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07.10.2008
 

कविता
(कुछ न कुछ टकराएगा ज़रूर)
इन्दु जैन
प्रेषक : रेखा सेठी


दरवाज़ा खटखटाती है
कविता
बेहोश नींद में करवट
खिड़कियों से लिपटे मुर्दों से जूझती
फेफड़ों में हव फूँकती
अमृत की कोशिश करती है
कविता

कविता हिम्मत नहीं दिलाती
कभी-कभी
हिम्मत न कर पाने वाले की
सिर्फ़ आवाज़ बन जाती है
कविता

कविता नारा कभी नहीं होती
लेकिन
गले में नारा भर जाती
मिनट-भर को इन्सान जगा जाती है
कविता


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