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03.02.2012
 

एक अंतहीन कविता 
जसबीर कालरवि


आजकल वो
पैरों से लिखता है
राहों के कागज़ पर
एक अंतहीन कविता को
अन्तिम रूप देने की इच्छा में

दर‍असल वो
राख रहित
अपनी ही अस्थियाँ लेकर
घूम रहा है
जीवन के इस
महासागर में छोड़ने के लिए

अक्सर वो ख़ुदा को कहता है
मालूम है तुम को....?
ये महायान धरती का
लेकर जा रहा तुम्हें
किस असीम की ओर

वो बार-बार
कान लगाकर
भीतर से कुछ सुनने की इच्छा में
पैरों से लिखता जा रहा है
राहों के कागज़ पर
एक अंतहीन कविता....!


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