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ISSN 2292-9754

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02.25.2016


उफ़! ये किशोर

 नीना अपने कार्यालय से घर पहुँची, रोज़ की तरह उसने अपने बेटे को फ़ोन किया। कुछ समय बीता फिर से फ़ोन कर वह जानना चाहती थी कि उसका बेटा घर कब तक आएगा? रोज़ की भाँति बेटे ने जवाब दिया "बस आधे घंटे में"। वह अपने काम में लग गई। आधा घंटा एक घंटे में, एक घंटा दो घंटे में बदला। फिर उसने फ़ोन किया। फिर वही जवाब। समय अपनी गति से आगे बढ़ता गया। लेकिन उसके बेटे का आधा घंटा आधा ही रहा। अब उसने फिर कॉल किया तो जवाब मिलता है "हम लाँग ड्राइव पर चले गए।"

ये एक घर की समस्या नहीं रही अमूनन ज़्यादातर घरों में किशोर ऐसे ही व्यवहार कर रहे हैं। ये बदलाव किशोरों को कहीं अपने लक्ष्य से तो नहीं हटा रहा है? क्या वज़ह है जो आज का किशोर घर से दूर भागना चाहता है और बाहर चैन की साँस लेता है। घर में माता-पिता और परिवार के सदस्यों के बीच वह समय बिताना या उनके प्रति कोई भाव नहीं रखता है। तथाकथित दोस्त जो सच्चे तो होते नहीं है बस मौक़े का फ़ायदा उठाने वाले होते है, उनके ख़िलाफ़ एक शब्द नहीं सुन सकते। जो माता-पिता अपने उस किशोर होते बच्चों में ज़िम्मेदारियों का अहसास देखना चाहते है, उन्हें निराशा मिलती है। इनकी दुनियाँ बस मौज-मस्ती की ही बनकर रह जाती है। ये किशोर अपने जीवन का ऐसा समय गँवा रहे हैं जो इन्हें दोबारा नहीं मिलेगा और जब इन्हें अहसास होगा तब तक शायद "अब पछताय होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत!"

इन किशोरों में ऐसा बदलाव हो रहा है, आख़िर क्या वज़ह हो सकती है? इस प्रश्न पर मैंने गौर किया तो, जो बातें मेरे सामने आई है, वह इस प्रकार हैं: एकाकी परिवार, अभिभावकों का ध्यान न देना और कहीं न कहीं मूल्य बदल चुके हैं। इन सब बातों से हटकर जो मुख्य बात है; हर व्यक्ति का बिना मतलब की दौड़ में शामिल होना। चाहे उसका उस दौड़ से कोई मतलब ही न हो। मुझे एक विज्ञापन याद आ रहा है जिसका ज़िक्र मैं यहाँ पर करूँगी, "मेरी साड़ी से तेरी साड़ी ज़्यादा सफ़ेद क्यों?"

किशोरों का अपनी संस्कृति से लगाव न होना - ये भाव किशोरों में कहाँ से आते है? इस प्रश्न का सीधा-सा उत्तर है, उनके परिवार का परिवेश। यदि परिवार में अभिभावक पहले से ही बच्चों को अच्छे संस्कार दें, अपने क़ीमती समय में से बच्चों के लिए समय निकालें, बच्चों की भावनाओं को समझें।

अभिभावक उन्हें अपने मतलब के हिसाब से व्यवहार की शिक्षा न देकर, भविष्य में उनके काम आएँ, उन्हें व उनके भविष्य को उज्ज्वल बनाएँ। ऐसी शिक्षा उन्हें दे- जैसे विनम्रता का महत्व, सहनशीलता का पाठ, समझदारी से समस्याओं का मुक़ाबला करने का पाठ और स्वयं का सम्मान तो करें साथ ही साथ दूसरों का सम्मान भी करें। बच्चों को पैसों से ख़रीदकर दिए सामान से अपने कर्तव्य की इतिश्री न समझें बल्कि अपने समय में से उनके लिए भी समय अवश्य रखें।


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