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तुम्हारे आने का
इंतज़ार था
और तुम
ठीक समय पर
आ गये थे।
तुम्हारे धरती पर
उतरते ही
आसमान
आनन्द की उछाल से
भर गया।
उल्लसित लहरों के
छींटे
हवा में नाचने लगे।
तुम्हारे प्रथम रोदन
और हाथ-पैरों की
हलचल ने
सब बदल दिया।
घर, आँगन
बाहर – दूर तलक
सब हरा हो गया।
सृजन की खुशी छूने
तुमसे मिलने
उड़कर मैं
हवाओं के देश पहुँचा।
वहाँ सीढ़ी पर
पाँव रखते ही
घर-आँगन
किलकारियों से
जगमगा उठा।
उस जाग्रत
जगमगाते घर में
देखते ही –
हम एक दूसरे को
पहचान गए।
मिलन की घड़ी में
बहुत देर तक
बहुत पास से – एक दूसरे को
महसूस करते रहे।
लगा
यह प्रगाढ़ता
पीढ़ियों से
चली आ रही है।
तुम्हारी
प्रकाश पुंज
गोल मोल
मासूम आँखें
रह रह कर
बात कर रही थीं।
हाथ पैर के
उन्मुक्त, बहाव की भंगिमा
अमोल, अबोध
ईश्वरीय मुस्कान की
ताल और
हुँकारों के बोल पर
अपूर्व नृत्य करते हुए
सबको सम्मोहित किये थी
लय – ताल में
साँस लेती
तुम्हारी खुशबू
अपनी स्वर लहरी से
घर-आँगन को
चिरन्तन अर्घ दे
झुमा गई।
फूल, घास
पेड़ और नदियों
के दिलों में
निरन्तर नाचती रही !
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