सत्यवादी जसबीर कालरवि
वह जब भी चीख़ता था मुँह में चीख़ता था और जब भी रोता दिल की अन्दरूनी तहों तक रोता....।
उसकी आँखों की उदासी में बेचैनी भी थी और बीती रात का सपना भी जो रात भर उसके साथ धीरे-धीरे खेलता रहता...।
उसके मुँह में कुछ अनकहे बोल थे जो उसके अपने ख़ून से लथ-पथ थे पर वह जी रहा था अपनी ख़ामोशी की क़त्लगाह में जहाँ और कोई भी नहीं था वह आप भी नहीं...।