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ISSN 2292-9754

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01.31.2016


दरवाज़े

नहीं खुलते ख़ुद-ब-ख़ुद
बंद होते नहीं अपने से
नहीं होता इनका कोई घर
घर के लिए सबसे ज़रूरी हों चाहे जितने
बिलगायें बाहर को भले ही कितने
यहीं से निकलते हैं सब के सब
थक हार के
यहीं आकर निथरते हैं बहुत सारे
मन मार के
इन्होंने ही गढ़े चाबी-ताले
बची है कितनी
दुनिया
दरवाज़ों के हवाले


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