एक अंतहीन कविता जसबीर कालरवि
आजकल वो पैरों से लिखता है राहों के कागज़ पर एक अंतहीन कविता को अन्तिम रूप देने की इच्छा में
दरअसल वो राख रहित अपनी ही अस्थियाँ लेकर घूम रहा है जीवन के इस महासागर में छोड़ने के लिए
अक्सर वो ख़ुदा को कहता है मालूम है तुम को....? ये महायान धरती का लेकर जा रहा तुम्हें किस असीम की ओर
वो बार-बार कान लगाकर भीतर से कुछ सुनने की इच्छा में पैरों से लिखता जा रहा है राहों के कागज़ पर एक अंतहीन कविता....!