अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
02.09.2017


देर कर दी...

हाँ! देर कर दी मैंने
हर उस काम में जो मैं कर सकती थी
दूसरों की नज़रों में
ख़ुद को ढालते-ढालते
सबकी नज़रों से छुपाकर
अपने सारे हुनर
दराज में बटोर कर रख दी
दुनियादारी से फ़ुर्सत पाकर
करूँगी कभी मन का।

अंतत: अब
मैं बेफिज़ूल साबित हो गई
रिश्ते सहेजते-सहेजते
ख़ुद बिखर गई
साबुत कुछ नहीं बचा
न रिश्ते न मैं न मेरे हुनर।

मेरे सारे हुनर
चीख़ते-चीख़ते दम तोड़ गए
बस एक दो जो बचे हैं
उखड़ी-उखड़ी साँसें ले रहे हैं
मर गए सारे हुनर के क़त्ल का
इल्ज़ाम मुझको दे रहे है
मेरे क़ातिल बन जाने का सबब
वे मुझसे पूछ रहे हैं।

हाँ! बहुत देर कर दी मैंने
दुनिया को समझने में
ख़ुद को बटोरने में
अर्धजीवित हुनर को
बचाने में।

हाँ! देर तो हो गई
पर सुबह का सूरज
अपनी आँच मुझे दे रहा है
अँधेरों की भीड़ से
खींच कर मुझे
उजाला दे रहा है।

हाँ! देर तो हो गई मुझसे
पर अब न होगी
नहीं बचा वक़्त
मेरे पास अब
जो भी बच सका है
रिश्ते या हुनर
सबको एक नई उम्र दूँगी
हाँ! अब देर न करूँगी।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें