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| 05.31.2008 |
| अभिलाषाएँ डॉ. हृदय नारायण उपाध्याय |
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चाहूँगा मैं फूलों से बन पराग बिछ जाना उड़ता जाऊँ नील गगन में मन की यह अभिलाषा पतझड़ और तपन आकर भी गीत ऐसा गा जाए काँटे समझ भले ही अपने अन्त समय तज जायें |
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