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04.28.2007
 
जामुन का पेड़ 
जयप्रकाश मानस

सपनों की रंग-बिरंगी दृश्यावलियों से विचरते-विचरते जब एकाएक निद्रामुक्त हो उठता हूँ तो पाता हूँ- सूरुजनारायन अँगड़ाई लेने लगे हैं। आँगन से लगे हुए दालान के ऊपरी कोने पर स्थायी डेरा डाल चुकी गौरैया अपनी नन्हीं चोंच से पँख खुजलाने लगी है। माँ घर के मुख्य द्वार पर छेरापानी (गोबर का घोल) देने के पश्चात्‌ बाड़ी से अमरूद सिला चुकी है और अब वह जगन्नाथ स्वामी तक अपनी अभ्यर्थना पहुँचाने के लिए विहँसते चंपा, गेंदा या मधुमालती चुन रही है। माँ गुनगुना रही है, उसका अंतर्मन भी-

अका मन चाल जीबा
चका नयन देखिबा

(उड़िया के भक्त कवि सालवेग की मान्यता है-जगन्नाथ प्रभु से जुड़ने की प्रथम शर्त अंतर्मन का जुड़ाव है। वे आह्वान करते हैं कि हे भटके हुए मन! चलो चलें और गोल आँखों वाले जगन्नाथ स्वामी का दर्शन करें।)

माँ के प्रभाती के मध्य से गद्य उभरता है - ‘लोटे में जल रखा हुआ है।’ मैं आज तक समझ नहीं सका कि माँ के जागे बिना भोर क्यों नहीं होता? माँ सर्वथा जागृतावस्था का नाम है। जागरण माँ का धर्म है, कर्म भी जागरण। कल्पना कीजिए कि माँ नहीं होती तो कैसे जागना सीखता शिशु? दातून चबाते हुए परछी पर जा बैठता हूँ। मुँह सदैव खटकता है और नयन मुझे गतिमान बनाता है। मुँह नयनपथ पर रोड़ा ही तो है। मुँह नहीं होता तो दृष्टि अधिक समर्थ होती और मैं जामुन के संसार में कहीं ज्यादा रस पाता। खटकता तो दातून भी है, किंतु यही दातून ही है जो जामुन के पेड़ से आत्मीयता का संस्कार देती है अन्यथा सूरुजनारायन से पहने इसके बौरों की मादक गंध में झूमते भौरों, फलों को ठुनकते हुए विहंगवृंद और उनके प्रात: गान का आत्मसातीकरण कहाँ हो पाता!

आषाढ़ की झड़ी से माँ खीझी रहती थी। आषाढ़ भी था कि माँ को सतत खिझाया करता। जलधर अभी-अभी बरस कर गए होते, फिर यक-ब-यक आँगन, दालान, गाय-कोठा, समूचा घर धुँधला हो उठता और बिल्कुल माँ की तरह छप्पर भी पथरीले बूँदों से थर्रा उठता। घनघोर बारिश, उन दिनों की विपत्ति की तरह थमने का नाम नहीं लेती। मैं सोचा करता क्या अब इंद्र देव की आँखों में दया नहीं रही? छप्पर में इतना दम कहाँ था, जो जलावन-लकड़ी गीली होने से बच पाती। कमरों में पानी ऐसे टपकता, जैसे शत्रुदल से बाणों की वर्षा। घर के सारे गीना, कटोरियाँ, थालियाँ, भगोने, बाल्टियाँ, यहाँ तक कि कुलदेवी के सम्मुख रखा माटी का कलश भी ढाल की तरह बिछा दिए जाते। माँ फूँक पर फूँक मारती, चूल्हा देव सिपचने का नाम तक नहीं लेते और भूख पछाड़ने में उतर आती। ऐसे ही एक दिन माँ से रहा नहीं गया। उसने न जाने क्या सोचा और ममता का सुरक्षा कवच पहनकर घर से निकल पड़ी। वापस लौटी तो उसके मुखमंडल पर अश्रुकण थे या आँखों की कोरों पर वर्षा की बूंदें, मैं ठीक से तय नहीं कर पाया, पर इतना तय हो गया कि माँ के आँचल में क्षुधा-निवारण के लिए कुछ है अवश्य। कौतूहल का अनावरण तब हुआ, जब थाली पर गाढ़े काले-काले, पके-पके जामुन का पहाड़ खड़ा हो गया। मैं कभी माँ की ओर देखता, कभी जामुन की ओर। जामुन से बढ़कर संकटमोचन ऐसे दिनों में कोई हो सकता है भला! माँ मुझे जामुन से तृप्त होते देख आश्वस्त थी। शायद उसकी मुखमुद्रा में धन्यवाद-ज्ञापन का भाव भी सम्मिलित था, मानो वह अपनी छोटी बहन को याद कर रही हो, जैसे उसे बचपन की किसी सहेली की उदारता का स्मरण हो आया हो। जामुन के फल और पेड़ से मेरी दिलचस्पी अब तो और भी बढ़ गई थी।

जामुन का पेड़ गुरुजी और पालकों की आश्वस्ति का पेड़ है। जामुन का मतलब? पाठशाला और कुनबे का सेतु भी। यह आस्था किसी और पेड़ के नाम कहाँ! गाँव के बीचों-बीच अक्षरधाम के परिसर में काजू के दो-चार पेड़ भी थे, पर शायद ही कोई सहपाठी जामुन के सम्मोहन से मुक्त हुआ हो। समूची पाठशाला कब जामुन के इर्द-गिर्द क्रीड़ा-मंडली में तब्दील हो जाती, पता ही नहीं लगता। कार्तिक की ठिठुरन हो या फाल्गुन की तपन। बड़े गुरुजी सहायक गुरुजी के साथ दरी डालकर वहीं जा बैठते। पौष की कुनकुनी धूप का मजा और उछलते-कूदते, गिरते-संभलते नौनिहालों को निहारने का आनंद साथ-साथ। भाषा पढ़ाते समय मुहावरों के अध्याय में गुरुजी इसी का तो उदाहरण दिया करते- एक पंथ दो काज और किसे कहते हैं? दोनों गुरुजी कभी-कभी बड़े चाव से जामुन का रस लेते और हाँ, वे हमारे, जैसे गुठलियों को कहीं भी नहीं उगल देते। हम बच्चों को ऐसे में शबरी का बेर कविता का अर्थ खुलता हुआ आभासित होने लगता।

घर की भाषा ने ‘जामू’ बोलना सिखाया, पड़ोस में घरघुँदिया, भातकुलिया और गोबर-डंडा खेलते-खेलते जान गया कि यही ‘जाम’ है और किताबों ने थोड़ा पुचकारते, थोड़ा डपटते हुए कहा - ‘जामुन कहो’। भाषाएँ चाहे जामुन को जो कहकर पुकार लें। इसे कोई शिकायत नहीं, कोई रंज नहीं। जामुन भाषायी विलगाव का पक्षधर नहीं, वह तो देश के कोने-कोने में पहुँचकर रचाव की भाषा गढ़ता है। क्या यह अच्छा नहीं हुआ, जो सृष्टिकर्त्ता ने वृक्ष समुदाय को अभिव्यक्ति का उपहार नहीं दिया, अन्यथा वे भी तपन से क्लांत पiथकों से छायादान के प्रतिफल में कागजी मुद्रा माँग बैठते, जैसे हमारे सरपंच, पटवारी, गौंटिया, मीठे अंदाज में ऐंठ लेते हैं। अन्यथा वे भी हरियाली की आड़ में नागरिकों को धौंस दिखाकर कुछ न कुछ हड़प लेते, जैसे थानेदार साहब तफ्‍तीश के नाम पर ग्रामीण गवाहों से जब जी चाहे कर्रा-कुकरा (मुर्गा) माँगा लेते हैं। अन्यथा जीवनवर्धक, फलों का पसरा खोल लेते और कृत्रिम अभाव का तर्क देकर मनमाना वसूल लेते, जैसे शहर-नगर के सेठ हमारे किसानों से बीज-बोनी के समय खाद, औषधि का दुगुना-तिगुना झटक लेते हैं। सरकार होती तो कहाँ-कहाँ देखती? फिर क्या पेड़ भी साठगाँठ नहीं कर लेते। ईश्वर! तुम्हारे विवेक को कोटिश: आभार।

पन्ने तो मैंने भी खूब उलटे-पलटे हैं। तीसमार खाँ समाजवादियों के कर्कश और नॉनस्टाप व्याख्यान भी खूब झेलें हैं, किंतु व्यवहारोन्मुखता की लौ मुझे जामुन की देहरी में ही दीखती है। जामुन मौनी दानी है। जामुन गाँव का दुलरवा है। देवना कँवर हो या भगतू माली या फिर भगवानो पटेल। बादपल्हीन भउजी हो या रमिलो नोनी या फिर माँझला बबा। जामुन के घर पहुँचे नहीं कि टिपुर-टापुर, टिपुर-टापुर। काले मोतियों से भेंटता है वह पहुना प्रेमी। मेरे जामुन पेड़ ने सुदामा की कथा सुन रखी है न। जामुन है तो पेड़ों में सुदामा, पर शायद ही होगा कोई गंवइहा, जामुन देखकर जिसके मुँह में लार न घुलती हो। शायद ही कोई शरिया होगा, जिसके मन में मुंबई-हावड़ा मेल से गुजरते समय कोतरलिया, राबर्टसन और डोंगरगढ़ के रसीले जामुन चखने के बाद रेल के गवाक्ष से झाँक-झाँक कर छत्तीसगढ़ के किसी गाँव में ठहर जाने की अभिलाषा न जागी हो। महानगर में ब्याही बिटिया के लिए जामुन खरीदती माताओं के मुँह से सहसा फूट पड़ती है - ‘अहा, बड़ा मनबोधी फल है भई ऐसे वक्त वे जरूर कहती होंगी - बिटिया नमक-मिर्च की बुकनी के साथ चखेगी, तो गद्‌गद्‌ हो उठेगी।’

भूती- बनी, रोजी-मजूरी से दिन काटने वाले के लिए जामुन मात्र गाँव का फल नहीं, वह शहर का ‘कालाजामुन’ है। पड़ोसी गाँव के वनवासी लकड़हारे जब जलावन लकड़ी घर पहुँचाते, तो माँ यह सुनकर मोल-भाव करना भूल जाती ‘दाई ये ही हा तो कुरिया में बाती बारथे।’ जामुन को आदिम समाज में ऊँचा पीढ़ा मिला हुआ है। तामझाम से परे ऐसे वनकन्याओं से जामुन के माहात्म्य का श्रवण रोमांस जगाता है। मुझे गौर से सुनते कुतूहल से देखते हुए वे मुझे संबोधती - "ईजाम कस मीठ तो फेर जंगल के जाम मन घलोक नइ लागय।" उनकी शुभकामनाओं में मेरे प्रिय जामुन पेड़ की खुशहाली के लिए पवित्र आशीष दिपदिपाता रहता। ऐसी निस्पृह बातों के लिये ही ब्रह्मवाक्य की अवधारणा भाषा-शास्त्रियों ने दी है।

ब्रह्मा की सृष्टि और वेदों की दृष्टि तक जब कभी पहुँचने का उद्यम करता हूँ तो कँटीले प्रश्नों से बिंध जाता हूँ। तुलसी और आँवले पर चक्रधारी लट्टू हो गए, कल्पवृक्ष देवताओं ने हथिया लिया, और तो और, चुभने वाले विषवृक्ष को बाबा भोलेनाथ ने अपने लिए आरक्षित करवा लिया। वितरण यहीं थम जाता तो संतोष हो जाता। तैंतीस कोटि देवों को रिझाने के लिए यज्ञ की समिधा में मंदार, पलाश, खर्दिरा, चिचिड़ा, पीपन, गूलर, शमी, दूब और कुश का सहयोगी का क्या जामुन नहीं बन सकता था? यह जामुन के साथ रंगभेद ही तो है। उपनिषद्‌, पुराण, संहिता, ब्राह्मण की मान्यताओं में जामुन दलित ही तो ठहरा। धन्यवाद लोक-मन को! जहाँ शास्त्र द्वारा विस्मृत सौंदर्य का बहुमान मंतव्य- ध्यातव्य है। शास्त्रों के अनायास या सायास भ्रम के निवारण में लोक चूकता नहीं। दरअसल लोक का धर्म यही है। शास्त्रों को कुतक… से विधर्मी कहने का साहस हो तो हो, लोक को विधर्मी मानना कोई पांडित्यपूर्ण उद्‌घोषणा नहीं। द्वापर की कर्म-प्रधान लीलाओं की साक्षी यमुना की उत्पत्ति जामुन से कही गयी है। किशन-कन्हाई भी श्यामल हैं। नंदबाबा के ग्वालों ने क्या समवर्णी जामुन का स्वाद परखा नहीं होगा, उनका बालमन क्या जामुन की डालियों में झूला न होगा! एक बार उनकी गाय और बछड़े जामुन की शीतल छाँव में विलमे न होंगे! कदम की डार में गोपियों का वसन छुपाने वाले नटखट कैसे जामुन को बिसार सके होंगे! फिर गोप-वृंदावन की वीथियों में जामुन के अनुसमर्थन में इतनी बड़ी भूल!

उत्कलियों का सौंदर्य-बोध, उनकी संस्कृति में उपमा-बहुलता के कारण बरबस मेरा ध्यान खिंचता है। उनकी वाणी में कृतघ्नता के लिये कोई जगह नहीं। सच मानिए, भुवनेश्वर से संबलपुर, कालाहांडी से सुंदरगढ़ का प्रेमी इठलाती, बलखाती, कनखियों से बतियाती, रसभरी प्रेमिका को यदि ‘जामूडाली’ न कहे, तो उसका प्रेम परवान नहीं चढ़ता। दारुब्रह्म जगन्नाथ की पुण्यभूमि की सुरम्यता को निरंतर बनाने वाले हरे-भरे प्रदेश छत्तीसगढ़ में एक जामडाल ही है, जो अंधाधुंध और विकृत उजाड़ के बावजूद भी हर दुख-सुख में सिर पर हाथ धर देता है। बिल्कुल सयानों की तरह। छट्ठी में, बरही में, माँगनी में, लगन में, बिहाव में, मरे में, हजे में सभी के मड़वे में बिछ-बिछ जाती है- हरी-हरी, तंदुरुस्त पत्तियों से छाँव बाँटने वाली जामुन की डगालियाँ। यहाँ जामुन पर्वों का शुभंकर है। सात नग नारियल, इक्कीस नग सुपाड़ी, इक्यावन नग हर्रा, पाव भर घृत और यथाशक्ति सांखला मदन मामू और उनके जैसे अनेक बामनदेवता की दी गयी फेहरिस्त में भले ही पहले अंकित न हो, पर गाँव में अष्टपहरी, रामसप्ता, हरिहाट, रुद्राभिषेक की तैयारी में जुटे सयानों की चर्चा में सबसे पहले जामुन ही है - ‘पहार तरी में हवय गा अब्बड़ अकन जाम के रुख।’ जामुन से मंडपाच्छादन पहले होता है, देव-आह्वान बाद में।

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