कभी- कभी मैं अज्ञात बालक बन जाता हूँ।
कभी- कभी मैं छोटी सी बात पे भी रूठ जाता हूँ॥
कभी- कभी मैं अपनी समझ पे इतराता हूँ।
कभी-कभी मैं अपनी कमियों का अनुभव कर दुखी हो जाता हूँ॥
कभी- कभी मैं भविष्य की आशंकाओं से घबराता हूँ।
कभी- कभी मैं स्वयं को जीवन की बाधाओं से अकेले ही टकराने में परिपूर्ण
पाता हूँ॥
कभी- कभी मैं सांसारिकता के भ्रम मे भटक जाता हूँ।
कभी-कभी मैं जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझने मे लग जाता हूँ॥
लेकिन सर्वदा मैं स्वयं को मानव कर्म निभाने के प्रयास मे संलग्न पाता
हूँ…