; माँ
के साथ कार में बैठ कर शॉपिंग मॉल चला जात था या फिर डाउन टाउन घूमने।
मिशिगन लेक के तट पर सैर करते और खाना किसी इटालियन रेस्टोरेन्ट में खाते।
जहाँ शिवांगी अपनी मनपसन्द रेड वाइन का गिलास लेती। सुब्रत के फ़ोन रोज़ ही
आते और वह उनकी पूरी जानकारी लेता रहता। वह कहता कि वो लोग कभी अपने बंगाली
परिवारों में भी चले जाया करें। शिकागो में दो बंगाली परिवारों में उनकी
घनिष्टता थी और एक दूसरे के यहाँ आना जाना भी लगा रहता था। नेपरविल में भी
एक अपार्टमेण्ट उनके सामने हमारा था और दूसरा बाँई ओर से पाँचवा सलीम मियाँ
का था जो पाकिस्तानी थे। उनके यहाँ भी शिवांगी का सलीम की पत्नी सिम्मी के
पास आना जाना था। अमेरिका में हिन्दुस्तानी और पाकिस्तानी गले मिल्कर रहते
हैं। एक बोली, एक पहनावा और एक जैसा खाना। बाकि उस क्षेत्र में सारे
अपार्टमेण्टों में गोरे रहते थे। एक दो अपार्टमेण्ट में अफ्रीकी अमेरिकी
रहते थे जिनके कई काले बच्चे शाम को साइकिलों पर सवार हो उस इलाके में
चक्कर लगाया करते थे।
पन्द्रह दिन बाद सुब्रत फ्रांस से भारत होता हुआ शिकागो पहुँचा। इस बीच
शिवांगी या रितम से कार से आते जाते हाय-हैलो हुआ। बस इसके आगे कुछ नहीं।
यहाँ अमेरिका में रहते हुए हम लोग आदमी को देखने को तरस जाते। सड़क पर छोटी
बड़ी तरह तरह की ऊँची नीची तेज रफ़्तार से फिसलती कारों की कभी न रुकने वाली
कतार यहाँ ख़्तम नहीं होती। हाँ विशालकाय शॉपिंग मॉल में ट्राली में सामान
भरते हुए पुरुष और महिलाएँ सदा देखे जा सकते हैं। युव भारतीय लड़के लड़कियाँ
जो यहाँ पर अमेरिकी कम्पनी में कार्यरत हैं और अच्छा पैसा कमा रहे हैं
प्रातः आठ बजे ऑफ़िस चले जाते हैं और शाम को सात आठ बजे लौटते हैं। वे तो
व्यस्त रहते हैं पर हम जैसे लोग जो अपने बच्चों के पास रहने आये हैं – यहाँ
और अकेले हो जाते हैं। सप्ताहांत का इन्तज़ार रहता है जब वो लोग हमें घुमाने
ले जायेंगे। ऐसे में अमेरिका में पब्लिक ट्राँसपोर्ट की कमी बहुत अखरती है।
यदि आप कार नहीं चला सकते तो आपकी आज़ादी अपंग अधूरी है। यह कैसी
स्वतन्त्रता?
सुब्रत के शिकागो वापिस लौटने के अगले दिन हम लोग शाम को फिलिप्स पार्क सैर
करने के लिए घर से निकले और नीचे गैराज के बाहर खड़े थे। देखा सामने सुब्रत
भी अपनी गाड़ी निकाल रहे थे। शिवांगी व रितम भी तैयार खड़े थे। शिवांगी ने
हमें देख कर हाय कहा और हमारी तरफ़ बढ़ी।
“कैसे
हैं अंकल आंटी आप लोग?”
“अच्छे
हैं।“
“कैसा
लग रहा है अमेरिका में?”
’अच्छा है, बच्चों के साथ हैं तो अच्छा ही है।“
उसके चेहरे पर मुस्कान और आत्मीयता का मुखौटा था। जिससे भनक सी लगती थी कि
ज़रूर इसका मेरे बेटे या पुत्रवधु से कोई काम आ पड़ा है।
हुआ
भी कुछ ऐसा ही। सुब्रत ने गाड़ी निकाली, गैराज बन्द होने का बटन दबाया।
हमारी ओर कार मोड़ी, शीशा नीचे किया। पहले जैसी जानी पहचानी प्रफुल्लता से
हमें अभिवादन किया और पन्द्रह मिनट मेरे बेटे दिव्यम् से बातचीत की। इस
बीच शिवांगी और हमारी पुत्रवधु आपस में हँस-हँस कर बातें करते रहे। रितम
गाड़ी में पिछली सीट पर बैठा था। मुझे अच्छा लगा दरार भर गई। दरअसल दरार थी
ही नहीं। यहाँ पचास घरों के बीच रहने वाले दो हिन्दुस्तानी आखिर कब तक अलग
रहते। स्वदेश का खिंचाव उन्हें फिर नज़दीक ले आया।
अगले दिन शिवांगी का फ़ोन आया। हम सबके लिए लंच वह बना रही है। फिशकरी और
चावल। दिन के बारह बजे वह स्वयं खाना लेकर आई और देर तक निधी से बातें करती
रही। बात रितम के इर्द-गिर्द घूम रही थी और बार-बार इण्डिया और अमेरिका का
नाम आ रहा था। शिवांगी कह रही थी कि रितम बंगाली मित्रों के घर नहीं जाना
चाहता। न जाने इसे क्या हो गया है। सुब्रत को जब से इस बात का पता चला हि
वह बहुत परेशान हैं। हमार और सुब्रत के परिवारों के बीच आना जाना प्रेम
सौहार्द फिर से शुरू हो गया था। फ़र्क इतना था कि सुब्रत से हिन्दी में बात
होती और शिवांगी और रितम से ठेठ अमेरिकी इंगलिश में। कोई बात नहीं। बात है,
आपस में कम्युनिकेशन की। पर अपनी भाषा में बात करने की सुगन्ध सकून देती ही
है।
अगले हफ़्ते मैंने खिड़की से देखा। गैराज के बाहर पेड़ के नीचे दिव्यम् व
सुब्रत घंटों बातें करते रहे। दिव्यम् से पता चला कि सुब्रत रितम को लेकर
बहुत परेशान थे। वह कतई नहीं चाहते कि रितम ए.बी.सी.डी. बने। यानि
“अमेरिकन
बौर्न कनफ़्यूज़ड देसी”।
उनको बहुत बुरा लगा कि रितम देसी परिवारों में मिलना-जुलना पसन्द नहीं
करता। वह उन्हें हिकारत की निगाह से देखने लगा है और अमेरिकी बच्चों
व लोगों से ही मेल-जोल रखता है। उनकी अमेरिकि शिक्षा प्रणाली व भारतीय
शिक्षा प्रणाली दोनों के गुण दोष पर विस्तार से बात हुई। रितम यहाँ पर पाँच
साल से पढ़ रहा था और भारत नहीं जाना चाहता था। सुब्रत जानता था कि यह बच्चे
के लिये अत्यन्त महत्वपूर्ण समय है। सातवीं कक्षा से ही बच्चे की दिशा बनती
है। शिक्षा ज्ञान और विकास अच्छा है। यहाँ पर बच्चे का स्वतंत्र व्यक्तित्व
बनता है। पढ़ाई पर इतना जोर नहीं है जितना भारत में। सब कुछ चल सकता था। पर,
रितम का भारतीय मित्रों से दूरी रखना और अमेरिकी जीवन पद्धति की ओर खिंचाव
सुब्रत के गले नहीं उतर रहा था। माँ बेटे एक थे। वे भारत नहीं जाना चाहते
थे। बच्चे के व्यक्तित्व का सही विकास होना चाहिए। वह भारतीय है, भारतीय ही
रहना चाहिए, चाहे कहीं पढ़े। यह सुब्रत का मानना था। इस बात को लेकर घर में
काफी तनाव रहा। पर, तनाव को अपने हल्के-फुल्के अन्दाज़ में हटाना सुब्रत खूब
जानता था। शाम को वे पत्नी व रितम के साथ किसी भारतीय परिवार में जाते।
जहाँ पर रितम मुँह बना कर अलग-थलग सा बैठा रहता। उसे समझाते और मिशिगन लेक
में तरह-तरह के खेलों में उलझाते। खुद खुश रहते और उसे भी खुश कर देते।
एक
दिन की बात है कि रितम ने पापा को ऐसी बात कह दी कि पापा व्यथित और व्याकुल
हो गये।
सुब्रत के मित्र पाराशर की बेटी का जन्मदिन था। जहाँ पर डिनर का आयोजन भी
था। रितम ने वहाँ जाने के लिए इन्कार कर दिया। बोला,
“आई
डोन्ट लाइक टू मिक्स विद इण्डियन्स। आई विल नॉट गो देयर।“
बच्चे के ये शब्द बाप के दिल में हथौड़े की तरह पड़े। सुब्रत बहुत समझदार
व्यक्ति हैं। वे गुस्सा नहीं हुए। उन्होंने बड़े प्यार से समझाया और चौदह
वर्षीय किशोर को आखिर उनकी बात माननी पड़ी। पार्टी में रितम की किसी से
ज्यादा बातचीत नहीं हुई। डिनर के बाद तीनों घर लौट आये।
रात
भर सुब्रत के दिमाग में बेटे के ये शब्द –
“आई
डोन्ट लाइक इण्डियन्स”
गूँजते रहे। उन्हें रात भर नींद नहीं आई। सुबह जब उठे तो वे सोच रहे थे कि
रितम एक कच्चा किशोर है। उसे पता नहीं वह किधर जा रहा है। उन्हें उसका
भविष्य बनाना है। भारतीय समाज और सभ्यता से भी वाकिफ़ होना ज़रूरी है। वह भटक
रहा है – उसे सही दिशा देना बाप का फ़र्ज़ है।
सुब्रत को निर्णय लेना था – वे क्या करें? अमेरिका में ही रहें जहाँ पर
रितम और शिवांगी रहना चाहते हैं या फिर भारत लौट जाएँ। अमेरिका में रहने के
बहुत फायदे थे, विशेष रूप से उनके कैरियर, वेतन, सुख और समृद्धि को लेकर।
बहुत सोच-समझकर उन्होंने कठोर निर्णय लिया कि वे बंगलौर में ही कम्पनी के
ऑफ़िस में ट्रान्सफ़र करवा लेंगे और वहीं पर रितम का एडमिशन करवा देंगे।
उन्होंने इस दिशा में गम्भीरता से कदम बढ़ाया और उन्हें सफलता मिली।
उन्होंने निर्णय ले लिया कि वे भारत वापस लौट रहे हैं। हल्के-फुल्के,
हँसते, फुदकते सुब्रत के बुलन्दे इरादे के सामने उनकी पत्नी व पुत्र की एक
न चली। अब उनका परिवर बंगलौर लौट गया है। रितम वहाँ के एक प्रसिद्ध स्कूल
में पढ़ रहा है। |
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