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08.05.2007
 
मूंगा से भये राख
जयनंदन

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      संदेशी तिलमिलाकर रह गया। अगर बिना कहे कोई नागा कर दे तो इस बात पर भी उसका गुस्सा नाक पर आ जाता है। पिछले दिनों मोसाहिब पर इसने इसी तरह हथौड़ा चला दिया था, "बिना कहे नागा मार देते हो...क्या अपने बाप का राज समझ रखा है? कोई तौर-तरीका है या नहीं कंपनी में? रिपोर्ट कर दूँगा तो सीधे सस्पेंड हो जाओगे।"

   उसकी बदतमीजी और कमीनगी का कोई समाधान नहीं था। ऊपर शिकायत करने पर परेशानी घटने की जगह और बढ़ जाती थी। संबद्ध अधिकारियों का इसे पूरा शह प्राप्त था। अघोषित रूप से उनका भी यह मानना था कि काम करवाने के लिए इस तरह का सख्त रवैया अपनाना एक उपयोगी कदम है। वे देख रहे थे कि तिवारी के गैंग का उत्पादन सबसे ज्यादा दुरूस्त और लक्ष्य के अनुकूल रहा करता है। अधिकारी  अन्य सरदारों के सामने तिवारी को एक उदाहरण की तरह पेश करते थे। परिणाम यह था कि अन्य सरदार भी तिवारी की तरह हुड और उज्जड व्यवहार में ढलने लगे थे।

   गैंग के एक-दो मजदूर के छुट्टी पर चले जाने से उनके बदले में अस्थायी मजदूरों को लगा लेने का प्रावधान था। मगर तिवारी के थेथरई का आलम यह था कि कम आदमी से भी वह पूरा काम निकाल लेने की धौंस दिखाने लग जाता था। एक बार ऐसी ही परिस्थिति में मूंगा प्रसाद से उसकी ठन गयी। मूंगा की सामान्य गति देखकर जब वह दबाव बनाने लगा तो मूंगा ने खरी-खरी सुना दी, "मैं कोई घोड़ा नहीं हूँ कि हंटर मारने से चाल तेज हो जायेगी। एक आदमी अधिकतम जितना कर सकता है उतना मैं रोज करता हूँ, उससे ज्यादा करना मुमकिन नहीं है।"

तिवारी ने आँखें फाड़कर उसे घूरा और स्वर में दबंगता भरकर दहाड़ उठा, "काम निकालने के लिए ज्यादा हाथ-पैर चलाना जरूरी होता है मूंगा प्रसाद, जबान नहीं। जो घोड़ा हंटर मारने से भी चाल नहीं बढ़ाता, उसकी जगह रेस का मैदान नहीं बiल्क निठल्ले व बेकार पशुओं को पालनेवाली गौशाला होती है। मूंगा प्रसाद, यह कोलियरी काम करनेवाले मेहनतकशों का कर्मस्थल है, न कि बूढ़ों का वृद्ध आश्रम। अब तुम्हारी खैर नहीं है। मुझे समझ में आ गया, अब तुम मूंगा तो क्या कोयला भी नहीं रहे, राख हो गये हो राख।"

   मूंगा प्रसाद को लगा कि फूट-फूट कर रो पड़े और कोयले की दीवार से टकराकर अपना माथा फोड़ ले। अगर वह मूंगा से राख हो गया है तो इसी कोलियरी ने उसे राख बनाया है। उसने अपनी जवानी और अपनी बूंद-बूंद ऊर्जा इस कोलियरी में ही खर्च की है। यहाँ से निकलने के बाद तो पोर-पोर इस तरह चटक जाते हैं कि सोने के सिवा बाजार से सब्जी तक लाने के लायक वह नहीं रह जाता।

   कदम-कदम पर बिछी जान की जोखिम वाले एक खतरनाक पाताल लोक में हाड़तोड़ मेहनत करके काला हीरा निकालने की जांबाजी का यही पुरस्कार है कि घड़ी-घड़ी धमकी दी जाये? - ’उत्पादन बढाओ नहीं तो खान बंद कर देंगे..ऐश (छाई) की मात्र ज्यादा है, इसकी भरपाई अधिक कोयला निकालकर ही की जा सकती है।ऐश की मात्र ज्यादा है’, यह सुन-सुन कर यहाँ के मजदूरों के कान पक गये हैं। सवाल है कि ऐश की मात्र ज्यादा है और उसे वाशरी की प्रक्रिया से गुजरने के बाद भी 17 प्रतिशत से कम नहीं किया जा सकता तो इसमें मजदूरों का क्या कसूर है? उत्पादन आखिर और कितना करें...एक आदमी की कोई तो हद होती है?

   कहते हैं बाजार में टिकना मुश्किल है, जबकि जिस कारखाने के लिए यहाँ कोयला निकाला जाता है, वह कंपनी मुनाफे का हर साल नया रिकार्ड बना रही है....दूसरे प्रदेशों में और यहाँ तक कि दूसरे देशों में नयी-नयी फैक्ट्रियाँ लगा रही है,...वार्षिक इस्पात उत्पादन का नया-नया टार्गेट तय कर रही है। यही कारखाना पाँच साल पहले सिर्फ डेढ़ मिलियन टन इस्पात बनाता था, फिर भी माइंस, कोलियरी, माके|टिंग, ऑफिस, प्लाँट, मेडिकल, टाउन, एजुकेशन आदि में सब मिलाकर 70,000 कर्मचारी नियोजित थे....आज पाँच मिलियन टन बना रहा है और 2000 करोड़ का मुनाफा हो रहा है, फिर भी सब मिलाकर अब सिर्फ 40,000 कर्मचारी रह गये हैं...30,000 की छंटनी की जा चुकी है।

   कंपनी मुख्य कारखाने की पुरानी मशीनरियों को हटाकर आधुनिकतम (स्टेट ऑफ आर्ट) सुविधायें स्थापित कर रही है। नन-कोर विभाग, मेडिकल, एजुकेशन, टाउन को बंद किया जा रहा है या उन्हें अलग करके नया नाम दिया जा रहा है। वहाँ के कर्मचारियों को या तो हटाया जा रहा है या नयी सेवा-शर्तों पर अलग किया जा रहा है। मूंगा को समझ में नहीं आता कि आखिर संकट कहाँ है...और प्रबंधक के ये शातिर संचालक आखिर चाहते क्या हैं? अगर ज्यादा मुनाफा कमाकर ज्यादा से ज्यादा लोगों के हितों का संरक्षण नहीं दिया जा सकता तो फिर वैसे मुनाफा कमाने का अर्थ क्या है? वैiश्वक प्रतिस्पर्धा का प्रेत दिखाकर गुणवत्ता में बढ़ोतरी और लागत में कमी का राग अलापना तथा मुनाफे से न भरनेवाले पेट को इतना फैला देना कि हर पाप इसमें समाकर पच जाये और मजदूरों को अपनी नौकरी में बना रहना गुनाह लगने लगे...क्या इस घड़ियाली विलाप के पीछे यही मकसद छिपा नहीं है?

    मूंगा की छठी इन्द्रिय का पूर्वाभास नकारात्मक होता चला जाता है। जो खदान उसे सुख-समृद्धि की कभी न खत्म होनेवाला कुबेर का खजाना जान पड़ती थी, वह एक अजगर लगने लगती है। अजगर की तरह खदान उसे ज़िंदा निगल लेती है और आठ घंटे तक निचोड़कर उगल देती है। जसदेव तिवारी, जनरल मैनेजर और अन्य अधिकारी अजगर के जहरीले दांत में ढल जाते हैं, जो चुभते रहते हैं जिस्म में।

   आठ बजे से शुरू होनेवाली सुबह की पाली में टाइम कीपिंग सेक्शन में हाजिरी कार्ड डालकर मूंगा प्रसाद ने कैप-लैम्प केबिन की तरफ बढ़ना चाहा तो नोटिस बोर्ड की तरफ उसका ध्यान चला गया। एक नयी नोटिस टंगी है, जिसे कुछ लोग पढ़ रहे हैं और पढ़ते हुए एक गहरे सदमे में घिरते चले जाते हैं। नोटिस में कहा गया है कि 50 वर्ष से ऊपर के सभी मजदूर तत्काल प्रभाव से स्वैच्छिक सेवानिवृति ले लें और बदले में अपने मेडिकली फिट बेटे या दामाद की बहाली करवा लें। मूंगा को लगा कि बस यहीं से घर लौट जायें। उसके आसपास संदेशी लाल, मोसाहिब सिंह और कई अन्य हमउम्र मजदूर आ जाते हैं। सबका मुँह लटक गया है। मूंगा की डगमगाती मन:स्थिति को भाँपते हुए संदेशी कहता है, "चलो, आज अंतिम समझकर नीचे से हो आयें।"

   किसी डोर संचालित कठपुतली की तरह मूंगा प्रसाद उनके पीछे हो लेता है। वह देख रहा है कि मुस्कराने, चुटकुला सुनाने और फिल्मी व राजनीतिक गप्पें हाँकने वाले सभी चेहरे आज किसी शिला की तरह जमे हुए प्रतीत हो रहे हैं। मूंगा अपने भोले साथियों से पूछना चाहता है कि क्या अब भी कहोगे कि इस कोलियरी में काम करनेवाले मजदूरों के हिस्से में हंसी-मजाक के लिए कोई हाशिया रहने दिया गया है?

   मूंगा प्रसाद खदान में उतरकर बैठ जाता है एक कोने में गुमसुम। उसके साथ संदेशी और मोसाहिब भी आ जाते हैं। मूंगा कहता है, "संदेशी भाई, आज हम कन्वेयर ट्रे में जमीन की जगह जिगर से निकालकर कोयला भरेंगे। आज हम अपनी हसरतों और उम्मीदों को खुरचेंगे, जो भीतर दब-दब कर कोयले में तब्दील हो गयी हैं।"

   संदेशी और मोसाहिब उसे यों देखते हैं जैसे किसी आँधी में फंसकर कोई मासूम पक्षी दम तोड़ रहा हो। जसदेव तिवारी इनकी मंशा भांपकर इनसे कुछ भी कहना उचित नहीं समझता। गैंग के युवा लड़के काम में भिड़ जाते हैं। आज इन तीनों के कोटे का काम भी इन्हें ही पूरा करना है। तिवारी खुद भी काम में हाथ बंटाने लगता है, कभी ड्रिलर के साथ, कभी हैमरमैन के साथ, कभी ट्रैमर के साथ, कभी हैवी टैंडल के साथ। शायद उसे आज दिखा देना है कि इन बूढ़ों-ठेढ़ों का उत्पादन में कोई योगदान नहीं है, इनके बिना ही काम हो सकता है।

   कभी किसी दुर्घटना के हो जाने पर संदेशी ने उसके डर को कम करने के लिए एकबार समझाया था, "दुर्घटना आदमी की गति को कम नहीं करती मूंगा भाई। रेल की या हवाई जहाज की कितनी बड़ी-बड़ी दुर्घटनायें होती हैं, लेकिन आदमी सफर करना छोड़ नहीं देता। अकाल मृत्यु तो प्राय: हर घर में होती है,  लोग फिर भी भविष्य के लिए योजनायें बनाते रहते हैं और धन संचय करते रहते हैं।"

   आज फिर एक दुर्घटना हो गयी है...जिसमें एक साथ कई मजदूर स्थायी तौर पर अनफिट हो गये हैं....मूंगा को लगता है कि यह कार्रवाई चासनाला और गजलीटांड से भी कहीं ज्यादा त्रासद है। उसमें राहत कार्य चलाने की और उससे उबर जाने की गुंजाइशें थीं, मगर इस मानव-नियोजित बेआवाज दुर्घटना में जो होना है उसकी गणना पहले ही कर ली गयी है। इस हादसे से कैसे संभला जाये...मूंगा संदेशी के चेहरे को पढ़ने की कोशिश करता है...पर वह कुछ भी बोलने की मन:स्थिति में नहीं है।

   वैधानिक रूप से बू़ढे होने की उम्र 60 साल निर्धारित है, लेकिन यहाँ के निजाम 50 साल में ही उन्हें खारिज कर देने पर आमादा हैं। इस कोलियरी को सिर्फ जवानी चाहिए।

   मूंगा की आँखें डबडबा जाती हैं....तीस साल से वह कोयले के जिस अजस्र भंडार गृह में रोज आता रहा, अब कल से उसका आना निषिद्ध हो जायेगा। वह खदान के सभी कोनों, अंतरों, पड़ावों और ठिकानों पर अपनी कातर निगाहें दौड़ाता है। इनसे रोज-रोज की रिश्तेदारी रही, अब इन्हें शायद देखना भी मुमकिन न हो। यह कैसी त्रसदी है कि काम पर बहाल रहना भी तकलीफदेह था और अब हटाया जा रहा है तो तकलीफ और बढ़ गयी है। उसके कान में तिवारी के कहे वाक्य एक बार फिर गूँजने लगे हैं..."जो घोड़ा हंटर मारने से भी चाल नहीं बढ़ाता, उसकी जगह रेस का मैदान नहीं बiल्क निठल्ले व बेकार पशुओं को पालनेवाली गौशाला होती है। यह कोलियरी काम करनेवाले मेहनतकशों का कर्मस्थल है...न कि बूढ़ों का वृद्धाश्रम। अब तुम मूंगा तो क्या कोयला भी नही रहे...राख हो गये हो, राख।"

   काफी देर बाद बर्फ की तरह जमी चुप्पी को तोड़ते हुए मोसाहिब कहता है, "अब जो होगा देखा जायेगा, यार। हम न सही, हमारे बेटे तो काम करेंगे।"

   मूंगा उसे चौंककर देखता है, "तो क्या, तुम अपने बेटे को यहाँ लगा रहे हो?"

   "क्यों नहीं यार, जब कंपनी ने यह मौका दिया है, तो इसे छोड़ क्यों दें? नौकरी मिलती कहाँ है? मेरे तो तीन बेटे हैं और तीनों ही बेरोजगार हैं। क्या तुम अपने बेटे देवेश को नहीं लगा रहे?"

   "नहीं यार, बिल्कुल नहीं। मैंने तो पहले ही कह रखा है कि कुछ भी कर लो, लेकिन इस खदान में नौकरी मत करना। यहाँ काम करते हुए हमने जो जिल्लत, जोखिम और खतरे झेले हैं तथा जवानी को जितना तिल-तिल गलाया है...अंतरात्मा नहीं कहती कि इकलौते बेटे को भी इसी रास्ते पर ढकेल दूँ।"

   संदेशी दोनों के मनोभावों को पढ़ते हुए कहता है, "चलो, इस मामले में एक नि:संतान आदमी ज्यादा निश्चिंत है, यानी कि मैं। मेरे सामने कोई दुविधा नहीं है...मुझे किसी को अपना उत्तराधिकार नहीं सौंपना है।"

   संदेशी के वक्तव्य के निहितार्थ ने मूंगा के मर्म को छू लिया। उसकी वाणी में संतुष्ट होने की भंगिमा से ज्यादा एक दुख समाया था। उसके गाढ़े दिनों में सहारा देनेवाला कोई वारिस नहीं। अभी से संदेशी पूरा जीवन बेरोजगार होकर गुजारेगा....इस चुकी-बची उम्र में भला वह कहाँ जायेगा...क्या काम करेगा और कौन काम देगा? कुछ ही दिनों में कंपनी का क्वार्टर भी खाली करना होगा। उसकी पत्नी हमेशा बीमार रहती है। स्वैच्छिक अवकाश में जो पैसे मिलेंगे, वे भी इतने नहीं होंगे कि उनसे पूरी ज़िंदगी गुजर जाये। स्वैच्छिक अवकाश....यह शब्द उसे बुरी तरह चुभ गया। जब अवकाश जबरन थोपा जा रहा है तो इसे स्वैच्छिक क्यों कहा जा रहा है? क्या सिर्फ दुनिया को दिखाने और अपना दामन पाक रखने के लिए?

    शाम को मूंगा प्रसाद जब घर पहुँचता है तो आज बिना काम किये हुए भी उसे थकान ज्यादा महसूस होती है। पूरी कॉलोनी में घर-घर चर्चा फैल गयी है कि अब पुराने लोग घर बैठेंगे और नये लोग ड्‍यूटी पर लगाये जायेंगे। बादामी दरवाजे पर ही उसकी राह देख रही है। पति की उदासी देखकर वह असमंजस में पड़ जाती है। उसे शायद यह अपेक्षा थी कि आज उसका पति खुश होकर लौटेगा। चूंकि जिस काम  को करते हुए उसकी आत्मा धिक्कार और पीड़ा से आहत होती रही तथा उसे वह एक सजा की तरह महसूस करता रहा, आज उससे मुक्त होकर उसे बेशक एकदम हल्का व तनावरहित हो जाना चाहिए। वह झट से कह देती है, "आज तो आप खुश हो जाइये जी, अब आप आराम से घर बैठेंगे। काम पर अब देवेश जाया करेगा।"

   मूंगा ताज्जुब से उसका मुँह देखता रह जाता है। अकबकाकर पूछ बैठता है, "देवेश जायेगा...क्या कह रही हो? मेरी हालत देखने के बाद भी क्या देवेश तैयार है इसके लिए?"

   "तैयार ही नहीं, उत्साहित है। एक अदद नौकरी के लिए बेचारा कहाँ-कहाँ धक्के खा रहा था। कहता है बाउजी को आराम देकर उसे सच्चा सुख मिलेगा। एक बेटे का यही तो फर्ज है।"

   मूंगा प्रसाद को जैसे काटो तो खून नहीं...उसे यों लगता है जैसे उसकी जवानी रिवाइंड होकर फिर से उसी प्रताड़ना, शोषण और धिक्कार के रास्ते पर चल पड़ी जिस पर वह चलते-चलते दोबारा न चलने की कसमें खाता रहा। उसे अचानक ­ढ लगने लगती है और तेज बुखार आ जाता है।

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