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ISSN 2292-9754

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12.24.2015


ख़ौफ़

जाने-पहचाने पेड़ से
फल के बजाय टपक पड़ता है बम
काक-भगोड़ा राक्षस से कहीं ज़्यादा भयानक
अपना ही साया पीछा करता दीखता
किसी पागल हत्यारे की तरह
नर्म सपनों को रौंद-रौंद जाती हैं कुशंकाएँ
वालहैंगिंग की बिल्ली तब्दील होने लगती है बाघ में
इसके बावजूद
दूर-दूर तक नहीं होता कोई शत्रु
वही आदमी मरने लगता है
जब ख़ौफ समा जाता है मन में


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