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ISSN 2292-9754

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01.14.2016


बेटियाँ

आँगन में
चहकती हुईं गौरेया
देखते-ही-देखते पहाड़ हो गई

आख़िर एक दिन उन्हें
घोंसले से दूर कहीं खदेड़ दिया गया

लेकिन गईं कहाँ वे ढीठ!

अब वे नदी की तरह उतरती रहती हैं
उदास आँखों में
पारी-पारी से


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