अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली

मुख पृष्ठ
05.18.2012


रिश्ते

Rishteभीड़ का उत्साह अपने चरम पर था!

शहर में ऐसा कोई आयोजन, भारतीयों के लिए, पहली बार हुआ था। शहर का इकलौता, अमेरिकी भारतीयों को समर्पित, हमतुम रेडियो अपने प्रोग्राम सप्ताह में अब से दो दिन प्रसारित करने वाला था। उसी घोषणा को बहु प्रचारित करने के मद्दे नज़र यह सारा तामझाम था। जॉन्सन मार्केट - जहाँ भारतीय मूल के तमाम लोगों की दूकानें हैं और सप्ताहाँत में यूँ भी भारतीय आबादी उस क्षेत्र में खरीददारी करती या चाट समोसे से लेकर दोसा - इडली उदरस्थ करती हुई पाई जाती है- के उसी हिस्से का पूरा कार पार्किंग एरिया आज कारों से मरहूम था। वहाँ कारों के बदले आज सफ़ेद कपड़े से घिरे कई तम्बू थे जिनमें विभिन्न गतिविधियाँ थीं। सारी की सारी हमतुम रेडियो शो से जुड़ी। कहीं लाइफ़ इन्श्योरेन्स कम्पनी सोनू निगम के कैसेट डिस्काउन्ट में बाँट रही थी। कहीं पानी की बोतलें मुफ़्त में मिल रही थीं। एक स्टाल साड़ीघर का था, दूसरी में एनर्जी बिजली कम्पनी सी डी बाक्स मुफ़्त में दे रही थी। बच्चों के लिए ढेर सारे शो अलग से और पूरे क्षेत्र के बीचों बीच बना था, बड़ा सा ऊँचा स्टेज, जिस पर उस रेडियो शो का मुख्य आयोजक लगातार एक के बाद एक नृत्य संगीत के कार्यक्रमों की उद्‌घोषणा कर रहा था।

छुट्टी का दिन और मुफ़्त के इतने सारे आयोजन! जनता टूटी पड़ रही थी।

सुबह से रेडियो पर लगातार उसी कार्यक्रम की घोषणाएँ सुनते- सुनते उससे रहा नहीं गया था। बोल ही पड़ी – “लगातार बकबक करते -करते इसका मुँह नहीं दुखता क्या? तब से लगातार बोल रहा है, यह मनोज छाबड़ा।"
"इतना अच्छा शो दे रहा है और तुम्हें लग रहा है कि बकबक कर रहा है।" संजय हँसे थे - "सुना तुमने, वह लेडी बारह रोटियाँ बेलकर साड़ी संसार की बनारसी साड़ी का प्राइज ले गई।"
"हाँ, सुना, लेकिन ये तो नान-स्टाप बोल रहा है! गला नहीं दुखता इसका।"
"वह गानों के बीच में आराम करता है।"
"जरूर!"

उसे याद आया, जब नई -नई आई थी तो सारे वक्त उसका जी संजय से बातें करने को होता। पराए देश में इकलौता साथी। किससे बात करे आखिर?

तब एक दिन पोस्ट आफिस में खड़ी थी जब गुलाबी फ़्राक में एक गोलमटोल गदबदी सी गोरी बच्ची लगातार बोल रही थी और साथ खड़ी उसकी माँ बस सिर हिला रही थी। पोस्ट आफिस से निकल कर संजय ने कहा था "तुम्हें लगता है उस लड़की की शादी होगी? इतना बोलती है।"

वह हैरान! दो बित्ते की बच्ची और उसके लिए ऐसा कमेन्ट! फिर अगले ही क्षण उसकी समझ में आ गया। कमेन्ट दरअसल उसके लिए है। कमेन्ट नहीं चेतावनी।

तब से उसने चुप रहना सीख लिया।

लेकिन यदि मनोज छाबड़ा गला फ़ाड़ रहा है, तो ठीक है। बेसुरा है, तब भी ठीक है। बकवास कर रहा है, तब भी ठीक है। रेडियो शो दे रहा है! वह कभी इस लायक बनकर दिखाए।

और सचमुच अगले ही क्षण गाना शुरू हो गया था -" कजरारे - कजरारे, कजरारे कारे नैना।".... हे... ए..... ए........... एक शोर उठा। भीड़ की सीटियाँ और शोर वह रेडियो पर भी सुन सकती थी! थिरकते हुए कदमों की आवाज भी।

तमाशा दिन भर का था।

तब तक, दिन भर, वह अपने बगीचे में नए फूल लगाने से लेकर खाना बनाने और ऐसे ही तमाम कामों में जुटी रही। संजय, कम्प्यूटर पर गेम खेलने, टी वी पर डिस्कवरी चैनल देखने में। और फिर सफ़ाई और बागवानी में उसका हाथ बँटाकर संतुष्ट हुए। वर्षों से अमेरिका में रह रहे संजय की ये कुछ बातें उसे अच्छी भी लगती हैं लेकिन बाकी सारी सोच भी तो पश्चिमी हो गई है जैसे!

अब संचिता को चुप रहने की आदत सी हो गई है। यूँ भी उसका व्यक्तित्व अंतर्मुखी ही रहा है। अन्दर ही अन्दर जो कुछ घुमड़ता है उसे दोस्तों से कह - सुन कर हल्की हो जाती है। अब यहाँ आए दो बरस बीत गए। अब एक मित्र मंडली है जो उसकी अपनी है। एक छोटी नौकरी है जहाँ उसकी अपनी पहचान है, पत्नी या ऐसी किसी पहचान से पृथक।

अब घर - बाहर के बीच वह निर्द्वंद्व फिरती है। कभी खुल कर हँसती - बोलती भी है लोगों के बीच लेकिन, संजय के सामने पता नहीं कुंठा का कौन सा स्रोत खुल जाता है। कुछ अटपटा ही मुँह से निकलता है। और वही चुप होती है अंतत:।

"केम छो? शान्तिबेन कहाँ से कॉल कर रही हैं आप? क्यों फ़्री टिकट चाहिए हेमा मालिनी के शो का? अच्छा सा कारण बतलाइए। कम आन।" - रेडियो, नहीं, मनोज चीख रहा है।

वह खाना परोस रही है।
“चलेंगे क्या?” वह संजय से पूछती है।
"हाँ, शो तो शाम तक चलेगा। एक चक्कर लगा लेंगे।"
"फिर मैं अपनी ग्रोसरी भी कर लूँगी, वहीं। वापसी में मन्दिर हो आयेंगे।"

मन्दिर जाने का एक उज्ज्वल पक्ष यह है कि रात के भोजन की चिन्ता से मुक्ति। दोस्तों से मिल लो, मन्दिर में सिर झुका लो। आरती में डालर चढ़ा दो और प्रसाद - जो पूरा भोजन होता है - खाकर चले आओ। भारत में ऐसा सिर्फ़ गुरुद्वारे में होता है।

और संजय को भी यह वजह मंदिर जाने के लिए काफ़ी लगती है।

मंदिर का भोजन और भजन उन्हें आकर्षित करते हैं। भजन पर थिरकते हुए वह अपनी क्लब जाने की, डांस करने की इच्छा को परोक्ष रूप में अभिव्यक्त कर लेते हैं। संचिता अब तक क्लब जाना भी सीख नहीं पाई, न वाइन के घूँट भरना। और उसका यही सब संजय को चिढ़ाए रखता है।

सप्ताहान्त पर घर में रहना यूँ भी होता नहीं।

वह बर्तन डिशवाशर में लगाकर एक हलका सा सलवार सूट डालकर निकल आई। भारतीय ही होंगे वहाँ सब। यह ड्रेस ठीक है!

वसन्त का खुला हुआ दिन। दोपहर होने के बावजूद धूप कड़ी नहीं लग रही। न ठंढ ही है।

"रेडी फ़ॊर शापिंग।" स्पैनिश पड़ोसन जूलिया ने टिप्पणी की।

वह मुसकरा कर कार में जा बैठी।

कार में भी रेडियो ऑन ही था। गाने की धुन चल रही थी "पड़ोसी के चूल्हे से आग लई के......"

कितनी आग होती है अपने अन्दर। जिन्दगी तो सुलगते ही बीतती है। कैसे कैसे गाने बनाते हैं!...................

वह पूरे रास्ते चुप रही।

कार पार्किंग कहीं दूर थी। हल्की धूप के बावजूद पैदल चलना कुछ अच्छा नहीं लगा। लम्बी दूरी थी। उसकी और संजय की चाल में सहज ही फ़र्क है। संजय आगे निकल गए। वह धीरे- धीरे चलती रही। बीच में खड़े ट्रैफिक सिपाही ने पूछा भी "व्हेयर आर यू गोइंग लेडी?"
"आय'म विद हिम " उसने संजय की ओर इशारा किया।
"युअर ड्रेस इज़ ब्यूटीफ़ुल।"
"थैंक यू।"
"वेरी वेरी ब्यूटीफ़ुल।"

खुश हो गई। संजय को दिखता है क्या, उसकी ड्रेस की तारीफ़ हो रही है। लेकिन वह खुश है। कदम हल्के हो गए जैसे। पहुँच गई शो में – मिनटों में।

अभी वह उस स्टाल से होकर आई है, जहाँ एक किशोरी लोगों को मेंहदी लगा रही है। मुफ़्त में मेंहदी लगवाने कौन न जाए। वह भी लगवा आई।

यही फ़र्क है, वह सोचती है - अमेरिका में जबतक कोई प्रलोभन न हो, मुफ़्त में कुछ मिलने की आशा न हो, जनता इस तरह भीड़ में इकट्ठी होकर इस तरह के शो देखने नहीं आयेगी।

लता मंगेशकर नाइट या ए आर रहमान नाइट हो तो और बात है। वहाँ तो लोग टिकट खरीद कर जाते हैं। लेकिन यह शो तो शुद्ध व्यावसायिक होते हुए भी किन्हीं सितारों का नहीं है। कुछ सेन्ट पैट्रिक्स डे के जुलूस जैसा। कुछ उस मेक्सिकन रेडियो शो की तर्ज पर जो उसके घर के पास के मेक्सिकन मार्केट में चलता है। दिनभर लाउड स्पीकर चीखता है और कुछ पल्ले नहीं पड़ता। तब समझा भी नहीं था कि यह रेडियो चैनल का विज्ञापन हो रहा है। हरी तिलंगी से सजा कार पार्किंग एरिया और वहीं खाना पीना भी। तब संचिता को कुछ समझ नहीं आता था। यह रहस्य तो आज खुला है | अभी, संजय की डाँट खाने के बाद । यह विज्ञापनों की दुनिया है।

चर्च में भी विज्ञापन होते हैं - इस रविवार को सर्मन के बाद पिज़ा पार्टी। बच्चों के लिए विभिन्न कार्यक्रम। ज़रूर आएँ।

भगवान को भी खुशामद करनी पड़ती है आदमी की। आओ मेरे पास। भोजन बनाने या उसके लिए पैसे खर्चने की ज़हमत से बच जाओगे।

वह खिसक कर ठीक स्टेज के सामने चली आई है। दो लड़के - जो हमतुम रेडियो चैनल से जुड़े हैं - भाँगड़ा नृत्य कर रहे हैं - सजी धजी पोशाकें।

जनता की तरफ़ टी शर्ट फेंकी जा रही है। एनर्जी कम्पनी के लोगो बने हुए हैं। संजय आगे गए थे फिर लौट आए। ये लोगो वाली शर्ट कौन पहनेगा!
"सब मेड इन चाइना है। सस्तीवाली। दो दिन नहीं चलेगी।"

लेकिन तब भी लोग लूट तो रहे हैं।
"यह आयडिया शुद्ध अमेरिकन है। लोगों को लुभाने का।"
"क्यों, अपने घर के पास जो मेक्सिकन दूकानें हैं वहाँ मेक्सिकन रेडियो वाले इसी तरह विज्ञापन नहीं करते?"
"कब करते हैं?"
"क्यों? जो दिन भर लाउड स्पीकर पर स्पैनिश गाने बजते हैं, हरी चमकदार झालरों वाली तिलंगी लगा कर।"
"तिलंगी तो इन्हों ने भी लगाई है।"
"हाँ, तो वो क्या हो रहा होता है वहाँ?"
"अच्छा, वो भी यही है। कभी समझ में नहीं आया। तुमने बताया भी नहीं।"
संजय हँस दिए।
"तुम तमाशा देखने आई हो, या आलोचना करने?"
"नहीं, मैं समझने की कोशिश में हूँ।"
"एन्जाय करो।"

स्टेज पर घोषणा हो रही थी -
"जो छह जोड़े स्टेज पर आकर नृत्य में भाग लेंगे। उनमें से सर्वश्रेष्ठ को एयर टिकट मुफ़्त।"

उसे लगा था लोग टूट पड़ेंगे। ऐसा नहीं हुआ।

उसने अपने चारों ओर निगाहें दौड़ाईं- कहीं सिर्फ़ बूढ़ों और अधेड़ लोगों की भीड़ तो नहीं? नवजवान जोड़े भी हैं। कुछ के बच्चे कन्धे पर, कुछ गोद में। बाबागाड़ी साथ में।

इतने तो लोग थे।

लेकिन छह जोड़े भी स्टेज तक नहीं पहुँचे।
"कम ऑन जनता, गोल्डेन अपोर्च्यूनिटी।."......

एक स्त्री स्टेज पर पहुँच गई थी।
"गिव हर अ बिग हैन्ड।"

संजय मुस्कराए। संचिता ने तालियाँ बजाईं।

उधर स्टेज पर वह स्त्री असमंजस में!
"लेकिन मेरे पति नहीं आ रहे।"

मनोज छाबड़ा ने माइक उसे थमाया - "बोलो, तुम नहीं आओगे तो मैं दूसरा पति ले लूँगी।"

भीड़ में ठहाका गूँज गया।
वह बोली, "नहीं, ऐसा नहीं कर सकती।" माइक पर उसने पुकारा - "आते हो या मैं तुम्हारे पास आ जाऊँ।"

फिर से भीड़ में ठहाका गूँज गया।

संचिता और अन्य सभी की नजरें उस स्त्री की नजरों से मिलकर अब उस व्यक्ति पर जा टिकी जिसे सम्बोधित किया गया था। वह नजरें चुराता रहा।

अंतत वह वापस हो गई।

ले देकर चार जोड़े पहुँचे।

गाना शुरू हुआ। वह चुप देखती रही। सारे हिन्दी फिल्मों वाले लटके -झटके।

गाना रुका। "नहीं अभी खतम नहीं हुआ।“ मनोज छाबड़ा आगे आया। "गाने मे पंक्ति थी चूमा ...आपने कहाँ चूमा? कम आन यार। भाई लोग ये आपकी बीबी है, किस कीजिए। क्या शरम है। कम आन।"
"यह क्या समझता है, लोग कुछ भी करेंगे? डोमेस्टिक एयर लाईन के टिकट न हुए जिन्दगी -मौत का सवाल हो जैसे।“ संचिता ने मुँह बनाया।
लोगों को मजा आ रहा था।
"फिर गाना चलाओ।" घोषणा हुई।

अब लोग स्टेज पर अपनी बीवियों को चूम रहे थे।

अंतत एयर टिकट मिले - दो जोड़ों को। बाकी को ड्रेस मटिरियल।

तमाशा खत्म।
"यह आखिरी शो है, आप सब स्टेज पर आ जाइए। डान्स विद मी।" रश्मि ने मनोज का साथ दिया कम्पीयरिंग में।
"चलो, चलें।“
“मैं नहीं जाऊँगी।" वह बिदक गई।
"मैं तुम्हें स्टेज पर चूमने के लिए नहीं कह रहा। वह शो खत्म हो गया।"
"तुम्हें जाना था क्या?"
"मैं जानता था, तुम नहीं आओगी। तुम उस स्त्री के पति जैसी दकियानूसी हो।"
"मैं इन्ट्रोवर्ट हूँ।"
"हाँ, हाँ ठीक है।"
झगड़ा कार में भी चलता रहा। मन्दिर पहुँचने तक।
"तुम मेरा साथ नहीं दे सकतीं?"
"क्या ज़रूरी है कि पत्नी हर काम में पति का साथ दे?"
"डिज्नेलैंड जा सकते थे।"
"अपने पैसे से भी जा सकते हैं।"
"फ़्री में जा सकते थे।"
"सम्बन्धों का विज्ञापन कर "...
"अब चुप करो।"

वह चुप हो गई। क्या यह सोच सिर्फ़ उसी की थी? वह है दकियानूसी भारतीय, जो यहाँ की जीवन शैली को अपनाने से इन्कार करती है। मन्दिर जाती है, क्लब नहीं। हिन्दी बोलती है। भारतीय भोजन पसन्द करती है और खुलेआम घोषणा करती है "आइ हैव नो प्राबल्म विद माय आइडेन्टिटी। "
संजय को परेशान करती है!......................

मन्दिर में बहुत भीड़ थी। ढेर सारे लोग उस शो के बाद यहाँ आ गए थे। संचिता ने अपना हाथ नल के नीचे धो डाला। मेंहदी अच्छी रची थी। वह खुश हो गई।

भजन के बाद डाइनिंग हॉल में आज के शो की चर्चा थी।
"अच्छा, आप भी थीं वहाँ पर?” संचिता ने सामने बैठे पति-पत्नी से परिचय किया।
" हाँ।" उन दोनों ने सिर हिलाकर सहमति जताई।
"कितनी अजीब बात थी न, इतने लोग थे लेकिन स्टेज पर डान्स करने के लिए उनको छह जोड़े नहीं जुटे।" संचिता ने जान बूझ कर बात आगे बढ़ाई।
इतनी देर से सुलग रही थी अन्दर!..............
"हमारे यहाँ पति पत्नी के सम्बन्ध विज्ञापन की चीज नहीं होते।"
"आप खुद क्यों नहीं गईं?"
"मैं? मैं दकियानूसी हूँ ...” संचिता हकला गई।
कई जोड़ी निगाहें अब उस पर टिकी थीं।
"बिल्कुल ठीक हैं आप। रिश्ते विज्ञापन की चीज नहीं होते।"
उसने बोलने वाले की तरफ़ सिर घुमाकर देखा। फिर पूरी टेबल पर सरसरी निगाहें दौड़ाईं।
इस विषय पर जैसे सब सहमत थे।
संचिता ने संजय की तरफ़ देखा।
निगाहें प्लेट पर। वह चुप खाना खा रहे थे।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें