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04.28.2007
 
जुगनू 
जयप्रकाश मानस

जब सूरज मुँह ढँककर सो जाता है
जब चाँद शर्म से दुबक जाता है
जब अनगिनत सितारे एक-एककर हो जाते हैं ग़ायब
जागते रहते हैं सिर्फ़ जुगनू
सूरज चांद सितारे भले ही न बना जा सके
जुगनू तो बना ही जा सकता है

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