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08.05.2007
 
मूंगा से भये राख
जयनंदन

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      कोलियरी के भीतर ले जानेवाले लिफ्‍ट की परिसीमा में घुसते ही एक सनसनाहट समा जाती है मूंगा प्रसाद के दिमाग में। उसकी हालत ऐसी हो जाती है जैसे एक जोखिम भरे ऑपरेशन के लिए वह ऑपरेशन थिएटर ले जाया जा रहा हो, जहाँ से वापसी की कोई गारंटी नहीं। आठ घंटे के लिए वह धरती में समा जायेगा। पृथ्वी पर मौजूद सारे साधनों, सुविधाओं और संबंधियों से दूर। हालांकि यह दूरी 1500 फीट यानी लगभग आधा किलोमीटर पृथ्वी पर बहुत मामूली है, लेकिन लम्बवत यह दूरी सात समुद्र पार की पांच-सात हजार किलोमीटर की समानांतर दूरी से भी कहीं डरावनी है। पृथ्वी में जब आदमी घुस जाता है, तो ज्यादातर वह असहाय और भगवान भरोसे ही होता है। कुछ भी विपदा आ जाये...जहरीली गैस का रिसाव....जल का रिसाव....अग्निकांड....छत का टूट पड़ना या कोई आकस्मिक बीमारी, तो अपने हाथ में नहीं होता भागना। बस एक ही रास्ता और एक ही उपाय है - लिफ्‍ट। लिफ्‍ट, जिसे लोग शाफ्‍ट भी कहते हैं, कोलियरी की आत्मा है...मजदूरों का तारणहार है...कंपनी की प्रगति का वाहन है।

   इन दिनों लिफ्‍ट में चढते ही मूंगा प्रसाद के चेहरे का वोल्टेज क्रमश: कम होते-होते मानो पूरी तरह बुझ जाता है। उसके साथ काम करनेवाले लोग ताड़ जाते हैं। एक सहकर्मी संदेशी लाल उसे अक्सर छेड़ देता है, "यार मूंगा, मुस्कराना मत छोड़ो, इससे ज्यादा नुकसान अपना ही है, भाई।"

   मूंगा को ताज्जुब होता है कि ये लोग इस कोलियरी में निचोड़ लेने और पीस डालने की परिस्थिति में काम करते हुए भी हंसी-मजाक कर लेते हैं, एक-दूसरे को चुटकुला सुना लेते हैं, फिल्मों की बातें कर लेते हैं और दागी व भ्रष्ट नेताओं की शैतानियों और कारगुजारियों पर लानत-मलामत करने का लुत्फ उठा लेते हैं। मूंगा का तो जैसे घर से ड्‍यूटी के लिए चलते ही खून सूखना शुरू हो जाता है। टिफिन लेकर वह चलता है तो पत्नी, बच्चे और घर को इस तरह निहारता है, मानो अंतिम बार देख रहा हो...क्या पता धरती के गर्भ से लौटकर आना हो या न हो। पत्नी बादामी देवी जानती है कि यह काम इन्हें बिल्कुल नापसंद है...मगर उपाय भी क्या है...नौकरी अपनी मरजी पर तो निर्भर है नहीं कि जब चाहा, जहाँ चाहा बदल लिया। उसने एक दिन हौसला बंधाने की मंशा से कहा, "आप इस तरह मायूसी लेकर काम पर न जाया करें जी...हौनी का क्या है, वह तो कहीं भी घट सकती है...घर में भी या सिनेमाहॉल में भी।"

   मूंगा ने कहा, "मैं हौनी से नहीं डरता, भाग्यवान....मैं हताश और नाउम्मीद उस व्यवस्था से हूँ, जिनके पंजे हम मजदूरों की गर्दन पर रोज व रोज कसते जा रहे हैं।"

   पिछले दिनों मजदूरों की एक मीटिंग बुलाकर जनरल मैनेजर ने धमकी वाले अंदाज में एक बार फिर अपना पुराना राग अलापा था, "हमारी खदानों की जो उत्पादकता है, उससे बाजार की मौजूदा प्रतिद्वन्द्विता में बिल्कुल टिका नहीं जा सकता। इसलिए प्रति कर्मचारी उत्पादन का औसत बढ़ाना जरूरी है। ऐसा करके ही हम कर्मचारी लागत कम कर सकेंगे। खान को बंद होने से बचाने के लिए हर कर्मचारी को अपनी उत्पादकता में इजाफा करना होगा, वरना प्रबंधन महसूस कर रहा है कि अपने इस्पात कारखाने के लिए आस्Îलिया से कोयला मंगाना सस्ता और फायदेमंद है। उसकी क्वालिटी अच्छी है और उसमें छाई (ऐश) की मात्र कम है। प्रबंधन ने कर्मचारी लागत कम करने के लिए कुछ योजनायें बनायी हैं, जो आपके बीच प्रसारित की जायेंगी। आप लोगों को इसमें सहयोग करना है।"

   जनरल मैनेजर ने एक साल में चौथी बार इस तरह का तुगलकी फरमान जारी किया था। विडम्बना यह थी कि अपनी हाँ में हाँ मिलवाने के लिए अपने पार्श्व में वह यूनियन के प्रेसिडेंट को भी खड़ा कर लेता था। जाहिर है मजदूरों के पास अपना डर कम करने का कोई उपाय नहीं था।

   जीएम के निर्देशानुसार निचले अधिकारियों ने उनके मकसद को स्पष्ट करते हुए बता दिया कि जिस गैंग का उत्पादन औसत 25 प्रतिशत नहीं बढ़ेगा, उस गैंग के कर्मचारियों को ऐच्छिक सेवानिवृति दे दी जायेगी। मूंगा के अंदर इस नृशंस चेतावनी को सुनकर जैसे एक भूचाल समा गया....उनके शारीरिक परिश्रम को खींच-खींचकर आखिर कहाँ तक ले जाना चाहते हैं ये मुफ्‍तखोर। जरा एक दिन खुद से हथौड़ा, बेलचा, गैंता और झुड़ी लेकर उतरें खान में तो पता चले कितना खून सुखाना पड़ता है एक-एक टुकड़ा नालने में। पहले आठ लोगों के गैंग में दो टब यानी एक टन प्रति दिन का टार्गेट था। इसे बढ़ाते-बढ़ाते सवा टन कर लिया गया। अब कहते हैं डेढ़ टन करना है। मूंगा प्रसाद प्रति दिन एक टन करने में ही पूरी तरह निढाल हो जाया करता था। सवा टन करते-करते तो देह की हालत एक तपेदिक मरीज जैसी हो जाती थी। अब तो डेढ़ टन करने में पूरी की पूरी लाश में बदल जाना होगा। उम्र ढलान की तरफ सरक रही है...शरीर में अब पहले सा दम नहीं है। चाहिए तो था कि उम्रदराज लोगों के लिए उत्पादन टार्गेट में थोड़ी ढील दी जाती। मगर यहाँ उल्टा हो रहा है। ऊपर से कोई प्रोत्साहन या पारितोषिक नहीं। वह आज पन्द्रह वर्षों से माइनर का माइनर यानी मलकट्टा ही बना रह गया....न एक प्रोमोशन, न अतिरिक्त इंक्रीमेंट, न कोई इंसेंटिव। चाहे ईमानदारी से जितना काम करो। ऊपर से कदम-कदम पर बिछे हुए हजार खतरे। इस संकरी जगह में अपनी पूरी लंबाई में आदमी खड़ा तक नहीं हो सकता। लंबे आदमी को तो कुबड़ा ही बनकर रहना होता है। यहाँ कितनी-कितनी विपत्तियों से गुजरना पड़ा है, याद करने बैठे तो रोयें सिहर जाते हैं और लगता है कि बार-बार किसी चमत्कार ने ही उसे बचा लिया।

   एक दिन टिफिन खाकर अपने गैंग के साथियों के साथ एक कोने में बैठकर गप्प मारते हुए सभी लोग सुस्ता रहे थे। अचानक एक मीटर आगे कोयले का एक बडा चट्टान छत के सपोर्ट को तोड़ते हुए नीचे आ गिरा। उन्हें बचना था, अन्यथा उनके सिरों पर गिरता तो वहीं ढेर हो जाने के लिए मुंह से आह निकालने की भी मोहलत नहीं मिलती।

   एक दिन जिस फेस में काम चल रहा था उसमें ड्रीलर के ड्रील करने के बाद एक्सप्लोसिव कैरियर ने छिद्र में बारूद भरकर ब्लास्ट करवाया तो अचानक एक तेज गंध उठने लगी। सेफ्‍टी लैम्प से टेस्ट किया गया तो फ्‍लेम फेड होकर बुझ जाने लगा। मतलब कोई जहरीली गैस रिसने लग गयी। मूंगा और उसके साथियों को लगा कि आज उनकी उम्र पूरी हो गयी। इसी बीच माइनिंग सरदार के सरफेस पर फोन कर देने से रेस्क्यू टीम आ गयी और वे लोग वहाँ से सुरक्षित हटा लिये गये। इसके बाद उस फेस पर ऑपरेशन बंद कर दिया गया।

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