अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली

मुख पृष्ठ
05.18.2012


विजय गीत

हँसो
खिलखिलाकर हँसो!
तुम्हारी हँसी
किसी सफलता की
मुहताज़ क्यों हो।
तुम्हें खुश होने के बहाने क्यों चाहिएँ?

खुशी
तुम्हारे अन्दर का एहसास
क्यों नहीं हो सकती!
बिना किसी बाहरी सहारे के
अपने पाँवों से
क्यों नहीं चल सकती।

वह चलती रही है
पहले भी
बस तुम्हें मालूम नहीं था
वरना ज़िन्दगी,
जिसने बार बार
बेरहमी से
तुम्हें काँटों में घसीटा है
दुर्भाग्य से नवाजा है
किस तरह हारती रही
तुम्हारे सामने?
तुम्हारे कदमों में पड़ी रही।

तुम्हारी हँसी ही तो थी
जिससे कभी सिहरकर
कभी सम्भल कर
वह चली आती रही
तुम्हारे पास,
तुम्हारी मुट्ठी में कैद रही।

देखो!
उसे अपनी कैद से
बाहर मत जाने देना
वरना दुख जीत जायेंगे,
तुम्हें मालूम हो न हो
तुम्हारी हँसी ही
दुखों की पराजय का
विजय गीत है!


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें