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ISSN 2292-9754

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03.15.2016


और भरोसा टूट गया

आज सुमति का स्कूल में साक्षात्कार हुआ और उसक चयन हो गया। घर आकर उसने सभी को ख़ुशख़बरी दी। सभी ख़ुश थे कि सुमति का चयन शहर के एक बहुत बड़े विद्यालय में हो गया। उसने डेमो कक्षा दसवीं कक्षा के लिए दी थी। जून से उसे नौकरी आरम्भ करनी था। वह तो यही सोचे हुए थी कि उसे दसवीं कक्षा ही पढ़ाने के लिए मिलेगी, लेकिन जब वह जून में स्कूल आई तो उसे उच्च कक्षाओं के बजाय माध्यमिक कक्षाएँ दी गई। ख़ैर उसे नौकरी की आवश्यकता थी इसलिए उसे स्वीकार करना पड़ा। समय अपनी गति से आगे बढ़ रहा था। सुमति की इंचार्ज सुविधा थी। सुमति और सुविधा इन दोनों में प्रगाढ़ता बढ़ने लगी। सुविधा सदैव सुमति के कार्यों की प्रशंसा करती थी तो सुमति ने इसी आशा में विद्यालय में दो-चार साल निकाल दिए कि "वह उसे आगे बढ़ाने का प्रयत्न ज़रूर करेगी।"

एक दिन की घटना ने सुमति के विश्वास को खंडित कर दिया। हुआ यह था कि स्कूल के प्रधानाचार्य जी ने सुमति को बुलाकर कहा, "हम आपके काम से बहुत प्रसन्न हैं इसलिए आने वाले समय में हम आपको उच्च कक्षाएँ देना चाहते हैं।" समयाभाव के कारण सुमति ने सुविधा को यह बात नहीं बताई। प्रधानाचार्य जी ने स्वयं ही इस बात का ज़िक्र सुविधा से कर दिया। सुविधा ने उस समय प्रधानाचार्य जी से क्या कहा पता नहीं। तीसरे दिन प्रधानाचार्य जी ने सुमति को बुलाकर कहा कि "मैंने जो उच्च कक्षाओं के बारे में कहा था, वह अब मैं नहीं दे पाऊँगा, आप पहले की तरह माध्यमिक कक्षाएँ ही पढ़ाओगी।" सुमति के "क्यों" पूछने पर प्रधानाचार्य जी ने कहा कि "आप उच्च कक्षा पढ़ा नहीं सकती क्योंकि आपमें क्षमता नहीं है।"

यह सुनकर सुमति के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।


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