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ISSN 2292-9754

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12.24.2015


नदी

नदी
हमारे सपनों में गुनगुनाती है अंतहीन लोकगीत
गीतों में गमकते हैं
कछारी माटी वाले हमारे सपने
पहुँचाती है पुरखों तक
अंजुरी भर कुशलक्षेम
दोने भर रोशनी

हमारी बहू-बेटियों की मनौतियों की
निर्मल चिट्ठी के लिए
जनम-जनम बनती है डाकिया
पूछती फिरती है सही-सही पता
बाधाओं के पहाड़ लाँघकर
नदी अन्न के भीतर पैठकर पहुँचती है
हमारे जीवन में
अथाह ऊर्जा के साथ

सभी के काम पर गुम हो जाने के बाद भी
बच्चों के आसपास रहती है कोई
तो
वह नदी ही है माँ की तरह
हमारे बच्चे अनाथ हुए बिना
रचते रहेंगे दोनों तटों पर गाँव
गाँव की दुनिया में मेले
जब तक उमड़ती रहेगी नदी
उनमें सतत


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