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08.05.2007
 
मूंगा से भये राख
जयनंदन

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       एक बार तो ब्लास्ट के बाद पास ही स्थित सील किये गये कोयला निष्कासित जोन से बड़ी तेजी से पानी की धार फूट पड़ी। यों पानी का रिसाव प्राय: होता ही रहता है और उसे बॉटम पिट में एकत्रित करके बाहर निकालने के लिए एक शक्तिशाली पम्प लगातार चलता रहता है। मगर यह रिसाव असामान्य था, लगा जैसे किसी बांध की दीवार टूट गयी हो। मन के भीतर चासनाला और गजलीटांड का दिल दहला देने वाला कांड कौंध गया, जहाँ पन्द्रह-बीस दिनों तक सैकड़ों मजदूर पानी में घिरे रहे...फंसे रहे। इनमें अंतत: कुछ तो डूब कर मर गये और कुछ भूख से तड़प-तड़प कर परलोक सिधार गये। इन तक सरफेस से कोई मदद नहीं पहुँचायी जा सकी। मूंगा और उनके साथियों की किस्मत अच्छी थी कि रेस्क्यू टीम फिर समय पर आ गयी और जलस्रोत को बंद करने में कामयाब हो गयी।

           एक दिन दूसरी पाली की ड्‍यूटी खत्म कर रात 12 बजे लिफ्‍ट के लिए सीम नम्बर 8 के सभी कर्मचारी इंतजार करने लगे। काफी देर के इंतजार के बाद ऊपर से फोन द्वारा सूचना आयी कि लिफ्‍ट में कोई मेजर गड़बड़ी हो गयी है और सुबह तक उसके ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं है। अब या तो रात भर भूखे-प्यासे यहाँ झख मारा जाये या फिर वाशरी के कोल बंकर में कोयला ले जानेवाली स्केट कन्वेयर लाइन से होकर अन्तरसम्बद्ध दूसरी कोलियरी में जाकर, वहाँ के लिफ्‍ट से निकला जाये। इस प्रक्रिया में तीन-चार किलोमीटर पैदल और वह भी ऊपर की ओर चलने की जरूरत थी। कुछ लोगों ने यह रास्ता अपना लिया, मगर मूंगा प्रसाद की हिम्मत जवाब दे गयी और वह कमर से बैट्री खोलकर, कैप लैम्प निकालकर एक अंधेरे कोने में गमछा बिछाया और लुढ़क गया। उसे डर था कि रात पाली के मजदूर नीचे उतर नहीं सके हैं, इसलिए दूसरी पाली वालों को ही ओवरटाइम करने का आदेश न जारी कर दिया जाये। खासकर उसका माइनिंग सरदार तिवारी तो बिना कहे भी वाहवाही लेने के लिए ऐसी कार्रवाई करने पर उतारू हो सकता है।

         सुबह जब लिफ्‍ट ठीक हो गया और मूंगा खान से बाहर आ गया तो पास ही बादामी और बेटा देवेश उसकी प्रतीक्षा में लिफ्‍ट की तरफ टकटकी लगाये खड़े थे। नीचे जितने लोग फंसे थे, प्राय: सबका परिवार वहाँ मौजूद था। मूंगा को देखते ही बादामी और देवेश की आँखों में एक चमक उभर आयी और साँसत में अटकी उनकी जान को जैसे चैन मिल गया। मूंगा समझ गया कि रात भर ये लोग यहीं डटे रहे होंगे, किस्म-किस्म की आशंका को लिये हुए। यों प्रबंधन की ओर से यह घोषणा बार-बार हुई होगी कि लिफ्रट खराब होने के कारण खनिक अंदर से बाहर नहीं आ पा रहे हैं, चिंता की कोई बात नहीं है...मगर प्रबंधन पर अब लोगों को विश्वास नहीं रह गया है....चूंकि ऐसा कई बार हो चुका है कि प्रबंधन ने सच्चाई के नाम पर जो कहा वह आगे गलत साबित हो गया। बादामी की आँखों में उसके सही-सलामत वापस आ जाने पर एक खुशी और अपने इष्ट देव के प्रति एक कृत्तज्ञता का भाव साफ पढ़ा जा सकता था। उसकी आँखें गीली हो गयी थीं। मूंगा ने उसके पास जाकर रिश्तों की घनिष्ठता को अपनी रागात्मक मुस्कराहट से और भी पुष्ट बनाते हुए कहा, "चलो, घर चलें, तुम तो मुझसे भी ज्यादा परेशान और थकी हुई लग रही हो।"

         ऐसी परिस्थिति में रात भर यहाँ आकर खड़े होने से उसने कितनी बार मना किया है। पर जो सच्चे मन से अपने हैं, वे भला कहाँ माननेवाले। बादामी का एक ही जवाब होता है, "आप रात भर अंदर में फंसे रहें और हम आराम की नींद लें, यह कैसे हो सकता है जी?"

               अमूमन खान से निकलकर ऊपर बने स्नानगृह (पिट हेड बाथ) में नहाने के बाद मजदूर घर जाते हैं। उस दिन मूंगा ने सीधे कैप लैम्प केबिन में जाकर टोकन और बत्ती जमा की और घर चल पड़ा।

      जीएम द्वारा जारी निर्देश पर नीचे के अधिकारियों ने कार्रवाई शुरू कर दी। उत्पादन बढ़ाने पर सबने  निगाहें टिका दीं।

           मूंगा ने अपने गैंग के साथियों से कहा, "आखिर यह सिलसिला कहाँ जाकर रुकेगा? मशीन भी होती है तो पुरानी पड़ जाने पर उसकी क्षमता में कमी आ जाती है। लेकिन ये लोग, नीति निर्धारण करने और प्रबंधन चलानेवाले, हमें आदमी भी नहीं समझते और मशीन भी नहीं....क्या समझते हैं, भगवान जानें? मुझे तो नहीं लगता कि हम इससे ज्यादा करने में समर्थ हो सकेंगे।"

           गैंग में मूंगा की उम्र के दो और मजदूर थे हैमरमैन संदेशी लाल और लोडर मोसाहिब सिंह। इन दोनों की मूंगा की राय से सहमति थी, लेकिन जो इनसे उम्र में कम थे, वे अभी हाथ खड़े करने के पक्ष में नहीं थे। उनमें से एक प्रदीप शर्मा ने कहा, "हम अभी नौकरी से निकलकर बेरोजगार नहीं होना चाहते मूंगा भाई। अभी हमारे बच्चे बहुत छोटे हैं।"

 

       मूंगा, संदेशी और मोसाहिब समझ गये कि इस गैंग में या कहें इस कोलियरी में अब उनके दिन पूरे हो गये हैं। वे इनके समान जुतकर बराबरी में योगदान कर नहीं सकेंगे, और कर नहीं सकेंगे तो इन्हें और इनके माइनिंग सरदार को यह कतई बर्दाश्त नहीं होगा। मगर वे दूसरे किस गैंग में जायेंगे और उन्हें कौन स्वीकार करेगा? अपनी मर्जी से तो वे कहीं जा भी नहीं सकते। मूंगा पर एक गहरी चिंता सवार हो गयी थी। घर में एक जवान लड़की कुँवारी है और एक जवान बेटा बेरोजगार है। तनख्वाह पर जीने की आदत हो गयी है और सब कुछ इसी पर टिका है। इसके बंद हो जाने से कुछ भी पटरी पर नहीं रह जायेगा। बेटा महीने में हफ्‍ता-दो हफ्‍ता ठेकेदारी में काम कर लेता है। हालांकि उसका इस तरह काम करना उसे एकदम नापसंद है। वह हरगिज नहीं चाहता कि उसका बेटा भी उसकी तरह कोलियरी का मजदूर बन जाये। वह घर में इस आशय की अक्सर हिदायत देता रहता है, "चाहे तुम्हें कुछ भी करना पड़े, लेकिन कोलियरी में नौकरी मत करना, बेटा। नीचे उतरकर आठ घंटा इस तरह काटना पड़ता है जैसे आठ जन्म का सश्रम कारावास काट रहे हों। कारावास तो फिर भी ठीक है, उसमें आदमी धरती की सतह पर रहता है और पूरी दुनिया को अपने आसपास महसूस करता रहता है। लेकिन खदान में तो कोई दुनिया ही नहीं होती सिवा निष्प्राण कोयला और पानी के।"

   मूंगा का माइनिंग सरदार अर्थात उसके गैंग का सुपरवाइजर जसदेव तिवारी एक निष्ठुर जेलर की ही भूमिका में रहा करता था। जरा-सा काम में सुस्ती या ढिलाई देखी कि कोसना-धिक्कारना और भयादोहन शुरू।

   अब तो इससे भी आगे बढ़कर गाली-गलौज तक उसने शुरू कर दी। कंपनी का नियम-कानून, अनुशासन और आचार-विचार सब वह अपनी जेब में रखने लगा। एक दिन संदेशी लाल की तबीयत जरा ढीली थी। हल्का बुखार और सिर में दर्द था। अत: थोड़ी सुस्ती का आ जाना स्वाभाविक था। बेचारा फिर भी हैमर चलाकर माल नीचे गिरा रहा था। तिवारी ने उसकी सुस्ती ताड़ ली और फिर एक कटखने कुत्ते की तरह बेसुरा भौंक उठा, "संदेशी, जब किसी बीमारी की पकड़ में तुम आ गये हो तो मुंह उठाकर यहाँ क्यों चले आये? क्या हाजिरी लगवाने? तनख्वाह क्या हराम की आती है? अगर आये हो तो पूरा काम करना होगा...नहीं तो अभी भी हाजिरी कटवाकर लौट जाओ और घरवाली की अंचरा में घुसकर सो जाओ।" ऐसा कहते हुए उसमें उम्र का भी लिहाज नहीं था।

 

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